Sunday, September 22, 2013
नियाज़ हैदर की संगत में.. जावेद सिद्दीकी
शायर, लेखक और रंगकर्मी की तरह नियाज़ हैदर को जानने वाले कुछ लोग तो ज़रूर उन्हें करीब से जानते ही होंगे पर नियाज़ हैदर का नाम नई पीढ़ी के लोगों के लिए हो सकता है कुछ अनसुना सा लगे या फिल्मों के इतिहास और पटकथा, संवादों आदि के बारे में रूचि रखने वाले कुछ लोग उन्हें गहरे से न सही, पर कुछ-कुछ जानते भी हों, फिर भी इतना तो तय है कि परदे के पीछे के लोगों को दुनिया परदे पर आने वालों की तुलना में तो बहुत कम ही जानती है.
“..जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा..” नियाज़ हैदर की एक नज़्म की ये दो पंक्तियाँ पिछले कई दशकों से जनआन्दोलनों का प्रिय नारा बनी हुई हैं। वे जितने बीहड़ किस्म के कम्युनिस्ट थे उतने ही प्रकाण्ड विद्वान। सुख सुविधा और अवसरों को ठोकर मारने वाले। यायावर, अन्वेषी तथा ज़बरदस्त सृजनात्मक क्षमताओं से सम्पन्न। शायर, लेखक, रंगकर्मी की हैसियत अपनी जगह, कट्टर किस्म के स्वाभिमानी भी थे एक मामले में नीतिगत असहमति के कारण देश के सबसे मजबूत प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था। नियाज़ हैदर को करीब से, आत्मीयता से देखते हुए जावेद सिद्दीकी को यहाँ पढ़िए.. वसुधा -85 के सौजन्य से ...
बंजारा
जावेद सिद्दीकी
अगर सूट पहने हुए होते और ज़रा थोड़े से गोरे होते तो कोई भी कसम खा लेता कि कार्ल मार्क्स जि़न्दा हो गये हैं। वही झाड़-झन्कार दाढ़ी, वही बड़ा सा सिर, आगे से उड़े बाल और सिर के पिछले हिस्से में खिचड़ी बालों की मोटी झालर जो कानों के ऊपर से लटक कर दाढ़ी में शामिल हो गयी थी। बदन भी कुछ वैसा ही था, यानी छोटे भी थे और मोटे भी। खुदा जाने नियाज़ हैदर ने अपना हुलिया खुद बनाया था या बन गया था। सच्चाई जो भी हो वह देखने में ही निहायत मार्क्सिस्ट लगते थे। मैंने पहली बार नियाज़ हैदर को मुज़फ्फर अली के घर पर देखा था। मैं और शमा ज़ैदी, मुज़फ्फर के जुहू वाले बंगले के खूबसूरत लॉन में बैठे थे जिसमें गद्दे और गाव तकिये लगे थे। गद्दों पर चाँदनियाँ बिछी थीं और रंगीन शीशों वाले दरवाज़ों पर बारीक काम की चिकें पड़ी हुई थीं। मुज़फ्फर सदैव इस बात की कोशिश करते हैं कि उनके घर में दाखिल होने वाला हर शख्स फौरन समझ जाये कि मुज़फ्फर अपना लखनऊ हर जगह अपने साथ लेकर चलते हैं। हमारी ये मुलाकातें लगभग प्रति दिन होती थीं क्योंकि उमराव जान की शूटिंग सिर पर थी और स्क्रिप्ट के नोंक पलक ठीक किए जा रहे थे। अचानक सुभाषिनी ने दरवाजे में से मुंह निकाला और ऐलान किया 'बाबा आ रहे हैं’ बाबा का नाम सुनते ही मुज़फ्फर संभल कर ठीक होकर बैठ गये, आँखों में एक शरारत भरी सी चमक आयी और होटों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी। शमा ने सिर टेढ़ा करके दरवाज़े की तरफ देखा और अपना कलम (पेन) बन्द करके थैले में डाल दिया।
बड़ी अहम और गरमा गरम बहस चल रही थी, इसमें इस तरह ब्रेक लगना मुझे अच्छा नहीं लगा। गुस्से में जिस तरह आधा लेटा था उसी तरह लेटा रहा। आये जिसको भी आना है, मुझे क्या?
चिक के पीछे से पहले एक निहायत मोटा सा डण्डा आया और फिर बाबा। खादी का ढीला-ढाला घुटनों तक लम्बा कुर्ता जो पहले कभी लाल रहा होगा मगर धुलते-धुलते बादामी हो गया था। बड़े पायचों का मैला सा पाजामा, कन्धे पर खादी का झोला और मामूली सी दो पट्टी वाली चप्पल। हुलिया वही था जो ऊपर बयान कर चुका हूँ। बाबा ने छोटी-छोटी चमकती हुई आँखों से सबको देखा, गले से हँसी जैसी एक आवाज़ निकाली और बोले 'आहा शमा बीबी भी हैं।‘
शमा ने आदाब किया और कहा 'ये जावेद हैं।‘
मुज़फ्फर ने डण्डा लेकर कोने में रखा और जहाँ खुद बैठते थे वहाँ बैठने का इशारा करते हुए अदब से कहा 'बैठिये बाबा।‘
बाबा ने एक निगाह, जो बज़ाहिर निगाह से कम थी मेरी तरफ डाली, हल्के से सिर हिलाया और गाव तकिये से इस तरह लग कर बैठ गये जैसे मजलिस पढऩे वाले हों। सुभाषिनी अन्दर आ गयीं: 'क्या लेंगे बाबा?’
'भई हमारी माचिस खत्म हो गयी है।‘
'अरे माचिस लाओ!’ मुज़फ्फर ने आवाज़ लगायी। माचिस आई, बाबा ने कुर्ते की जेब से बीड़ी का बन्डल निकाला एक बीड़ी चुनी और माचिस जलाकर पहले बीड़ी को सेंका और फिर सुलगाकर एक लम्बा कश लगाया। फिर बीड़ी को उंगलियों में इस तरह पकड़ लिया जैसे बिस्मिल्लाह खाँ शहनाई पकड़ते हैं, और फरमाया 'कहाँ तक पहुँची कहानी?’ 'स्क्रिप्ट तो पूरी हो गयी है, शहरयार का इन्तेज़ार है, आ जायें तो गाने भी फाइनल हो जायें।‘
'जावेद ने डायलाग बहुत अच्छे लिखे हैं बाबा।‘ मुज़फ्फर ने कहा।
'अच्छा आपने पहले क्या लिखा है मियाँ?’
'शतरंज के खिलाड़ी के डायलाग भी हम दोनों ने लिखे थे।‘ शमा ने बताया।
'बेहूदा फिल्म थी, प्रेमचन्द की कहानी का सत्तिया नास कर के रख दिया जाहिल! हाँ डायलाग ठीक-ठाक थे कम से कम ज़बान की कोई गलती नहीं थी।‘
गुस्से में मेरे होठों तक एक शब्द आया 'ईडियट मगर मुँह से निकला: 'शुक्रिया’
नियाज़ हैदर इधर-इधर की बातें करते रहे और मैं उन्हें घूरता रहा। ये हैं कौन? बातें तो ऐसी कर रहा है जैसे सारा अदब अभी-अभी पीकर आ रहा हो। ढोंगी।
बीच में थोड़ी सी तवज्जो बंट गयी थी, शायद मुज़फ्फर का बेटा शाद आ गया था और बाबा उससे बातें करने लगे थे। मैंने मौका पाकर शमा से पूछा: 'ये कौन हैं शमा?’
'अरे! तुम नहीं जानते, ये नियाज़ बाबा हैं, नियाज़ हैदर’ नियाज हैदर? मैं दिल ही दिल में अपना सिर पकड़ के बैठ गया। मुझे क्या मालूम था कि ऐसे होते हैं नियाज़ हैदर। ये थी बाबा से मेरी पहली मुलाकात।
इसके बाद बाबा से लगातार मुलाकातें होती रहीं। कभी मुज़फ्फर अली के घर पे, कभी शमा के घर पे, कभी कैफी साहब के यहाँ, और कभी पृथ्वी थियेटर पर। और जैसे-जैसे नियाज़ बाबा के साथ मुलाकातें बढ़ीं, मेरी नियाज़ मन्दी भी बढ़ती गई। जैसे-जैसे मैं उनके करीब आता गया या यूँ कहना चाहिए, जैसे-जैसे वह मेरे करीब आते गये मुझ पर राज खुलता गया कि बाबा तो बड़े बा कमाल आदमी हैं। और इस बात पर हैरत और अफसोस भी हुआ कि दुनिया उनके बारे में कितना कम जानती है। बाबा अच्छाइयों और बुराइयों का अजीबो गरीब मजमूआ (संकलन) थे। उनकी बातें सुनकर कभी डर लगता था और कभी अकीदत से सिर झुका लेने को जी चाहता था।
अल्लाह जाने कहाँ तक पढ़ा था, कोई डिग्री विग्री भी थी या नहीं, मगर बहुत कम सब्जेक्ट ऐसे थे जिन पर वह नहीं बोल सकते थे। भाषायें भी बहुत सारी जानते थे। उर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी तो जानते ही थे, थोड़ी बहुत संस्कृत, कुछ लैटिन और तेलुगू भी जानते थे। और बोलियों ठोलियों का तो जि़क्र ही क्या, अवधी से लेकर भोजपुरी तक अच्छी तरह समझते थे, बल्कि समझा भी सकते थे। याददाश्त इस $गज़ब की थी कि $खौफ आने लगता था। शायर का नाम लीजिए और कलाम का नमूना हाजि़र है। इ$कबाल उनके पसंदीदा शायर थे। मेरा $ख्याल है उन्हें इकबाल का सारा फारसी और उर्दू कलाम याद था।
बाँग-ए-दरा से ज़र्ब-ए-कलीम तक यूँ मज़े ले लेकर सुनाया करते थे, जैसे अभी रट के आये हों। बाबा के अपने कलाम में भी ल$फ्ज़ों का जो आहंग मिलता था, उनमें इकबाल की गूंज सुनाई देती थी। ये कमज़ोरी थी या खूबी, जानबूझ कर ऐसा करते थे या लाशुऊर (अवचेतन) अपना खेल दिखाता था। कुछ कहा नहीं जा सकता। मैं अक्सर उन्हें छेडऩे के लिये इ$कबाल के खिलाफ कुछ कह दिया करता था। एक बार मैंने कहा: 'इकबाल तो शायर-ए-इस्लाम हैं, मेरी समझ में नहीं आता कि आप और सरदार जाफरी जैसे कट्टर माक्र्सवादी उनकी पूजा क्यों करते हैं?’ बाबा गुस्से में लाल-पीले हो गये और पूरे दो घण्टे का एक बड़ा लेक्चर दिया जिसमें ये साबित किया कि इकबाल तरक्की पसन्द शायर थे।
उनकी फारसी का भी यही आलम था। एक दिन मैंने काआनी (फारसी का एक शायर) के कसीदे का जि़क्र किया जो मैंने मुंशी कामिल के कोर्स में पढ़ा था, और जिसका एक ही शेर याद रह गया था:
बगर दूँ तीरहे अब्र बा आमदा बरुश्द अज़ दरिया
जवाहर खेज़ व गौहर बेज़ व गौहर रेज़ व गौहर ज़ा
सुनते ही बाबा की आँखों में चमक आ गयी, सम्भल कर बैठे, एक हाथ से बालों को ठीक किया, दूसरे हाथ से हवा में बीड़ी लहराई और काआनी का करीब सौ शेर का कसीदा फर-फर सुना दिया। यही नहीं बल्कि इस ज़मीन में उर्फी और नज़ीरी ने भी जो कुछ कहा था वह भी सुना दिया। आप सोच सकते हैं कि क्या हालत हुई होगी। कबीर के दोहे, तुलसी की चौपाइयाँ और गालिब के शेर तो बातों के बीच में पके हुये आमों की तरह टपकते ही रहते थे। बाबा के गैर मामूली हाफ्ज़े (स्मरण शक्ति) और अध्ययन का असर उनकी तहरीर में साफ झलकता है, उन्होंने बहुत कम लिखा मगर जो कुछ भी लिखा खूब लिखा।
