Friday, September 20, 2013

Cinmaya N Singh

22 minutes ago ·


दैया कहां गए वो लोग?

लोगों को मालूम है, कि अंग्रेजों का अधिपत्य रहते हुए भी राजा-महाराजाओं द्वारा सब दिन कला,संगीत आदि का संवर्धन होता रहा। इस मद में रजवाड़ों ने खर्च किये।लेकिन, कई ऐसे भी राजे-महाराजे हुए जिनकी मूर्खता को भूलना भी नहीं चाहिए। ऐसी ही एक घटना का जिक्र स्वर्गीय उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहिब के संस्मरण में मिलता है,जिससे “महाराजा ऑफ़ ग्वालियर,लेफ्टिनेंट जेनरल सर जॉर्ज जीवाजी राव सिंधिया” (माधव राव सिंधिया के पिता) और उस घराने द्वारा देश के साथ किये गए गद्दारी की बात याद आती है। सिंधिया यदि अंग्रेजों को खबर नहीं करते तो कालपी पहुँच कर तांत्या टोपे से मुलाक़ात करतीं।फिर वहां से जगदीशपुर कूच कर इन लोगों की मुलाक़ात बाबू कुंवर सिंह से भेंट होने का कार्यक्रम था.....और सब मिलकर अंग्रेजों से लोहा लेने की योजना थी। लेकिन झांसी की रानी( जो बार-बार अंग्रेजों को यह कहती आई थी कि “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी”) का घोड़ा एक नाला पार करते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया और पीछे पड़े अंग्रेज सैनिक महारानी को मारने में सफल हो गए। उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहिब के साथ किया गया अपमान इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। जिवाजी राव कैसे अंग्रेज भक्त थे,इसका अंदाजा उनके नाम के पूर्व लगे ‘जॉर्ज’ से ही स्पष्ट हो जाता है। यह भी सत्य है कि उस्ताद को ऐसे राजा की छत्रछाया में, जिसे शास्त्रीय संगीत का कुछ भी ज्ञान नहीं,जिसके दरबार में उस कोटि के विद्वान की कोई पूछ नहीं.... वास ही नहीं करना चाहिए था। परन्तु उस्ताद के सामने विकल्प नहीं था। इसी बीच जिवाजी राव का विवाह हुआ। नई महारानी विजयाराजे को संगीत का शौक़ था और उस्ताद तथा उनके गुणों की भी समझ थी। उन्होंने अपनी इच्छा को महाराज के सामने रखा, और तुरंत ही नव महारानी को सितार सिखाने का हुक्म उस्ताद के पास पहुँच गया। साठ बरस के करीब पहुँच चुके उस्ताद को “उषाकिरण पैलेस” तक लाने-पहुंचाने हेतु एक रथनुमा बैलगाड़ी आने लगी।
अब इस बैलगाड़ी पर वो रोज किले के मुख्य द्वार तक जाते थे, और वहां से उषाकिरण पैलेस की अलग यात्रा। नवब्याहता महारानी के कई तरह के शौक थे, सिर्फ संगीत से ही लेना-देना नहीं था।जिवाजी राव अंग्रेजों के कितने बड़े चमचे थे, सो तो कह ही आये हैं।इसलिए महारानी की अधिकतर शामें ‘लेट नाइट पार्टियों’ में बीतती थी, परिणामस्वरूप अधिक दफा उस्ताद को ए.डी.सी. के ऑफिस में घंटों बैठ के वापस अपने डेरे पर लौटना पड़ता था, जिसमें तीन घंटे लगते थे। महारानी के साथ उनकी दो सखियां भी सितार सीखने लगी, जिन्हें बाद में लेडी जाधव और लेडी पाटनकर के नाम से जाना गया। इन तीनों भी.भी.आई.पी के योग्य सितार बनवाने के लिए उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहेब मिरज गए,जहां के हाजी अब्दुल करीम खान के हाथों का निर्मित सितार विख्यात था।वहां से सितार और तानपूरा बन कर आया।तीनों की विधिवत तालीम शुरू हुई। लेडी जाधव और लेडी पाटनकर को तो महीने भर में ही पता चल गया कि वे और कुछ सीख सकें कि नहीं,संगीत उनके औकात से बाहर की चीज़ है।
दोनों ससुराल गयी,और दोनों के सितार को जो मायके के पैलेस की दीवाल में लटकाया गया....सो लटका ही रह गया।