जब कुदसिया ज़ैदी ने बरतोल बर्तोल्त के नाटक- काकेशियन चाक सर्किल का अनुवाद- 'सफेद कुण्डली’ के नाम से किया तो गीत नियाज़ बाबा से लिखवाये। इस नाटक में उनके लिखे हुये कई गीत: 'सुन मेरा अफसाना रे भाई, 'चार सूरमा, 'चार जरनैल, चले ईरान, और ‘सिपहइया जल्दी आना, एक ज़माने में फिल्मी गानों की तरह मशहूर हो गये थे। बाबा की लेखनी में भी बड़ा दम-खम था। मुज़फ्फर अली का सीरियल जान-ए-आलम और श्याम बेनेगल की फिल्म 'आरोहण’ में भाषा और बयान पर बाबा की पकड़ का अंदाज़ा किया जा सकता है।
बाबा को किस्से कहानियाँ सुनाने का बड़ा शौक था। खास बात ये थी कि सुनी सुनाई नहीं सुनाते थे। अधिकतर किस्से उनके ऊपर गुज़री हुई घटनाओं या सामने होने वाले वाक्यात होते थे। एक बार उन्होंने एक कम उम्र तवायफ की कहानी सुनाई और इस तरह सुनाई थी कि आज तक मुझे याद है और दिल पर उसका असर भी है।
बाबा ने बताया कि हैदराबाद में नाचने गाने और वैश्यावृत्ति करने वालों के बाज़ार का नाम महबूब की मेंहदी है। और यहाँ एक बड़ी मज़ेदार रस्म होती है, जिसे 'दरीचे की सलामी’ कहा जाता है। जब कोई कमसिन तवायफ इस उम्र को पहुंचती है जब जिस्म के हिस्से उभरने लगते हैं, होंठ मुस्कराने लगते हैं और आँखों में एक शरारत भरी चमक आ आती है तो उसे 'दरीचे की सलामी’ के लिये तैयार किया जाता है। कई दिन पहले से जश्न शुरू होता है। साहिबे-ज़ौक और साहिब-ए-नज़र सरपरस्तों को खबर भिजवायी जाती है, दूर-दूर तक निमंत्रण भेजे जाते हैं। करीबी, रिश्तेदार, पड़ोसी और हम पेशा औरतें जमा होना शुरू हो जाती हैं। रतजगे होते हैं, पकवान पकते हैं, मुसलमान वेश्याओं के कोठों पर मजलिसें और मीलाद शरीफ भी होते हैं। जिस लड़की की रस्म होने वाली होती है उसकी नाक में एक बड़ी सी नथ पहनाकर सात दरगाहों पर ले जाया जाता है फिर उसे दुल्हन बनाया जाता है, हालात के मुताबिक आभूषण, कपड़े पहनाये जाते हैं, फूलों के आभूषणों से सजाया जाता है और जब सूरज के जाने और शमाओं के आँखें खोलने का समय होता है तो कमसिन वैश्या की आरती उतारी जाती है, नज़र का टीका लगाया जाता है। और वह उस दरीचे को जो आगे के जीवन में उसे रोज़ी-रोटी और खुशी देने वाला है, झुककर सात सलाम करती है। और उस झरोखे में बैठकर एक नयी रोशनी में उन असंख्य तमाशबीनों को देखती है जिन में से बहुत से वह होते हैं जिनकी आँखों में दिल होते हैं और बहुत से वह भी होते जिनके पास दिल नहीं होते मगर जेब में माल बहुत होता है और फिर नथ उतारने वालों की बोली लगती है।
बाबा ने जिस लड़की की कहानी सुनाई थी उसका (क्लाइमेक्स) ये नहीं था। उन्होंने कहा कि जब उस लड़की को दरीचे पर लाके बिठाया गया तो वह बहुत देर तक चुपचाप बैठी रही। अचानक वह खड़ी हुई, उसने दरीचे की जाली को हाथ लगाकर अपने माथे से छुआ और एक दम से नीचे छलांग लगा दी। इस बाज़ार में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था, इसलिये चारों तरफ सनसनी फैल गयी। जिसने सुना वह दौड़ा आया ताकि उस पागल लड़की को देख सके जिसने शोहरत और दौलत के शिखर से कूद कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। वह लड़की मरी नहीं, बच गयी। मगर उसकी टांगें टूट गयी थी। बाद में वह लड़की, लंगड़ी खुर्शीद के नाम से मशहूर हुई और अपने समय में 'महबूब की मेंहदी’ की बेहद मशहूर गानेवालियों में उसकी गिनती होती है।
मुझे बाबा का सुनाया हुआ एक और किस्सा याद आ रहा है।
हुआ यूँ कि बाबा दिल्ली में थे। एक दिन उसका फोन आया और उन्होंने बताया कि वह बम्बई आ रहे हैं। उन्होंने अपनी रवानगी (प्रस्थान) का दिन और तारी$ख बताई और तय किया कि दो दिन बाद मुझसे मुला$कात करेंगे। दो दिन गुज़र गये, चार दिन गुज़र गये, ह$फ्ता होने को आया मगर बाबा का कोई पता नहीं था। मैंने इधर-उधर मालूम किया तो बताया गया कि बाबा आये ही नहीं हैं। मैंने दिल्ली फोन किया तो $खबर मिली कि वह वहाँ से चल चुके हैं। अब हम सब ज़रा परेशान हुए हालाँकि परेशानी की कोई बात नहीं थी क्योंकि वह अक्सर ऐसी हरकतें किया करते थे। निकलते थे कहीं जाने के लिये और पहुंच जाते थे कहीं और। मगर डर यह भी था कि वह ट्रेन में अकेले थे। उन्हें सांस की बीमारी थी, और ब्लड प्रेशर की भी। अगर रास्ते में कुछ हो गया तो क्या होगा, मगर सिवाये सब्र करने और परेशान होने के रास्ता भी क्या था। इसलिये चुप-चाप बैठे रहे और दुआएँ करते रहे कि बड़े मियाँ खैरियत से पहुंच जायें।
कोई दस दिन बाद अचानक शमा के घर पर नुमूदार हुए। मैं और शमा तो उन पर बरस ही पड़े, 'ये कोई तरीका है, अगर बम्बई नहीं आना था तो फोन क्यों किया था? और अगर इरादा बदल गया था तो दूसरा फोन करके क्यों नहीं बताया।‘
बाबा पर हमारी डांट डपट का कोई असर नहीं हुआ। वह बड़े प्यार से मुस्कुराये 'अरे छोड़ो यार! एक अच्छी वाली चाय पिलाओ तो एक ऐसा किस्सा सुनाता हूँ कि इस पर फिल्म बन सकती है।‘
बाबा ने सुनाया कि मेरठ के पास ग्राण्ड ट्रक रोड के पास दोनों तरफ आमने-सामने दो गांव हैं। (गांव का नाम तो अब मुझे याद नहीं रहा) मगर नाम एक ही था, एक गांव छोटा कहलाता था दूसरा बड़ा। जो गांव बड़ा था वह हिन्दुओं का था और छोटे गांव में मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी। वहां कोई सवा सौ साल से एक रस्म अदा की जाती है।
हर ब$करीद पर हिन्दुओं के गांव से एक गाय, कुर्बानी के लिए मुस्लिम गांव में भेजी जाती है। ब$करीद के दिन सवेरे-सवेरे हिन्दू गांव में गाय को सजाया संवारा जाता है, उसकी पीठ पर नयी झोल डाली जाती है, गले में हार होते हैं, सींग और दुम पर रंगीन रिबन और गोटे से सजावट की जाती है। उसकी आरती उतारी जाती है और फिर ये गाय बैण्ड बाजे और सैकड़ों गांव वालों के साथ किसी दुल्हन की तरह, मुसलमानों के गांव लाई जाती है। गांव के मुसलमान गाय का हार फूल से स्वागत करते हैं। साथ ही आने वालों को मिठाईयाँ बाँटी जाती हैं। फिर गाय को एक चबूतरे पर खड़ा कर दिया जाता है, जिसके चारों तरफ सारे गांव वाले जमा हो जाते हैं। गांव का कसाई, गाय की गर्दन पर छुरी रखता है और कलमा पढ़ के हटा लेता है। फूलों से लदी फदी गाय और उसके साथ आने वाले, तोहफे और मिठाईयाँ लेकर अपने गांव वापस आ जाते हैं।
बाबा ने मुझे बताया कि 1857 ई. में जब अंग्रेज हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने के लिए गाय की कुर्बानी का मसला छेड़ रहे थे और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम झगड़े हो रहे थे उस समय इस छोटे से गांव के जमींदार ने कहा कि हम अपनी गाय कुर्बानी के लिए दे सकते हैं मगर अपनी एकता की कुर्बानी नहीं दे सकते। और तब से यह खूबसूरत रस्म हर साल इसी तरह निभायी जाती है। (किसी पाठक को जी.टी. रोड पर बसे हुये इन दो गांवों के बारे में मालूम हो तो मुझे अवश्य सूचना दें, एहसान मन्द रहूंगा) बाबा को ये कहानी किसी ने ट्रेन में सुनाई थी और वह इस रस्म की सच्चाई मालूम करने उस गांव में जा पहुंचे थे।
बाबा स्वभाव के ऐतबार से काफी बोहेमियन थे। उन्होंने जि़न्दगी भर घर बनाने या घर बसाने की कोई कोशिश नहीं की। वह जीवन की तेज़ धारा में एक तिनके की तरह थे, जो स्वयं को लहरों के सहारे छोड़ देता है। और सदैव एक मंजिल की तलाश में मुब्तिला रहता है। $गालिब ने शायद नियाज़ बाबा के लिए ही कहा था।
रौ में है रक्से उम्र कहां देखिये थके
नै हात बाग पर है, न पा है रकाब में
वह अक्सर कहा करते थे 'मैं तो बंजारा हूँ, खाना बदोश।‘
मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि बाबा में क्या खास बात थी, जिसकी वजह से जो भी उनसे मिलता था उन्हीं का हो जाता था। बाबा के चाहने वाले हज़ारों थे और भांति-भांति के थे। सज्जाद ज़हीर से लेकर कुदसिया ज़ैदी तक, मुज़फ्फर अली से लेकर श्याम बेनेगल तक, और शशि कपूर से लेकर शमा ज़ैदी तक।
कभी-कभी एक आध झलकी बाबा के व्यक्तित्व में छुपी हुई, मक्नातीस (चुम्बक) की भी दिखाई दे जाती थी।
एक शाम मैं कोई नाटक देखकर पृथ्वी थियेटर से बाहर निकला देखा कि पत्थर की सीढिय़ों पर बाबा बैठे हुए हैं, और हाथों में बीड़ी सुलग रही है। देखते ही खड़े हो गये, बड़े प्यार से गले लगाया और कहने लगे 'अरे यार जावेद! बहुत अच्छा हुआ जो तुम मिल गये मैं तुम्हीं को याद कर रहा था। दुल्हन कहाँ है? (मेरी बीबी फरीदा) मैंने कहा 'वह तो आज नहीं आयी।‘
कहने लगे 'अरे ये तो बड़ा नुकसान हो गया। मैंने थोड़ा परेशान होते हुए पूछा, 'क्यों क्या हो गया?’ मेरे पूछने पर बोले 'भई दुल्हन जो है, वह हमारी खजांची है। जब कभी पैसों की ज़रूरत होती है। उससे ले लेते हैं। तुम्हारे पास तो होंगे नहीं।‘ मैंने कहा थोड़े बहुत हैं आपको कितने चाहिये?’ कहने लगे 'हमें तो एक पैसा भी नहीं चाहिये बस- शराब पीनी है अगर पिला सको तो पिला दो अल्लाह भला करेगा।‘
मैं और बाबा पृथ्वी थियेटर से बाहर निकले, वहीं करीब में एक बार था उसमें घुस गये। बार का बंगाली मालिक लपकता हुआ आया, बाबा की खैर-खैरियत पूछी, फिर दरियाफ्त किया 'क्या पियेंगे?’
बाबा ने बड़ी अदा से किया 'व्हिस्की!’ बंगाली कुछ परेशान हो गया 'व्हिस्की?’
बाबा मुस्कराये और बोले 'आज जावेद मियाँ पिला रहे हैं इसलिये ठर्रा नहीं पियेंगे।‘
बंगाली परेशानी से इधर-उधर देखता रहा फिर धीरे से बोला 'बाबा आज व्हिस्की ठर्रा कुछ नहीं मिल सकता। क्यों नहीं मिल सकता? 'ड्राई डे है बाबा!’ बंगाली ने कहा, बाबा परेशान हो गये, 'अब इस सरकारी कमीनेपन को क्या कहा जाये कि जिस लीडर की याद में ड्राई डे रखा गया है वह बहुत बड़ा आदमी था, उसकी मौत का गम दूर करने के लिये शराब से बढ़कर कोई चीज़ नहीं हो सकती मगर इन गधों को कौन समझाये कि जिन्हें प्यासा मार रहे हैं वह मरने वाले को याद नहीं करेंगे, फरियाद करेंगे।Ó
बंगाली सिर खुजाता हुआ चला गया, मैंने पूछा, 'अब?Ó थोड़ी देर सोचते रहे फिर पूछा, 'क्या बजा है? मैंने कहा: दस बज रहे हैंÓ। कहने लगे: चलो कैफी के घर चलते हैं। वह पी रहा होगा।‘ हम दोनों पैदल चलते हुए जानकी कुटीर पहुंचे और कैफी साहब के दरवाज़े पर लगे हुए जहाँगीरी घण्टे की रस्सी खींची।
घण्टा देर तक बजता रहा मगर कोई गेट खोलने नहीं आया। मैंने कहा बाबा अंदर अंधेरा है लगता है कैफी साहब बाहर गये हैं, बाबा ने उचक कर अंदर झांका, अपने मोटे से डण्डे से लकड़ी के गेट को ठोंका और फरमाया, 'कमरा बंद करके बैठा होगा आज ज़रा सर्दी है ना!’ देर तक घण्टा बजाने के बाद एक नौकर आँखें मलता हुआ नुमूदार हुआ और गेट खोले ब$गैर ही कहने लगा, 'साहब और आपा बाहर गये हुए हैं’, 'कब आयेंगे?’ 'ये तो मालूम नहीं’
बाबा कुछ झुँझला से गये। धीरे-धीरे आगे बढ़े, अचानक आँखों में चमक आयी, कहने लगे, 'आदिल’। विश्वामित्र आदिल का घर सामने ही था मगर उनके बरामदे में भी एक नन्हा सा बल्ब जल रहा था जिससे मालूम होता था कि वह लोग भी नहीं हैं।
बाबा ने सिर हिलाया 'ये भी नहीं है। लगता है कैफी के साथ गया होगा।‘ मैंने घड़ी देखी ग्यारह बजने वाले थे, पृथ्वी की भीड़ भी जा चुकी थी। मैंने बाबा की तरफ देखा अचानक रुके। कहने लगे, 'रिक्शा पकड़ लो, मज़रूह साहब के घर चलते हैं। ज़रा कंजूस ज़रूर हैं मगर इतने कंजूस भी नहीं हैं, कि घर आये मेहमानों को दो पैग न पिला सकें चलो-चलो जल्दी करो।‘
मज़रूह साहब का बंगला जुहू के दक्षिणी किनारे पर लगभग आखिरी बंगला था। लेकिन ज़्यादा दूर नहीं था इसलिये जल्दी से पहुंच गये।
घण्टी बजाई, दरवाज़ा खुला, फिरदौस भाभी ने बड़े तपाक से बाबा का स्वागत किया और ड्राइंग रूम में बिठाया। बाबा के चेहरे की मुस्कुराहट कह रही थी, 'देखा आखिर कामयाबी ने कदम चूम ही लिये।‘
फिरदौस भाभी ने पूछा, 'क्या पियेंगे नियाज़ भाई?’ 'मज़रूह कहाँ है?’ बाबा ने पूछा। 'सुबह से बुखार है, सो गये हैं।‘ बाबा का चेहरा देखने लायक था। वह कभी मुझे देखते थे कभी सामने खड़ी फिरदौस भाभी को। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह दिल की बात ज़बान पर लायें या न लायें। अचानक वह खड़े हो गये, 'आदाब कह देना’ और जवाब का इंतज़ार किये बगैर बाहर निकल आये। तब तक रात के बारह बज रहे थे। और हम दोनों जुहू तारा की सड़क पर उन लुटे हुए मुसाफिरों की तरह चल रहे थे जिस के पास न सिर छिपाने का ठिकाना होता है और न कोई उम्मीद!
बड़ी हिम्मत करके मैंने कहा, 'बाबा मैं निकल जाऊँ? कुर्ला पहुंचना है सान्ताक्रूज़ से आखिरी बस मिल जायेगी।‘
बाबा वहीं बीच सड़क पर रुक गये और गरज कर बोले, 'बिल्कुल नहीं! अब तो जि़द आ गयी है जब तक पी नहीं लेंगे तब तक न आप कहीं जायेंगे और न हम।‘
मैं बोल भी क्या सकता था। एक तो अकीदत ऊपर से यह खौफ कि बड़े मियाँ को अकेला छोड़ दिया तो खुदा जाने कहाँ जायें, क्या करें, इसलिये चुप-चाप चलता रहा। चलते-चलते हम लोग जुहू बीच के पास आ गये तब तक बाबा की सारी बीडिय़ाँ खत्म हो चुकी थीं, और सारी गालियाँ भी! अचानक उनके चेहरे से ऐसी रौशनी फूटी जैसे साठ वाट का बल्ब जल गया हो। बहुत ज़ोर से मेरी कमर पर हाथ मारा और कहा, 'वापस।‘ जुहू कोली बाड़ा और उसके आस-पास बहुत सी छोटी मोटी गलियाँ हैं बाबा ऐसी एक गली में घुस गये। दूर-दूर तक अंधेरा था, दो बल्ब जल रहे थे मगर वह रौशनी देने के बजाये तन्हाई और सन्नाटे के एहसास को बढ़ा रहे थे। बाबा थोड़ी दूर चलते फिर रुक जाते, घरों को गौर से देखते और आगे बढ़ जाते।
अचानक वह रुक गये, सामने एक कम्पाउण्ड था जिसके अंदर दस-बारह घर दिखाई दे रहे थे। इनमें से कोई भी घर एक मंजि़ल से अधिक नहीं था और बीच में छोटा सा मैदान पड़ा था जिसमें एक कुआँ भी दिखाई दे रहा था। बाबा ने कहा 'यही है’ और गेट के अंदर घुस गये। मैं भी पीछे-पीछे था मगर डर रहा था कि आज ये हज़रत ज़रूर पिटवायेंगे। बाबा कम्पाउण्ड के बीच में खड़े हो गये। चारों तरफ सन्नाटा था। किसी घर में रौशनी नहीं थी। बाबा ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, 'लारेन्स-लारेन्स’ अचानक एक झोपड़े नुमा घर में रोशनी जली, दरवाज़ा खुला और एक लम्बा-चौड़ा बड़ी सी तोंद वाला आदमी बाहर आया, जिसने एक गंदा सा नेकर और एक धारीदार बनियान पहन रखा था।
जैसे ही उसने बाबा को देखा एक अजीब सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर फैल गयी, 'अरे बाबा। किधर है तुम? कितना टाइम के बाद आया है?’ ये कहते-कहते उसने बाबा को दबोच लिया और फिर ज़ोर-ज़ोर से गवानी भाषा में चीखने लगा। उसने बाबा का हाथ पकड़ा और अंदर की तरफ खींचने लगा, 'आओ आओ अंदर बैठो, चलो, चलो’ फिर वह मेरी तरफ मुड़ा 'आप भी आओ साब! आजाओ आजाओ अपना ही घर है।‘ हम तीनों एक कमरे में दाखिल हुए जहां दो तीन मेज़ें थीं, कुछ कुर्सियाँ और एक सोफा। अंदर एक दरवाज़ा था जिस पर परदा पड़ा हुआ था। बाबा पूछ रहे थे, 'कैसा है तू लारेन्स? माँ कैसी है? बच्चा लोग कैसा है?’
इतनी देर में अंदर का परदा खुला और बहुत से चेहरे दिखाई देने लगे। एक बूढ़ी औरत एक मैली सी मैक्सी पहने बाहर आई और बाबा के पैरों पर झुक गई। बाबा ने उसकी खैर खैरियत पूछी, बच्चों के सिर पे हाथ फेरा और जब ये हंगामा $खत्म हुआ तो लारेन्स ने पूछा, 'क्या पियेंगे बाबा?’
'व्हिस्की!’ बाबा ने कहा
लारेन्स अंदर गया और विहस्की की एक बोतल टेबिल पे ला के रख दी। इसके बाद दो गिलास थे, कुछ चने कुछ नमक, सोडे और पानी की बोतलें। बाबा ने पैग बनाया, लारेन्स अलादीन के जिन की तरह हाथ बांध कर सामने खड़ा हो गया, 'और क्या खाने का है बाबा? माँ मच्छी बनाती, और कुछ चाहिये तो बोलो कोमड़ी (मुर्गी) खाने का मूड है?’ बाबा ने मुझ से पूछा, 'बोलो बोलो भई क्या खाओगे?’
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि बाबा की इतनी आव भगत क्यों हो रही है। अगर ऐसा भी होता कि वह लारेन्स के मुस्तिकल ग्राहकों में से एक होते तो भी रात के दो बजे ऐसी खातिर तो कहीं नहीं होती। यहां तो ऐसा लग रहा था जैसे बाबा अपनी ससुराल में आ गये हों।
थोड़ी देर में मछली भी आ गयी, उबले हुए अण्डे भी और पाव भी। बहरहाल मुझसे बरदाश्त नहीं हुआ, खाना खाते हुए मैंने बाबा से पूछा, 'बाबा अब इस राज़ से पर्दा उठा दीजिए कि इस लारेन्स और उसकी माँ से आपका क्या रिश्ता है?’
कहानी ये सामने आई कि वर्षों पहले जब बाबा अपनी हर शाम लारेन्स के अड्डे पर गुज़ारा करते थे तो एक दिन जब लारेन्स कहीं बाहर गया हुआ था तो उसकी माँ के पेट में दर्द उठा था, दर्द इतना तेज़ था कि वह बेहोश हो गयी थी। उस वक्त बाबा उसे अपने साथ लेकर अस्पताल पहुंचे, पता लगा कि अपेंडिक्स फट गया है, केस बहुत सीरियस था ऑपरेशन उसी वक्त होना था वरना मौत यकीनी थी। बाबा ने डॉक्टर से कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये और न जाने कहां से और किन दोस्तों से पैसे जमा करके लाये, बुढिय़ा का ऑपरेशन कराया और जब लारेन्स अस्पताल पहुंचा तो उसे खुश खबरी मिली कि उसकी माँ मौत के दरवाजे पे दस्तक दे वापस आ चुकी है।
............ थैंक्स टु नियाज़ बाबा................
इस कहानी में एक खास बात ये है कि लारेन्स और उसकी माँ के बार-बार खुशामद करने के बाद भी बाबा ने वह पैसे कभी वापस नहीं लिये जो उन्होंने अस्पताल में भरे थे।
सुबह तीन बजे के करीब जब बाबा को लेकर बाहर निकल रहा था तो मैंने पलट कर देखा था, लारेन्स की माँ अपनी आँखें पोछ रही थी और लारेन्स अपने हाथ जोड़े सिर झुकाये इस तरह खड़ा था जैसे किसी चर्च में खड़ा हो। बाबा का एक मज़ेदार किस्सा हरी भाई (संजीव कुमार) ने मुझे सुनाया था।
जब तक विश्वामित्र आदिल बम्बई में रहे हर साल इप्टा की 'दावत-ए-शीराज़Ó उनके घर पर होती रही। हर नया और पुराना इप्टा वाला अपना खाना और अपनी शराब लेकर आता था और इस महफिल में शरीक होता था। सारी शराब और सारे खाने एक बड़ी सी मेज़ पर चुन दिये जाते और जिसका जो जी चाहता खा लेता और जो पसन्द आता वह पी लेता। ये एक अजीबो गरीब महफिल होती थी। जिसमें गाना, बजाना, नाचना, लतीफे, चुटकुले, ड्रामे सभी कुछ होता था। और बहुत कम ऐसे इप्टा वाले होते जो इसमें शरीक न होते हों। ऐसी ही एक 'दावते शीराज़Ó में हरी भाई नियाज़ बाबा से टकरा गये और जब पार्टी खत्म हो गई तो अपने साथ अपने घर ले गये। हरी भाई देर से सोते थे और देर से जागते थे। इसलिये वहाँ भी सुबह तक महफिल जमी रही। पता नहीं किस समय हरी भाई सोने के लिये चले गये और बाबा वहीं कालीन पे लेट गये। दूसरे दिन दोपहर में हरी भाई सोकर उठे और रोज़ाना की तरह तैयार होने के लिए अपने बाथरूम में गये। मगर जब उन्होंने पहनने के लिए अपने कपड़े उठाने चाहे तो हैरान हो गये, क्योंकि वहाँ बाबा का मैला कुर्ता पाजामा रखा हुआ था और हरी भाई का सिल्क का कुर्ता और लुंगी $गायब थे।
हरी भाई ने नौकर से पूछा तो यह बात मालूम हुई कि वह मेहमान जो रात को आये थे सुबह सवेरे नहा धोकर सिल्क का लुंगी कुर्ता पहन के रु$ख्सत हो चुके हैं।
कहानी यहाँ $खत्म नहीं होती है।
इस कहानी का दूसरा हिस्सा ये है कि कोई दो महीने बाद एक दिन अचानक नियाज़ बाबा हरी भाई के घर जा धमके और छूटते ही पूछा, 'अरे यार हरी! पिछली दफा जब हम आये थे तो अपना एक जोड़ा कपड़ा छोड़ गये थे वह कहाँ है?’ हरी भाई ने कहा, 'आपके कपड़े तो मैंने धुलवा के रख लिये हैं मगर आप जो मेरा लुंगी कुर्ता पहन के चले गये थे वह कहाँ है?’
बाबा ने बड़ी मासूमियत से अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, सिर खुजाया और बोले, 'हमें क्या मालूम तुम्हारा लुंगी कुर्ता कहाँ है? हम कोई एक जगह कपड़े थोड़ी बदलते हैं?’
हरी भाई जब भी ये किस्सा सुनाते थे बाबा का जुमला याद करके वे बेतहाशा हंसने लगते थे। बाबा के छोटे-मोटे चुटकुले तो इतने हैं कि किताब तैयार हो सकती है। मगर चलते-चलते एक ऐसा किस्सा सुन लीजिए जिससे उनके व्यक्तित्व के एक और पहलू पर प्रकाश पड़ता है।
एक दिन बाबा मिले तो बहुत खिले-खिले से थे, कुछ धुले-धुलाये भी लग रहे थे। मैंने वजह पूछी तो कहने लगे, 'अरे तुम्हें नहीं मालूम श्याम हम से अपनी फिल्म लिखवा रहा है।‘
पूछा, 'श्याम कौन?’