विजयाराजे का सितार कुछ दिन तक बजा, सो इसलिए कि नहीं कि जिवाजी राव को शास्त्रीय संगीत से प्रेम हो चला था। बल्कि इसलिए कि विजयाराजे भतीजी थी ठाकुर चन्दन सिंह की। चूंकि गुणी घर-परिवार की बेटी थी विजयाराजे, इसलिए उन्हें पता था कि उनका सौभाग्य उन्हें उस्ताद हाफ़िज़ अली खान जैसे गुरु से सीखने का अवसर दे रहा है। खैर,किसी तरह पांच-दस दिन पर एक बार महारानी की सितार से भेंट हो जाती थी। अधिकतर, महारानी को बीच में ही उठकर जाना पड़ता था। परिणामतः महारानी का स्वभाव स्त्रियोचित तरीके से व्यवहार करता था और मूड_स्विंग होता रहता था।पैदल जाते-आते बुज़ुर्ग उस्ताद को बड़ा ही कष्ट होता था।जबकि जिवाजी राव के गराज में मर्सिडीज़,पैकार्ड और कैडिलेक गाड़ियों की कतारें लगी रहती थीं। यह सहज ही था कि उस्ताद जी को उस ‘रथनुमा’ बैलगाड़ी की तुलना में ये मोटरगाड़ियां ज्यादा सम्मानजनक और आरामदेह लगी थी।उस्ताद की इस आकांक्षा की जानकारी पाते ही जिवाजी राव आपा खो बैठे। तत्काल अपने ए.डी.सी को बुलाया, और आदेश किया कि चार घोड़े से खींचे जाने वाले एक तोप सरीखी गाडी पर उस्ताद को बैठा के पहले थाटिपुर ले जाया जाय,फिर इनको आर्मी परेड ग्राउंड में ले जा के घोड़ों को फुल स्पीड में दौडाया जाय।ऐसा ही हुआ।संगीत-साहित्य-कला-विहीना जिवाजी राव की की यह मूर्खता(इडियोसिंक्रेसी) की कहानी थी।गुणी को हास्यास्पद बनाना,उनका मखौल उड़ाना।समय बीतता गया।विजयाराजे के मन में भी संगीत या गुणी अथवा गुरु के लिए कोई ख़ास आदर का भाव नहीं रहा।यह सब देख कर उस्ताद का मन खट्टा हो जाता था।अधिकतर वक्त वे सीखने के बदले इधर-उधर की बातें करती रहतीं थी।तरह-तरह के हुक्म देती थीं,फरमान सुनाती थी। लोगों के बीच उस्ताद को आदेश करती थी जो उस्ताद को अपमानजनक लगता था।ऐसे ही एक दिन विजयाराजे ने कहा कि “आज मुझे राग विहाग सिखाइए’’। उस्ताद पशोपेश में, सुबह का वक्त था और इधर महारानी का हुक्म – ‘’कि अभी..अभी इस समय राग विहाग सिखाइए’’। साठ से ज्यादा के उस्ताद,ग्वालियर घराना के संस्थापक,शास्त्रीय संगीत के महान ज्ञाता, ने बहुत सकुचाते हुए,महारानी को जो कुछ कहा...वह उन्हीं के शब्दों में ----“हुज़ूर,ये रात की रागिनी है और इस वक़्त ये सो रही है।इसको दिन के वक़्त जगाना ठीक नहीं है।खादिम हुज़ूर का गुलाम है।हुज़ूर जब भी चाहेंगे ये गुलाम को कभी भी रात के वक्त आने के लिए हुकुम करें तो ये गुलाम हाज़िर होकर हुज़ूर को राग विहाग की तालीम नज़र कर देगा!”
अपने महाराज को पूरा घटनाक्रम सुनाया महारानी ने।महारानी ने तो सुनाया था संगीत की तालीम उस्ताद के अनुशासन को प्रशंसात्मक लहजे में,लेकिन जिवाजी राव यह सुनकर फिर आगबबूले हो गए। तत्काल अपने मिलिट्री सेक्रेटरी कर्नल सूर्याजी राव सुर्वे को बुलाकर उस्ताद को सबक सिखाने का आदेश दिया। उस्ताद को उषाकिरण पैलेस के अहाते में घंटों खड़े रखने के बाद मिलिट्री सेक्रेटरी के दफ्तर में बुलाया गया। कर्नल सुर्वे ने जोर-जोर से “कमीना –नमकहराम-बेइमान” जैसी गालियाँ देते हुए धमकी दी कि महारानी का हुक्म ना मानने के अपराध में उनको ग्वालियर रियासत से निकाला भी जा सकता है। यह सब सुन कर उस्ताद की क्या दशा हुई होगी, सोचा जा सकता है। किसी तरह प्रयत्न करके आप उषाकिरण पैलेस ने विदा हो गए।वहाँ से जय विलास पैलेस के दरवाजे तक चलते हुए आये, और फिर एक तांगे से अपने डेरे तक पहुंचे।उस दिन, अपने हित-अपेक्षित,शागिर्द के सामने बच्चों की तरह रोते हुए बुज़ुर्ग उस्ताद ने सबको भीतर से झकझोर कर रख दिया। इसी दिन से विजयाराजे की संगीत-शिक्षा की भी इतिश्री हो गयी।
(मैथिली के ख्यातिप्राप्त लेखक,साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक स्व.साकेतानंद जी के मैथिली ब्लॉग से। अनुवाद: चिन्मया नन्द।)

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