कहने लगे, 'ओफ्फोह श्याम बेनेगल और कौन? भई बहुत अच्छा आदमी है। जितना अच्छा डायरेक्टर है उससे भी ज़्यादा अच्छा इंसान है। उसने हमें अपने आफिस में एक मेज दे दी है और होटल में खाने का प्रबन्ध कर दिया है। सुबह जाते हैं तो मेज़ पर बीड़ी के दो बण्डल और माचिस भी मिलती है। और चाय तो दिन भर आफिस में बनती रहती है और क्या बतायें, हम आजकल ऐश कर रहे हैं।‘
मैंने बाबा को मुबारक बाद दी और दबी जुबान से कहा, 'आपको अपनी सलाहियत दिखाने का बेहतरीन मौका मिला है इसे बीच में छोड़ के भाग मत जाइयेगा जैसा कि आपकी आदत है।‘
कुछ दिन बाद की बात है, मैं शमा के घर बैठा हुआ था। हम दोनों किसी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे कि अचानक आ धमके। न जाने कहाँ से आ रहे थे, बुरी तरह हांफ रहे थे और काफी उजड़े-उजड़े लग रहे थे। जब पानी वानी पी चुके थे तो हमने खैरियत पूछी, फरमाया, 'अजीब आदमी है बात को समझता ही नहीं है। अरे दो वक्त खाने और दो बण्डल बीड़ी से जि़न्दगी थोड़ी गुज़र सकती है।‘ शमा ने पूछा, 'क्या श्याम ने कुछ कह दिया बाबा’
'अरे कहे तो तब, जब सुने। वह सुनता ही नहीं।‘
'क्या नहीं सुनता।‘ मैंने पूछा
'अरे भई हमें पैसे की ज़रूरत पड़ती है और भी तो पचास ज़रूरतें हैं कि नहीं?’
शमा ने कहा, 'मगर ये बात तो मेरे सामने तय हुई थी कि आपको कैश नहीं दिया जायेगा, क्योंकि आप उसकी शराब पी डालेंगे! और काम अधूरा छोड़कर चले जायेंगे। बाबा, गुस्से में लाल हो गये, बीड़ी जो अभी-अभी सुलगाई थी उसे चाय की प्याली में बुझा दिया और गरजकर बोले, 'कैसे बातें करती हो शमा बीबी। हमारी शराब से हमारे काम का क्या ताल्लुक है? तुम ने तो देखा था बेगम साहिबा (बेगम कुदसिया ज़ैदी, शमा ज़ैदी की वालिदा) के लिये हमने कितना काम किया। क्या उन्होंने हमारी शराब बन्द करवाई थी?’
शमा अचानक बहुत ज़ोर से हंसी और मेरी तरफ मुड़ के बोली, 'तुम को मालूम है जावेद! हमारी अम्मा उनसे कैसे काम करवाती थी। इन्हें कमरे में बन्द कर देती थीं और खिड़की के बाहर उनकी पहुंच से दूर एक बोतल रख दिया करती थीं और कहती थी कि काम खत्म करोगे तभी ये बोतल तुम्हारे पास आयेगी। ये बहुत चीखते थे मगर हमारी अम्मी पर उनकी किसी बात का कोई असर नहीं होता था।‘
बाबा को भी पुराने दिन याद आ गये, 'बहुत ज़ोर से कहकहा लगाया और फरमाया, 'तो हम कहाँ कहते हैं कि काम के बीच में पीयेंगे मगर शाम के लिये तो पैसे मिलने ही चाहिये। पैसों पर हमें याद आया, अरे भाई बाहर एक टैक्सी खड़ी है उसका किराया भिजवा देना!’
मैं बाहर निकला, टैक्सी वाले से पूछा, 'किराया कितना हुआ?Ó
कहने लगा, 'एक सौ सत्तर रुपये’
'एक सौ सत्तर?’ मैंने हैरान होकर पूछा।
टैक्सी वाला बाहर निकल आया, 'आप खुद देख लो साब! मीटर अभी तक चल रहा है।‘ मुझे मालूम था कि बाबा वरली पर एक गेस्ट हाउस में रहते हैं मगर ये वह ज़माना था जब वरली से जुहू तक का टैक्सी का किराया पच्चीस तीस रुपये होता था, इसलिये एक सौ सत्तर सुनकर मेरी हैरत ठीक थी।
मीटर भी झूठ नहीं बोल रहा था, मगर ये कैसे हो सकता है। मैंने कहा, 'मगर मेरे भाई वरली से यहाँ तक इतने बहुत से पैसे कैसे हो सकते हैं?’ टैक्सी वाला चिढ़ गया, 'क्या बात करते हैं साब? सवेरे नौ बजे गाड़ी पकड़ी थी, किधर-किधर जाके आये हैं, साब मजगांव, माहिम, बान्द्रा और सब जगह पे मेरे को रोक के रखा।‘
मैं समझ गया और मैंने चुप-चाप एक सौ सत्तर रुपये अदा कर दिये मगर गुस्सा बहुत आया। ये क्या तरीका है, जेब में पैसे नहीं तो टैक्सी में घूमने की क्या ज़रूरत है, मगर वह ऐसी छोटी-छोटी बातों की परवाह करते तो नियाज़ हैदर काहे को होते।
श्याम बाबू को बुरा भला कहने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कई महीनों जारी रहा। जब भी मिलते बेनेगल की शान में ऐसे $कसीदे पढ़ते कि लिखे नहीं जा सकते। शिकायत एक ही थी कि बाबा के चीखने चिल्लाने डराने धमकाने और खुशामद के बावजूद श्याम बेनेगल ने उन्हें पैसे नहीं दिये थे।
फिर एक दिन यूँ हुआ कि मैं रोजाना की तरह शमा के घर बैठा हुआ था जो एक तरीके से हमारा आफिस बन चुका था। एम.एस. सथ्यू भी बंगलौर से आये हुए थे और कुछ बहुत मज़ेदार बातें हो रही थीं कि बाबा प्रकट हो गये। उस दिन भी वह हांफ रहे थे और पसीने में तर थे। आते ही उन्होंने अपनी फूली हुई सांसों में श्याम को बुरा भला कहना शुरू कर दिया, 'मुझे आज तक किसी ने इतना परेशान नहीं किया जितना इस आदमी ने किया है। मेरी समझ में इसकी कोई भी बात नहीं आती।‘
'अब क्या कर दिया श्याम ने?’ शमा कुछ उखड़ सी गयीं।
बाबा बैठे से खड़े हो गये, जेब में हाथ डाला और दस हज़ार रुपये निकाल कर बोले, 'ये देखो इस नालायक आदमी ने ये रुपये मुझे थमा दिये। अब तुम बताओ मैं इनका क्या करूँ?’
हम तीनों एक दूसरे का मुँह देखने लगे। क्या आदमी है भई, नहीं मिला था तो भी नाराज़ और अब मिलने पर भी नाराज़। शमा ने कहा, 'ये आपके काम की मेहनत है खर्च कीजिए!’ 'वही तो पूछ रहा हूँ कहाँ खर्च करूँ?’ बाबा ने पूछा। सथ्यू ने अपनी दाढ़ी खुजाई और कुछ सोचते हुए बोले 'आपको किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है क्या?’ बाबा ने कहा, 'ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है कि इतने बहुत से पैसों की ज़रूरत पड़े।‘ शमा ने राय दी, 'सबसे पहले तो आप अपने लिये कुछ कपड़े बनवा लीजिए’
बाबा खुश हो गये, कहने लगे, 'हाँ ये बहुत अच्छी बात है। हमारे पास दो ही कुरते रह गये हैं।‘
'और कुछ’ सथ्यू ने पूछा।
वह कुछ देर सोचते रहे फिर बोले, 'हैदराबाद में मेरी एक बहन रहती हैं, अगर किसी सूरत से उनका पता मालूम हो सके तो एक हज़ार रुपये उनको भिजवा दूँ। 'और कुछ?’ 'और कुछ नहीं।‘
'तो एक काम करते हैं।‘ सथ्यू ने कहा, 'हज़ार बहन के, पन्द्रह सौ कपड़े के और ये बाकी के साढ़े सात हज़ार रुपये बैंक में जमा करा देते हैं।‘
'मगर बैंक में तो हमारा खाता नहीं है।‘ 'ये कौन सी बड़ी बात है?’ सथ्यू ने कहा 'चलिये उठिये।‘
सथ्यू बाबा को लेकर अपने बैंक में गये और पूरे साढ़े सात हज़ार रुपये जमा करके बाबा को भी सरमायादारों की फेहरिस्त में खड़ा कर दिया। आपको लग रहा होगा कि ये दिलचस्प कहानी यहाँ खत्म हो गयी। जी नहीं! इसका आिखरी हिस्सा बाकी है।
इस घटना के कोई तीन महीने बाद एक दिन दोपहर बाद नियाज़ बाबा शमा के घर में इस तरह दाखि़ल हुए कि उनके आगे-आगे एक दस ग्यारह बरस का लड़का उनका झोला और डण्डा उठाये हुए चल रहा था और पीछे एक पतली-दुबली खादी की सफेद साड़ी में लिपटी हुई सांवली सी लड़की थी जिसकी उम्र सत्ताईस से अधिक न होगी।
ये बात तो फौरन समझ में आ गयी कि अपना वजन उठाने के लिये बाबा ने एक छोकरा रख लिया है मगर ये लड़की कौन है? जो खादी की सफेद साड़ी में कांग्रेस सेवा दल की वर्कर मालूम होती है। वह लड़का तो बाबा का सामान रख के किचन की तरफ िखसक गया, बाबा खुद दीवान पर फैल कर बैठ गये और लड़की से कहने लगे, 'जाओ-जाओ तुम अंदर चली जाओ और आराम करो, बहुत थक गयी हो।‘
वह लड़की भी बगैर एक शब्द कहे हुए शमा के बेडरूम में गयी और बिस्तर पर जाके लेट गयी।
दिल में तरह-तरह के $ख्याल आ रहे थे। कहीं अनहोनी तो नहीं हो गयी, बड़े मियाँ ने इस उम्र में किसी का हाथ तो नहीं थाम लिया। मुझे बाबा की हालत भी बेहतर लग रही थी, कपड़े साफ सुथरे थे और इस्तरी किये हुए थे, दाढ़ी और बालों पर कैंची चलने के आसार दिखाई दे रहे थे। चेहरे पर वैसी ही चमक थी जैसी पुराने पीतल पे पालिश करने के बाद आती है। हद तो ये थी कि उनके गंदे मैले नाखून भी कटे हुए थे।
बाबा थे कि लहक-लहक कर इधर-उधर की बातें कर रहे थे मगर मेरे दिमाग में वही लड़की घूम रही थी जो अंदर सो रही थी। जब सस्पेंस बहुत अधिक बढ़ गया तो शमा ने मुझे इशारा किया और मैंने पूछ ही लिया, 'बाबा ये साहिबज़ादी कौन हैं?’
'ये! ये मेरी मीरा है। बहुत पढ़ी लिखी लड़की है, इसने हिन्दी, इंगलिश और संस्कृत में एम.ए. किया है। ट्रिपल एम.ए. है।‘
'मगर आपके साथ?’
बाबा ने शमा को इस तरह घूरा जैसे उन्होंने कोई बहुत ही बेहूदा सवाल किया हो।
बोले, 'सिक्रेटी है मेरी’
'सिके्रटी’ हम दोनों को हैरत का ऐसा झटका लगा कि कुछ बोला ही नहीं गया।
बाबा बड़े प्यार से बता रहे थे, 'दिल्ली में मिली थी, मैं अपने साथ ले आया। सारा डिक्टेशन लेती है, नोट्स भी बनाती है, इसकी वजह से काम बहुत आसान हो गया है।‘ पता चला कि बात सिर्फ सिक्रेट्री तक ही महदूद नहीं है, बाबा ने एक मराठी फैमिली को भी अपने साथ रख लिया है जिसका बेटा बाबा का झोला डण्डा उठा के चलता है और बच्चे के माँ-बाप बाबा के खाने कपड़े और दूसरी आवश्यकताओं के इंचार्ज बने हुए हैं।
दूसरे शब्दों में इन दिनों बाबा बहुत ही बेहतर जि़न्दगी गुज़ार रहे थे।
इस मुलाकात को सिर्फ तीन माह गुज़रा कि एक दिन बाबा फिर अपने पुराने हुलिये में दिखाई दिये। वही झाड़-झंकाड़ दाढ़ी, उलझे हुए बाल और मैले कपड़े। आते ही फरमाया, ज़रा टैक्सी का किराया भिजवाना।
किराया अधिक नहीं था इसलिये चुप-चाप दे दिया गया। फिर बाबा से पूछा गया कि गर्दिश-ए-अय्याम (परेशानी के दिन) पीछे की तरफ कैसे दौड़ गयी? वह आपके नौकर चाकर और वह सिक्रेट्री कहाँ हैं? कुछ नाराज़ से हो गये, कहने लगे 'चली गयी।‘ पूछा, 'कहाँ चाले गयी?’
कहने लगे, 'मुझे क्या मालूम? दो महीने तनख्वाह नहीं मिली तो मीरा भी चली गई।‘
शमा ने कहा, 'पैसे तो थे आपके बैंक में?’ बाबा कुछ ज़्यादा ही नाराज़ हो गये, 'कैसी बातें करती हो बीबी? साढ़े सात हज़ार रुपये में इतनी बरकत थोड़ी होती है कि हज़ार रुपये महीने की सिक्रेट्री और पन्द्रह सौ रुपये महीने के नौकर रखे जा सकें।‘
शराब बाबा की बहुत सी कमज़ोरियों में से एक थी। जैसे मिले, जितनी मिले, जहाँ भी मिले, मिलनी चाहिए। हैरत की बात ये थी कि वह ठर्रा पीयें या स्कॉच, उन्हें नशा नहीं होता था। या यूँ कहना चाहिये कि कम से कम मैंने उन्हें कभी नशे में नहीं देखा। हालाँकि पीने बैठते थे तो अच्छी खासी पी लिया करते थे और पिलाने वाले को टोकते भी जाते थे, 'कल के लिए कर आज न कंजूसी शराब में।‘
मुहर्रम के दस दिन छोड़ के हर रोज़ शाम को मुम्बई वालों के अनुसार उनकी घण्टी बज जाया करती है और फिर वह तब तक दम न लेते थे जब तक सागर व मीना उनके सामने न आ जाये।
अब कोई पूछे कि नियाज़ हैदर जैसा नास्तिक मुहर्रम क्यों मानता था? और दस दिन तक काले कपड़े क्यों पहनता था। तो मेरे पास इसका जवाज़ (तर्क) है, न जवाब। मैं तो बस यही समझता हूँ कि नियाज़ बाबा का व्यक्तित्व जिन विरोधाभासों के ताने बाने से तैयार किया गया था, ये अमल भी उसका एक हिस्सा था।
एक शाम मैंने डरते-डरते पूछ ही लिया, 'जब आप पर असर ही नहीं होता है तो पीते क्यों हैं?’
मुस्कराये, और बोले,
मय से गरज़ निशात है किस रू सियाह को
यक गोना बे खुदी मुझे हर रात चाहिये।
मैंने कहा, 'लीवर खराब करने से क्या फायदा? आपको नशा तो होता ही नहीं है जिसके लिये लोग शराब पीते हैं’
बाबा बहुत फलसफयाना मूड में थे। कहने लगे, 'ब्रादर! नशा इंसानी दिमाग की एक कैिफयत का नाम है, ये किसी चीज़ में नहीं होता और ये बात मुझसे अधिक कोई और नहीं जानता। क्योंकि ऐसा कोई नशा नहीं हैं, सिवाये एक के, जो मैंने नहीं किया बल्कि मथुरा के साधुओं के साथ बैठकर धतूरे के लड्डू खा चुके हैं और निहंग सरदारों के साथ पत्थर पर संखिया की लकीरें खींच कर उन्हें ज़बान से चाट चुके हैं।
'संखिया? ये न थी हमारी िकस्मत कि विसाले-यार होता। फिर ज़रा विस्तार से बताया कि संखिया चाटना हर ऐरे-गैरे के बस का नहीं।
पत्थर पर संखिया से लकीरे खींच दी जाती हैं जो तीन से पांच इंच लम्बी होती हैं। इस नशे के शौकीन अपनी आवश्यकता और क्षमता के हिसाब से इन लकीरों को ज़बान से चाट लेते हैं। अधिकतर लोग तीसरी लकीर तक पहुंचते-पहुंचते ढेर हो जाते हैं। सुना है कि कुछ सूरमा सात लकीरों का रिकार्ड भी बना चुके हैं।
'कैसा होता है संखिया का नशा?’
'किसी भी नशे को बयान करना बड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि शब्द एहसास को बयान नहीं कर सकते।‘ 'और वह कौन सा नशा है जो आपने नहीं किया?’
'कुछ लोग नशे के लिए अपने आप को सांप से डसवाते हैं। मगर मैं ये हरकत कभी नहीं कर सकता।‘, 'क्यों? क्या आपको सांपों से डर लगता है?, 'डर तो नहीं लगता मगर बहुत गंदे लगते हैं।, 'बहुत से लोग तो आस्तीनों में सांप रखते हैं? 'वह भी बहुत गंदे होते हैं।
तो ऐसे थे हमारे नियाज़ बाबा!
1988 ई. में बाबा दिल्ली में थे,
एक दिन फोन आया, बहुत जोश में थे कहने लगे 'जावेद मियाँ। हमें मकान मिल गया है, हमारा अपना मकान अरे सरकार ने दिया है भाई! तुम दिल्ली आओ तो हमारे ही पास ठहरना, बल्कि एक काम करो तुम और शमा आजकल जिस स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हो उसे लेकर आ जाओ। बड़ी मज़ेदार सर्दियाँ हैं, अंगीठी जल रही है, शराब भी चल रही है मगर कोई दोस्त पास नहीं है। बल्कि हम तो कहते हैं कि दुल्हन और बच्चों को भी ले आओ, हमारा घर आबाद हो जायेगा। तो तुम लोग आ रहे हो न?’
मैं बहुत खुश हुआ कि सारी उम्र भटकने के बाद बाबा को एक घर मिल ही गया जिसे वह अपना कह सकते हैं। मैंने आने का वादा भी कर लिया और इरादा भी।
फरवरी 1989 ई. में अचानक खबर आई कि बाबा जिस घर को लेकर इतना खुश हो रहे थे, उन्होंने वह भी छोड़ दिया और एक ऐसे मकान में चले गये जहाँ उनके अलावा कोई और नहीं रह सकता।
किसी ने सच ही कहा है, 'बंजारे के सिर को पक्की छत रास नहीं आती!’
(लिप्यंतरण- शकील सिद्दीकी)
जावेद सिद्दीकी थियेटर और सिने जगत का चर्चित नाम है। थियेटर और सिनेमा, दोनों क्षेत्रों में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं तथा नियाज़ हैदर का लम्बा सान्निध्य उन्हें प्राप्त रहा है।
“..जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा..” नियाज़ हैदर की एक नज़्म की ये दो पंक्तियाँ पिछले कई दशकों से जनआन्दोलनों का प्रिय नारा बनी हुई हैं। वे जितने बीहड़ किस्म के कम्युनिस्ट थे उतने ही प्रकाण्ड विद्वान। सुख सुविधा और अवसरों को ठोकर मारने वाले। यायावर, अन्वेषी तथा ज़बरदस्त सृजनात्मक क्षमताओं से सम्पन्न। शायर, लेखक, रंगकर्मी की हैसियत अपनी जगह, कट्टर किस्म के स्वाभिमानी भी थे एक मामले में नीतिगत असहमति के कारण देश के सबसे मजबूत प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था। नियाज़ हैदर को करीब से, आत्मीयता से देखते हुए जावेद सिद्दीकी को यहाँ पढ़िए.. वसुधा -85 के सौजन्य से ...
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बंजारा
जावेद सिद्दीकी
अगर सूट पहने हुए होते और ज़रा थोड़े से गोरे होते तो कोई भी कसम खा लेता कि कार्ल मार्क्स जि़न्दा हो गये हैं। वही झाड़-झन्कार दाढ़ी, वही बड़ा सा सिर, आगे से उड़े बाल और सिर के पिछले हिस्से में खिचड़ी बालों की मोटी झालर जो कानों के ऊपर से लटक कर दाढ़ी में शामिल हो गयी थी। बदन भी कुछ वैसा ही था, यानी छोटे भी थे और मोटे भी। खुदा जाने नियाज़ हैदर ने अपना हुलिया खुद बनाया था या बन गया था। सच्चाई जो भी हो वह देखने में ही निहायत मार्क्सिस्ट लगते थे। मैंने पहली बार नियाज़ हैदर को मुज़फ्फर अली के घर पर देखा था। मैं और शमा ज़ैदी, मुज़फ्फर के जुहू वाले बंगले के खूबसूरत लॉन में बैठे थे जिसमें गद्दे और गाव तकिये लगे थे। गद्दों पर चाँदनियाँ बिछी थीं और रंगीन शीशों वाले दरवाज़ों पर बारीक काम की चिकें पड़ी हुई थीं। मुज़फ्फर सदैव इस बात की कोशिश करते हैं कि उनके घर में दाखिल होने वाला हर शख्स फौरन समझ जाये कि मुज़फ्फर अपना लखनऊ हर जगह अपने साथ लेकर चलते हैं। हमारी ये मुलाकातें लगभग प्रति दिन होती थीं क्योंकि उमराव जान की शूटिंग सिर पर थी और स्क्रिप्ट के नोंक पलक ठीक किए जा रहे थे। अचानक सुभाषिनी ने दरवाजे में से मुंह निकाला और ऐलान किया 'बाबा आ रहे हैं’ बाबा का नाम सुनते ही मुज़फ्फर संभल कर ठीक होकर बैठ गये, आँखों में एक शरारत भरी सी चमक आयी और होटों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी। शमा ने सिर टेढ़ा करके दरवाज़े की तरफ देखा और अपना कलम (पेन) बन्द करके थैले में डाल दिया।बड़ी अहम और गरमा गरम बहस चल रही थी, इसमें इस तरह ब्रेक लगना मुझे अच्छा नहीं लगा। गुस्से में जिस तरह आधा लेटा था उसी तरह लेटा रहा। आये जिसको भी आना है, मुझे क्या?
चिक के पीछे से पहले एक निहायत मोटा सा डण्डा आया और फिर बाबा। खादी का ढीला-ढाला घुटनों तक लम्बा कुर्ता जो पहले कभी लाल रहा होगा मगर धुलते-धुलते बादामी हो गया था। बड़े पायचों का मैला सा पाजामा, कन्धे पर खादी का झोला और मामूली सी दो पट्टी वाली चप्पल। हुलिया वही था जो ऊपर बयान कर चुका हूँ। बाबा ने छोटी-छोटी चमकती हुई आँखों से सबको देखा, गले से हँसी जैसी एक आवाज़ निकाली और बोले 'आहा शमा बीबी भी हैं।‘
शमा ने आदाब किया और कहा 'ये जावेद हैं।‘
मुज़फ्फर ने डण्डा लेकर कोने में रखा और जहाँ खुद बैठते थे वहाँ बैठने का इशारा करते हुए अदब से कहा 'बैठिये बाबा।‘
बाबा ने एक निगाह, जो बज़ाहिर निगाह से कम थी मेरी तरफ डाली, हल्के से सिर हिलाया और गाव तकिये से इस तरह लग कर बैठ गये जैसे मजलिस पढऩे वाले हों। सुभाषिनी अन्दर आ गयीं: 'क्या लेंगे बाबा?’
'भई हमारी माचिस खत्म हो गयी है।‘
'अरे माचिस लाओ!’ मुज़फ्फर ने आवाज़ लगायी। माचिस आई, बाबा ने कुर्ते की जेब से बीड़ी का बन्डल निकाला एक बीड़ी चुनी और माचिस जलाकर पहले बीड़ी को सेंका और फिर सुलगाकर एक लम्बा कश लगाया। फिर बीड़ी को उंगलियों में इस तरह पकड़ लिया जैसे बिस्मिल्लाह खाँ शहनाई पकड़ते हैं, और फरमाया 'कहाँ तक पहुँची कहानी?’ 'स्क्रिप्ट तो पूरी हो गयी है, शहरयार का इन्तेज़ार है, आ जायें तो गाने भी फाइनल हो जायें।‘
'जावेद ने डायलाग बहुत अच्छे लिखे हैं बाबा।‘ मुज़फ्फर ने कहा।
'अच्छा आपने पहले क्या लिखा है मियाँ?’
'शतरंज के खिलाड़ी के डायलाग भी हम दोनों ने लिखे थे।‘ शमा ने बताया।
'बेहूदा फिल्म थी, प्रेमचन्द की कहानी का सत्तिया नास कर के रख दिया जाहिल! हाँ डायलाग ठीक-ठाक थे कम से कम ज़बान की कोई गलती नहीं थी।‘
गुस्से में मेरे होठों तक एक शब्द आया 'ईडियट मगर मुँह से निकला: 'शुक्रिया’
नियाज़ हैदर इधर-इधर की बातें करते रहे और मैं उन्हें घूरता रहा। ये हैं कौन? बातें तो ऐसी कर रहा है जैसे सारा अदब अभी-अभी पीकर आ रहा हो। ढोंगी।
बीच में थोड़ी सी तवज्जो बंट गयी थी, शायद मुज़फ्फर का बेटा शाद आ गया था और बाबा उससे बातें करने लगे थे। मैंने मौका पाकर शमा से पूछा: 'ये कौन हैं शमा?’
'अरे! तुम नहीं जानते, ये नियाज़ बाबा हैं, नियाज़ हैदर’ नियाज हैदर? मैं दिल ही दिल में अपना सिर पकड़ के बैठ गया। मुझे क्या मालूम था कि ऐसे होते हैं नियाज़ हैदर। ये थी बाबा से मेरी पहली मुलाकात।
इसके बाद बाबा से लगातार मुलाकातें होती रहीं। कभी मुज़फ्फर अली के घर पे, कभी शमा के घर पे, कभी कैफी साहब के यहाँ, और कभी पृथ्वी थियेटर पर। और जैसे-जैसे नियाज़ बाबा के साथ मुलाकातें बढ़ीं, मेरी नियाज़ मन्दी भी बढ़ती गई। जैसे-जैसे मैं उनके करीब आता गया या यूँ कहना चाहिए, जैसे-जैसे वह मेरे करीब आते गये मुझ पर राज खुलता गया कि बाबा तो बड़े बा कमाल आदमी हैं। और इस बात पर हैरत और अफसोस भी हुआ कि दुनिया उनके बारे में कितना कम जानती है। बाबा अच्छाइयों और बुराइयों का अजीबो गरीब मजमूआ (संकलन) थे। उनकी बातें सुनकर कभी डर लगता था और कभी अकीदत से सिर झुका लेने को जी चाहता था।
अल्लाह जाने कहाँ तक पढ़ा था, कोई डिग्री विग्री भी थी या नहीं, मगर बहुत कम सब्जेक्ट ऐसे थे जिन पर वह नहीं बोल सकते थे। भाषायें भी बहुत सारी जानते थे। उर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी तो जानते ही थे, थोड़ी बहुत संस्कृत, कुछ लैटिन और तेलुगू भी जानते थे। और बोलियों ठोलियों का तो जि़क्र ही क्या, अवधी से लेकर भोजपुरी तक अच्छी तरह समझते थे, बल्कि समझा भी सकते थे। याददाश्त इस $गज़ब की थी कि $खौफ आने लगता था। शायर का नाम लीजिए और कलाम का नमूना हाजि़र है। इ$कबाल उनके पसंदीदा शायर थे। मेरा $ख्याल है उन्हें इकबाल का सारा फारसी और उर्दू कलाम याद था।
बाँग-ए-दरा से ज़र्ब-ए-कलीम तक यूँ मज़े ले लेकर सुनाया करते थे, जैसे अभी रट के आये हों। बाबा के अपने कलाम में भी ल$फ्ज़ों का जो आहंग मिलता था, उनमें इकबाल की गूंज सुनाई देती थी। ये कमज़ोरी थी या खूबी, जानबूझ कर ऐसा करते थे या लाशुऊर (अवचेतन) अपना खेल दिखाता था। कुछ कहा नहीं जा सकता। मैं अक्सर उन्हें छेडऩे के लिये इ$कबाल के खिलाफ कुछ कह दिया करता था। एक बार मैंने कहा: 'इकबाल तो शायर-ए-इस्लाम हैं, मेरी समझ में नहीं आता कि आप और सरदार जाफरी जैसे कट्टर माक्र्सवादी उनकी पूजा क्यों करते हैं?’ बाबा गुस्से में लाल-पीले हो गये और पूरे दो घण्टे का एक बड़ा लेक्चर दिया जिसमें ये साबित किया कि इकबाल तरक्की पसन्द शायर थे।
उनकी फारसी का भी यही आलम था। एक दिन मैंने काआनी (फारसी का एक शायर) के कसीदे का जि़क्र किया जो मैंने मुंशी कामिल के कोर्स में पढ़ा था, और जिसका एक ही शेर याद रह गया था:
बगर दूँ तीरहे अब्र बा आमदा बरुश्द अज़ दरिया
जवाहर खेज़ व गौहर बेज़ व गौहर रेज़ व गौहर ज़ा
सुनते ही बाबा की आँखों में चमक आ गयी, सम्भल कर बैठे, एक हाथ से बालों को ठीक किया, दूसरे हाथ से हवा में बीड़ी लहराई और काआनी का करीब सौ शेर का कसीदा फर-फर सुना दिया। यही नहीं बल्कि इस ज़मीन में उर्फी और नज़ीरी ने भी जो कुछ कहा था वह भी सुना दिया। आप सोच सकते हैं कि क्या हालत हुई होगी। कबीर के दोहे, तुलसी की चौपाइयाँ और गालिब के शेर तो बातों के बीच में पके हुये आमों की तरह टपकते ही रहते थे। बाबा के गैर मामूली हाफ्ज़े (स्मरण शक्ति) और अध्ययन का असर उनकी तहरीर में साफ झलकता है, उन्होंने बहुत कम लिखा मगर जो कुछ भी लिखा खूब लिखा।
जब कुदसिया ज़ैदी ने बरतोल बर्तोल्त के नाटक- काकेशियन चाक सर्किल का अनुवाद- 'सफेद कुण्डली’ के नाम से किया तो गीत नियाज़ बाबा से लिखवाये। इस नाटक में उनके लिखे हुये कई गीत: 'सुन मेरा अफसाना रे भाई, 'चार सूरमा, 'चार जरनैल, चले ईरान, और ‘सिपहइया जल्दी आना, एक ज़माने में फिल्मी गानों की तरह मशहूर हो गये थे। बाबा की लेखनी में भी बड़ा दम-खम था। मुज़फ्फर अली का सीरियल जान-ए-आलम और श्याम बेनेगल की फिल्म 'आरोहण’ में भाषा और बयान पर बाबा की पकड़ का अंदाज़ा किया जा सकता है।
बाबा को किस्से कहानियाँ सुनाने का बड़ा शौक था। खास बात ये थी कि सुनी सुनाई नहीं सुनाते थे। अधिकतर किस्से उनके ऊपर गुज़री हुई घटनाओं या सामने होने वाले वाक्यात होते थे। एक बार उन्होंने एक कम उम्र तवायफ की कहानी सुनाई और इस तरह सुनाई थी कि आज तक मुझे याद है और दिल पर उसका असर भी है।
बाबा ने बताया कि हैदराबाद में नाचने गाने और वैश्यावृत्ति करने वालों के बाज़ार का नाम महबूब की मेंहदी है। और यहाँ एक बड़ी मज़ेदार रस्म होती है, जिसे 'दरीचे की सलामी’ कहा जाता है। जब कोई कमसिन तवायफ इस उम्र को पहुंचती है जब जिस्म के हिस्से उभरने लगते हैं, होंठ मुस्कराने लगते हैं और आँखों में एक शरारत भरी चमक आ आती है तो उसे 'दरीचे की सलामी’ के लिये तैयार किया जाता है। कई दिन पहले से जश्न शुरू होता है। साहिबे-ज़ौक और साहिब-ए-नज़र सरपरस्तों को खबर भिजवायी जाती है, दूर-दूर तक निमंत्रण भेजे जाते हैं। करीबी, रिश्तेदार, पड़ोसी और हम पेशा औरतें जमा होना शुरू हो जाती हैं। रतजगे होते हैं, पकवान पकते हैं, मुसलमान वेश्याओं के कोठों पर मजलिसें और मीलाद शरीफ भी होते हैं। जिस लड़की की रस्म होने वाली होती है उसकी नाक में एक बड़ी सी नथ पहनाकर सात दरगाहों पर ले जाया जाता है फिर उसे दुल्हन बनाया जाता है, हालात के मुताबिक आभूषण, कपड़े पहनाये जाते हैं, फूलों के आभूषणों से सजाया जाता है और जब सूरज के जाने और शमाओं के आँखें खोलने का समय होता है तो कमसिन वैश्या की आरती उतारी जाती है, नज़र का टीका लगाया जाता है। और वह उस दरीचे को जो आगे के जीवन में उसे रोज़ी-रोटी और खुशी देने वाला है, झुककर सात सलाम करती है। और उस झरोखे में बैठकर एक नयी रोशनी में उन असंख्य तमाशबीनों को देखती है जिन में से बहुत से वह होते हैं जिनकी आँखों में दिल होते हैं और बहुत से वह भी होते जिनके पास दिल नहीं होते मगर जेब में माल बहुत होता है और फिर नथ उतारने वालों की बोली लगती है।
बाबा ने जिस लड़की की कहानी सुनाई थी उसका (क्लाइमेक्स) ये नहीं था। उन्होंने कहा कि जब उस लड़की को दरीचे पर लाके बिठाया गया तो वह बहुत देर तक चुपचाप बैठी रही। अचानक वह खड़ी हुई, उसने दरीचे की जाली को हाथ लगाकर अपने माथे से छुआ और एक दम से नीचे छलांग लगा दी। इस बाज़ार में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था, इसलिये चारों तरफ सनसनी फैल गयी। जिसने सुना वह दौड़ा आया ताकि उस पागल लड़की को देख सके जिसने शोहरत और दौलत के शिखर से कूद कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। वह लड़की मरी नहीं, बच गयी। मगर उसकी टांगें टूट गयी थी। बाद में वह लड़की, लंगड़ी खुर्शीद के नाम से मशहूर हुई और अपने समय में 'महबूब की मेंहदी’ की बेहद मशहूर गानेवालियों में उसकी गिनती होती है।
मुझे बाबा का सुनाया हुआ एक और किस्सा याद आ रहा है।
हुआ यूँ कि बाबा दिल्ली में थे। एक दिन उसका फोन आया और उन्होंने बताया कि वह बम्बई आ रहे हैं। उन्होंने अपनी रवानगी (प्रस्थान) का दिन और तारी$ख बताई और तय किया कि दो दिन बाद मुझसे मुला$कात करेंगे। दो दिन गुज़र गये, चार दिन गुज़र गये, ह$फ्ता होने को आया मगर बाबा का कोई पता नहीं था। मैंने इधर-उधर मालूम किया तो बताया गया कि बाबा आये ही नहीं हैं। मैंने दिल्ली फोन किया तो $खबर मिली कि वह वहाँ से चल चुके हैं। अब हम सब ज़रा परेशान हुए हालाँकि परेशानी की कोई बात नहीं थी क्योंकि वह अक्सर ऐसी हरकतें किया करते थे। निकलते थे कहीं जाने के लिये और पहुंच जाते थे कहीं और। मगर डर यह भी था कि वह ट्रेन में अकेले थे। उन्हें सांस की बीमारी थी, और ब्लड प्रेशर की भी। अगर रास्ते में कुछ हो गया तो क्या होगा, मगर सिवाये सब्र करने और परेशान होने के रास्ता भी क्या था। इसलिये चुप-चाप बैठे रहे और दुआएँ करते रहे कि बड़े मियाँ खैरियत से पहुंच जायें।
कोई दस दिन बाद अचानक शमा के घर पर नुमूदार हुए। मैं और शमा तो उन पर बरस ही पड़े, 'ये कोई तरीका है, अगर बम्बई नहीं आना था तो फोन क्यों किया था? और अगर इरादा बदल गया था तो दूसरा फोन करके क्यों नहीं बताया।‘
बाबा पर हमारी डांट डपट का कोई असर नहीं हुआ। वह बड़े प्यार से मुस्कुराये 'अरे छोड़ो यार! एक अच्छी वाली चाय पिलाओ तो एक ऐसा किस्सा सुनाता हूँ कि इस पर फिल्म बन सकती है।‘
बाबा ने सुनाया कि मेरठ के पास ग्राण्ड ट्रक रोड के पास दोनों तरफ आमने-सामने दो गांव हैं। (गांव का नाम तो अब मुझे याद नहीं रहा) मगर नाम एक ही था, एक गांव छोटा कहलाता था दूसरा बड़ा। जो गांव बड़ा था वह हिन्दुओं का था और छोटे गांव में मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी। वहां कोई सवा सौ साल से एक रस्म अदा की जाती है।
हर ब$करीद पर हिन्दुओं के गांव से एक गाय, कुर्बानी के लिए मुस्लिम गांव में भेजी जाती है। ब$करीद के दिन सवेरे-सवेरे हिन्दू गांव में गाय को सजाया संवारा जाता है, उसकी पीठ पर नयी झोल डाली जाती है, गले में हार होते हैं, सींग और दुम पर रंगीन रिबन और गोटे से सजावट की जाती है। उसकी आरती उतारी जाती है और फिर ये गाय बैण्ड बाजे और सैकड़ों गांव वालों के साथ किसी दुल्हन की तरह, मुसलमानों के गांव लाई जाती है। गांव के मुसलमान गाय का हार फूल से स्वागत करते हैं। साथ ही आने वालों को मिठाईयाँ बाँटी जाती हैं। फिर गाय को एक चबूतरे पर खड़ा कर दिया जाता है, जिसके चारों तरफ सारे गांव वाले जमा हो जाते हैं। गांव का कसाई, गाय की गर्दन पर छुरी रखता है और कलमा पढ़ के हटा लेता है। फूलों से लदी फदी गाय और उसके साथ आने वाले, तोहफे और मिठाईयाँ लेकर अपने गांव वापस आ जाते हैं।
बाबा ने मुझे बताया कि 1857 ई. में जब अंग्रेज हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने के लिए गाय की कुर्बानी का मसला छेड़ रहे थे और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम झगड़े हो रहे थे उस समय इस छोटे से गांव के जमींदार ने कहा कि हम अपनी गाय कुर्बानी के लिए दे सकते हैं मगर अपनी एकता की कुर्बानी नहीं दे सकते। और तब से यह खूबसूरत रस्म हर साल इसी तरह निभायी जाती है। (किसी पाठक को जी.टी. रोड पर बसे हुये इन दो गांवों के बारे में मालूम हो तो मुझे अवश्य सूचना दें, एहसान मन्द रहूंगा) बाबा को ये कहानी किसी ने ट्रेन में सुनाई थी और वह इस रस्म की सच्चाई मालूम करने उस गांव में जा पहुंचे थे।
बाबा स्वभाव के ऐतबार से काफी बोहेमियन थे। उन्होंने जि़न्दगी भर घर बनाने या घर बसाने की कोई कोशिश नहीं की। वह जीवन की तेज़ धारा में एक तिनके की तरह थे, जो स्वयं को लहरों के सहारे छोड़ देता है। और सदैव एक मंजिल की तलाश में मुब्तिला रहता है। $गालिब ने शायद नियाज़ बाबा के लिए ही कहा था।
रौ में है रक्से उम्र कहां देखिये थके
नै हात बाग पर है, न पा है रकाब में
वह अक्सर कहा करते थे 'मैं तो बंजारा हूँ, खाना बदोश।‘
मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि बाबा में क्या खास बात थी, जिसकी वजह से जो भी उनसे मिलता था उन्हीं का हो जाता था। बाबा के चाहने वाले हज़ारों थे और भांति-भांति के थे। सज्जाद ज़हीर से लेकर कुदसिया ज़ैदी तक, मुज़फ्फर अली से लेकर श्याम बेनेगल तक, और शशि कपूर से लेकर शमा ज़ैदी तक।
कभी-कभी एक आध झलकी बाबा के व्यक्तित्व में छुपी हुई, मक्नातीस (चुम्बक) की भी दिखाई दे जाती थी।
एक शाम मैं कोई नाटक देखकर पृथ्वी थियेटर से बाहर निकला देखा कि पत्थर की सीढिय़ों पर बाबा बैठे हुए हैं, और हाथों में बीड़ी सुलग रही है। देखते ही खड़े हो गये, बड़े प्यार से गले लगाया और कहने लगे 'अरे यार जावेद! बहुत अच्छा हुआ जो तुम मिल गये मैं तुम्हीं को याद कर रहा था। दुल्हन कहाँ है? (मेरी बीबी फरीदा) मैंने कहा 'वह तो आज नहीं आयी।‘
कहने लगे 'अरे ये तो बड़ा नुकसान हो गया। मैंने थोड़ा परेशान होते हुए पूछा, 'क्यों क्या हो गया?’ मेरे पूछने पर बोले 'भई दुल्हन जो है, वह हमारी खजांची है। जब कभी पैसों की ज़रूरत होती है। उससे ले लेते हैं। तुम्हारे पास तो होंगे नहीं।‘ मैंने कहा थोड़े बहुत हैं आपको कितने चाहिये?’ कहने लगे 'हमें तो एक पैसा भी नहीं चाहिये बस- शराब पीनी है अगर पिला सको तो पिला दो अल्लाह भला करेगा।‘
मैं और बाबा पृथ्वी थियेटर से बाहर निकले, वहीं करीब में एक बार था उसमें घुस गये। बार का बंगाली मालिक लपकता हुआ आया, बाबा की खैर-खैरियत पूछी, फिर दरियाफ्त किया 'क्या पियेंगे?’
बाबा ने बड़ी अदा से किया 'व्हिस्की!’ बंगाली कुछ परेशान हो गया 'व्हिस्की?’
बाबा मुस्कराये और बोले 'आज जावेद मियाँ पिला रहे हैं इसलिये ठर्रा नहीं पियेंगे।‘
बंगाली परेशानी से इधर-उधर देखता रहा फिर धीरे से बोला 'बाबा आज व्हिस्की ठर्रा कुछ नहीं मिल सकता। क्यों नहीं मिल सकता? 'ड्राई डे है बाबा!’ बंगाली ने कहा, बाबा परेशान हो गये, 'अब इस सरकारी कमीनेपन को क्या कहा जाये कि जिस लीडर की याद में ड्राई डे रखा गया है वह बहुत बड़ा आदमी था, उसकी मौत का गम दूर करने के लिये शराब से बढ़कर कोई चीज़ नहीं हो सकती मगर इन गधों को कौन समझाये कि जिन्हें प्यासा मार रहे हैं वह मरने वाले को याद नहीं करेंगे, फरियाद करेंगे।Ó
बंगाली सिर खुजाता हुआ चला गया, मैंने पूछा, 'अब?Ó थोड़ी देर सोचते रहे फिर पूछा, 'क्या बजा है? मैंने कहा: दस बज रहे हैंÓ। कहने लगे: चलो कैफी के घर चलते हैं। वह पी रहा होगा।‘ हम दोनों पैदल चलते हुए जानकी कुटीर पहुंचे और कैफी साहब के दरवाज़े पर लगे हुए जहाँगीरी घण्टे की रस्सी खींची।
घण्टा देर तक बजता रहा मगर कोई गेट खोलने नहीं आया। मैंने कहा बाबा अंदर अंधेरा है लगता है कैफी साहब बाहर गये हैं, बाबा ने उचक कर अंदर झांका, अपने मोटे से डण्डे से लकड़ी के गेट को ठोंका और फरमाया, 'कमरा बंद करके बैठा होगा आज ज़रा सर्दी है ना!’ देर तक घण्टा बजाने के बाद एक नौकर आँखें मलता हुआ नुमूदार हुआ और गेट खोले ब$गैर ही कहने लगा, 'साहब और आपा बाहर गये हुए हैं’, 'कब आयेंगे?’ 'ये तो मालूम नहीं’
बाबा कुछ झुँझला से गये। धीरे-धीरे आगे बढ़े, अचानक आँखों में चमक आयी, कहने लगे, 'आदिल’। विश्वामित्र आदिल का घर सामने ही था मगर उनके बरामदे में भी एक नन्हा सा बल्ब जल रहा था जिससे मालूम होता था कि वह लोग भी नहीं हैं।
बाबा ने सिर हिलाया 'ये भी नहीं है। लगता है कैफी के साथ गया होगा।‘ मैंने घड़ी देखी ग्यारह बजने वाले थे, पृथ्वी की भीड़ भी जा चुकी थी। मैंने बाबा की तरफ देखा अचानक रुके। कहने लगे, 'रिक्शा पकड़ लो, मज़रूह साहब के घर चलते हैं। ज़रा कंजूस ज़रूर हैं मगर इतने कंजूस भी नहीं हैं, कि घर आये मेहमानों को दो पैग न पिला सकें चलो-चलो जल्दी करो।‘
मज़रूह साहब का बंगला जुहू के दक्षिणी किनारे पर लगभग आखिरी बंगला था। लेकिन ज़्यादा दूर नहीं था इसलिये जल्दी से पहुंच गये।
घण्टी बजाई, दरवाज़ा खुला, फिरदौस भाभी ने बड़े तपाक से बाबा का स्वागत किया और ड्राइंग रूम में बिठाया। बाबा के चेहरे की मुस्कुराहट कह रही थी, 'देखा आखिर कामयाबी ने कदम चूम ही लिये।‘
फिरदौस भाभी ने पूछा, 'क्या पियेंगे नियाज़ भाई?’ 'मज़रूह कहाँ है?’ बाबा ने पूछा। 'सुबह से बुखार है, सो गये हैं।‘ बाबा का चेहरा देखने लायक था। वह कभी मुझे देखते थे कभी सामने खड़ी फिरदौस भाभी को। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह दिल की बात ज़बान पर लायें या न लायें। अचानक वह खड़े हो गये, 'आदाब कह देना’ और जवाब का इंतज़ार किये बगैर बाहर निकल आये। तब तक रात के बारह बज रहे थे। और हम दोनों जुहू तारा की सड़क पर उन लुटे हुए मुसाफिरों की तरह चल रहे थे जिस के पास न सिर छिपाने का ठिकाना होता है और न कोई उम्मीद!
बड़ी हिम्मत करके मैंने कहा, 'बाबा मैं निकल जाऊँ? कुर्ला पहुंचना है सान्ताक्रूज़ से आखिरी बस मिल जायेगी।‘
बाबा वहीं बीच सड़क पर रुक गये और गरज कर बोले, 'बिल्कुल नहीं! अब तो जि़द आ गयी है जब तक पी नहीं लेंगे तब तक न आप कहीं जायेंगे और न हम।‘
मैं बोल भी क्या सकता था। एक तो अकीदत ऊपर से यह खौफ कि बड़े मियाँ को अकेला छोड़ दिया तो खुदा जाने कहाँ जायें, क्या करें, इसलिये चुप-चाप चलता रहा। चलते-चलते हम लोग जुहू बीच के पास आ गये तब तक बाबा की सारी बीडिय़ाँ खत्म हो चुकी थीं, और सारी गालियाँ भी! अचानक उनके चेहरे से ऐसी रौशनी फूटी जैसे साठ वाट का बल्ब जल गया हो। बहुत ज़ोर से मेरी कमर पर हाथ मारा और कहा, 'वापस।‘ जुहू कोली बाड़ा और उसके आस-पास बहुत सी छोटी मोटी गलियाँ हैं बाबा ऐसी एक गली में घुस गये। दूर-दूर तक अंधेरा था, दो बल्ब जल रहे थे मगर वह रौशनी देने के बजाये तन्हाई और सन्नाटे के एहसास को बढ़ा रहे थे। बाबा थोड़ी दूर चलते फिर रुक जाते, घरों को गौर से देखते और आगे बढ़ जाते।
अचानक वह रुक गये, सामने एक कम्पाउण्ड था जिसके अंदर दस-बारह घर दिखाई दे रहे थे। इनमें से कोई भी घर एक मंजि़ल से अधिक नहीं था और बीच में छोटा सा मैदान पड़ा था जिसमें एक कुआँ भी दिखाई दे रहा था। बाबा ने कहा 'यही है’ और गेट के अंदर घुस गये। मैं भी पीछे-पीछे था मगर डर रहा था कि आज ये हज़रत ज़रूर पिटवायेंगे। बाबा कम्पाउण्ड के बीच में खड़े हो गये। चारों तरफ सन्नाटा था। किसी घर में रौशनी नहीं थी। बाबा ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, 'लारेन्स-लारेन्स’ अचानक एक झोपड़े नुमा घर में रोशनी जली, दरवाज़ा खुला और एक लम्बा-चौड़ा बड़ी सी तोंद वाला आदमी बाहर आया, जिसने एक गंदा सा नेकर और एक धारीदार बनियान पहन रखा था।
जैसे ही उसने बाबा को देखा एक अजीब सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर फैल गयी, 'अरे बाबा। किधर है तुम? कितना टाइम के बाद आया है?’ ये कहते-कहते उसने बाबा को दबोच लिया और फिर ज़ोर-ज़ोर से गवानी भाषा में चीखने लगा। उसने बाबा का हाथ पकड़ा और अंदर की तरफ खींचने लगा, 'आओ आओ अंदर बैठो, चलो, चलो’ फिर वह मेरी तरफ मुड़ा 'आप भी आओ साब! आजाओ आजाओ अपना ही घर है।‘ हम तीनों एक कमरे में दाखिल हुए जहां दो तीन मेज़ें थीं, कुछ कुर्सियाँ और एक सोफा। अंदर एक दरवाज़ा था जिस पर परदा पड़ा हुआ था। बाबा पूछ रहे थे, 'कैसा है तू लारेन्स? माँ कैसी है? बच्चा लोग कैसा है?’
इतनी देर में अंदर का परदा खुला और बहुत से चेहरे दिखाई देने लगे। एक बूढ़ी औरत एक मैली सी मैक्सी पहने बाहर आई और बाबा के पैरों पर झुक गई। बाबा ने उसकी खैर खैरियत पूछी, बच्चों के सिर पे हाथ फेरा और जब ये हंगामा $खत्म हुआ तो लारेन्स ने पूछा, 'क्या पियेंगे बाबा?’
'व्हिस्की!’ बाबा ने कहा
लारेन्स अंदर गया और विहस्की की एक बोतल टेबिल पे ला के रख दी। इसके बाद दो गिलास थे, कुछ चने कुछ नमक, सोडे और पानी की बोतलें। बाबा ने पैग बनाया, लारेन्स अलादीन के जिन की तरह हाथ बांध कर सामने खड़ा हो गया, 'और क्या खाने का है बाबा? माँ मच्छी बनाती, और कुछ चाहिये तो बोलो कोमड़ी (मुर्गी) खाने का मूड है?’ बाबा ने मुझ से पूछा, 'बोलो बोलो भई क्या खाओगे?’
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि बाबा की इतनी आव भगत क्यों हो रही है। अगर ऐसा भी होता कि वह लारेन्स के मुस्तिकल ग्राहकों में से एक होते तो भी रात के दो बजे ऐसी खातिर तो कहीं नहीं होती। यहां तो ऐसा लग रहा था जैसे बाबा अपनी ससुराल में आ गये हों।
थोड़ी देर में मछली भी आ गयी, उबले हुए अण्डे भी और पाव भी। बहरहाल मुझसे बरदाश्त नहीं हुआ, खाना खाते हुए मैंने बाबा से पूछा, 'बाबा अब इस राज़ से पर्दा उठा दीजिए कि इस लारेन्स और उसकी माँ से आपका क्या रिश्ता है?’
कहानी ये सामने आई कि वर्षों पहले जब बाबा अपनी हर शाम लारेन्स के अड्डे पर गुज़ारा करते थे तो एक दिन जब लारेन्स कहीं बाहर गया हुआ था तो उसकी माँ के पेट में दर्द उठा था, दर्द इतना तेज़ था कि वह बेहोश हो गयी थी। उस वक्त बाबा उसे अपने साथ लेकर अस्पताल पहुंचे, पता लगा कि अपेंडिक्स फट गया है, केस बहुत सीरियस था ऑपरेशन उसी वक्त होना था वरना मौत यकीनी थी। बाबा ने डॉक्टर से कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये और न जाने कहां से और किन दोस्तों से पैसे जमा करके लाये, बुढिय़ा का ऑपरेशन कराया और जब लारेन्स अस्पताल पहुंचा तो उसे खुश खबरी मिली कि उसकी माँ मौत के दरवाजे पे दस्तक दे वापस आ चुकी है।
............ थैंक्स टु नियाज़ बाबा................
इस कहानी में एक खास बात ये है कि लारेन्स और उसकी माँ के बार-बार खुशामद करने के बाद भी बाबा ने वह पैसे कभी वापस नहीं लिये जो उन्होंने अस्पताल में भरे थे।
सुबह तीन बजे के करीब जब बाबा को लेकर बाहर निकल रहा था तो मैंने पलट कर देखा था, लारेन्स की माँ अपनी आँखें पोछ रही थी और लारेन्स अपने हाथ जोड़े सिर झुकाये इस तरह खड़ा था जैसे किसी चर्च में खड़ा हो। बाबा का एक मज़ेदार किस्सा हरी भाई (संजीव कुमार) ने मुझे सुनाया था।
जब तक विश्वामित्र आदिल बम्बई में रहे हर साल इप्टा की 'दावत-ए-शीराज़Ó उनके घर पर होती रही। हर नया और पुराना इप्टा वाला अपना खाना और अपनी शराब लेकर आता था और इस महफिल में शरीक होता था। सारी शराब और सारे खाने एक बड़ी सी मेज़ पर चुन दिये जाते और जिसका जो जी चाहता खा लेता और जो पसन्द आता वह पी लेता। ये एक अजीबो गरीब महफिल होती थी। जिसमें गाना, बजाना, नाचना, लतीफे, चुटकुले, ड्रामे सभी कुछ होता था। और बहुत कम ऐसे इप्टा वाले होते जो इसमें शरीक न होते हों। ऐसी ही एक 'दावते शीराज़Ó में हरी भाई नियाज़ बाबा से टकरा गये और जब पार्टी खत्म हो गई तो अपने साथ अपने घर ले गये। हरी भाई देर से सोते थे और देर से जागते थे। इसलिये वहाँ भी सुबह तक महफिल जमी रही। पता नहीं किस समय हरी भाई सोने के लिये चले गये और बाबा वहीं कालीन पे लेट गये। दूसरे दिन दोपहर में हरी भाई सोकर उठे और रोज़ाना की तरह तैयार होने के लिए अपने बाथरूम में गये। मगर जब उन्होंने पहनने के लिए अपने कपड़े उठाने चाहे तो हैरान हो गये, क्योंकि वहाँ बाबा का मैला कुर्ता पाजामा रखा हुआ था और हरी भाई का सिल्क का कुर्ता और लुंगी $गायब थे।
हरी भाई ने नौकर से पूछा तो यह बात मालूम हुई कि वह मेहमान जो रात को आये थे सुबह सवेरे नहा धोकर सिल्क का लुंगी कुर्ता पहन के रु$ख्सत हो चुके हैं।
कहानी यहाँ $खत्म नहीं होती है।
इस कहानी का दूसरा हिस्सा ये है कि कोई दो महीने बाद एक दिन अचानक नियाज़ बाबा हरी भाई के घर जा धमके और छूटते ही पूछा, 'अरे यार हरी! पिछली दफा जब हम आये थे तो अपना एक जोड़ा कपड़ा छोड़ गये थे वह कहाँ है?’ हरी भाई ने कहा, 'आपके कपड़े तो मैंने धुलवा के रख लिये हैं मगर आप जो मेरा लुंगी कुर्ता पहन के चले गये थे वह कहाँ है?’
बाबा ने बड़ी मासूमियत से अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, सिर खुजाया और बोले, 'हमें क्या मालूम तुम्हारा लुंगी कुर्ता कहाँ है? हम कोई एक जगह कपड़े थोड़ी बदलते हैं?’
हरी भाई जब भी ये किस्सा सुनाते थे बाबा का जुमला याद करके वे बेतहाशा हंसने लगते थे। बाबा के छोटे-मोटे चुटकुले तो इतने हैं कि किताब तैयार हो सकती है। मगर चलते-चलते एक ऐसा किस्सा सुन लीजिए जिससे उनके व्यक्तित्व के एक और पहलू पर प्रकाश पड़ता है।
एक दिन बाबा मिले तो बहुत खिले-खिले से थे, कुछ धुले-धुलाये भी लग रहे थे। मैंने वजह पूछी तो कहने लगे, 'अरे तुम्हें नहीं मालूम श्याम हम से अपनी फिल्म लिखवा रहा है।‘
पूछा, 'श्याम कौन?’
कहने लगे, 'ओफ्फोह श्याम बेनेगल और कौन? भई बहुत अच्छा आदमी है। जितना अच्छा डायरेक्टर है उससे भी ज़्यादा अच्छा इंसान है। उसने हमें अपने आफिस में एक मेज दे दी है और होटल में खाने का प्रबन्ध कर दिया है। सुबह जाते हैं तो मेज़ पर बीड़ी के दो बण्डल और माचिस भी मिलती है। और चाय तो दिन भर आफिस में बनती रहती है और क्या बतायें, हम आजकल ऐश कर रहे हैं।‘
मैंने बाबा को मुबारक बाद दी और दबी जुबान से कहा, 'आपको अपनी सलाहियत दिखाने का बेहतरीन मौका मिला है इसे बीच में छोड़ के भाग मत जाइयेगा जैसा कि आपकी आदत है।‘
कुछ दिन बाद की बात है, मैं शमा के घर बैठा हुआ था। हम दोनों किसी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे कि अचानक आ धमके। न जाने कहाँ से आ रहे थे, बुरी तरह हांफ रहे थे और काफी उजड़े-उजड़े लग रहे थे। जब पानी वानी पी चुके थे तो हमने खैरियत पूछी, फरमाया, 'अजीब आदमी है बात को समझता ही नहीं है। अरे दो वक्त खाने और दो बण्डल बीड़ी से जि़न्दगी थोड़ी गुज़र सकती है।‘ शमा ने पूछा, 'क्या श्याम ने कुछ कह दिया बाबा’
'अरे कहे तो तब, जब सुने। वह सुनता ही नहीं।‘
'क्या नहीं सुनता।‘ मैंने पूछा
'अरे भई हमें पैसे की ज़रूरत पड़ती है और भी तो पचास ज़रूरतें हैं कि नहीं?’
शमा ने कहा, 'मगर ये बात तो मेरे सामने तय हुई थी कि आपको कैश नहीं दिया जायेगा, क्योंकि आप उसकी शराब पी डालेंगे! और काम अधूरा छोड़कर चले जायेंगे। बाबा, गुस्से में लाल हो गये, बीड़ी जो अभी-अभी सुलगाई थी उसे चाय की प्याली में बुझा दिया और गरजकर बोले, 'कैसे बातें करती हो शमा बीबी। हमारी शराब से हमारे काम का क्या ताल्लुक है? तुम ने तो देखा था बेगम साहिबा (बेगम कुदसिया ज़ैदी, शमा ज़ैदी की वालिदा) के लिये हमने कितना काम किया। क्या उन्होंने हमारी शराब बन्द करवाई थी?’
शमा अचानक बहुत ज़ोर से हंसी और मेरी तरफ मुड़ के बोली, 'तुम को मालूम है जावेद! हमारी अम्मा उनसे कैसे काम करवाती थी। इन्हें कमरे में बन्द कर देती थीं और खिड़की के बाहर उनकी पहुंच से दूर एक बोतल रख दिया करती थीं और कहती थी कि काम खत्म करोगे तभी ये बोतल तुम्हारे पास आयेगी। ये बहुत चीखते थे मगर हमारी अम्मी पर उनकी किसी बात का कोई असर नहीं होता था।‘
बाबा को भी पुराने दिन याद आ गये, 'बहुत ज़ोर से कहकहा लगाया और फरमाया, 'तो हम कहाँ कहते हैं कि काम के बीच में पीयेंगे मगर शाम के लिये तो पैसे मिलने ही चाहिये। पैसों पर हमें याद आया, अरे भाई बाहर एक टैक्सी खड़ी है उसका किराया भिजवा देना!’
मैं बाहर निकला, टैक्सी वाले से पूछा, 'किराया कितना हुआ?Ó
कहने लगा, 'एक सौ सत्तर रुपये’
'एक सौ सत्तर?’ मैंने हैरान होकर पूछा।
टैक्सी वाला बाहर निकल आया, 'आप खुद देख लो साब! मीटर अभी तक चल रहा है।‘ मुझे मालूम था कि बाबा वरली पर एक गेस्ट हाउस में रहते हैं मगर ये वह ज़माना था जब वरली से जुहू तक का टैक्सी का किराया पच्चीस तीस रुपये होता था, इसलिये एक सौ सत्तर सुनकर मेरी हैरत ठीक थी।
मीटर भी झूठ नहीं बोल रहा था, मगर ये कैसे हो सकता है। मैंने कहा, 'मगर मेरे भाई वरली से यहाँ तक इतने बहुत से पैसे कैसे हो सकते हैं?’ टैक्सी वाला चिढ़ गया, 'क्या बात करते हैं साब? सवेरे नौ बजे गाड़ी पकड़ी थी, किधर-किधर जाके आये हैं, साब मजगांव, माहिम, बान्द्रा और सब जगह पे मेरे को रोक के रखा।‘
मैं समझ गया और मैंने चुप-चाप एक सौ सत्तर रुपये अदा कर दिये मगर गुस्सा बहुत आया। ये क्या तरीका है, जेब में पैसे नहीं तो टैक्सी में घूमने की क्या ज़रूरत है, मगर वह ऐसी छोटी-छोटी बातों की परवाह करते तो नियाज़ हैदर काहे को होते।
श्याम बाबू को बुरा भला कहने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कई महीनों जारी रहा। जब भी मिलते बेनेगल की शान में ऐसे $कसीदे पढ़ते कि लिखे नहीं जा सकते। शिकायत एक ही थी कि बाबा के चीखने चिल्लाने डराने धमकाने और खुशामद के बावजूद श्याम बेनेगल ने उन्हें पैसे नहीं दिये थे।
फिर एक दिन यूँ हुआ कि मैं रोजाना की तरह शमा के घर बैठा हुआ था जो एक तरीके से हमारा आफिस बन चुका था। एम.एस. सथ्यू भी बंगलौर से आये हुए थे और कुछ बहुत मज़ेदार बातें हो रही थीं कि बाबा प्रकट हो गये। उस दिन भी वह हांफ रहे थे और पसीने में तर थे। आते ही उन्होंने अपनी फूली हुई सांसों में श्याम को बुरा भला कहना शुरू कर दिया, 'मुझे आज तक किसी ने इतना परेशान नहीं किया जितना इस आदमी ने किया है। मेरी समझ में इसकी कोई भी बात नहीं आती।‘
'अब क्या कर दिया श्याम ने?’ शमा कुछ उखड़ सी गयीं।
बाबा बैठे से खड़े हो गये, जेब में हाथ डाला और दस हज़ार रुपये निकाल कर बोले, 'ये देखो इस नालायक आदमी ने ये रुपये मुझे थमा दिये। अब तुम बताओ मैं इनका क्या करूँ?’
हम तीनों एक दूसरे का मुँह देखने लगे। क्या आदमी है भई, नहीं मिला था तो भी नाराज़ और अब मिलने पर भी नाराज़। शमा ने कहा, 'ये आपके काम की मेहनत है खर्च कीजिए!’ 'वही तो पूछ रहा हूँ कहाँ खर्च करूँ?’ बाबा ने पूछा। सथ्यू ने अपनी दाढ़ी खुजाई और कुछ सोचते हुए बोले 'आपको किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है क्या?’ बाबा ने कहा, 'ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है कि इतने बहुत से पैसों की ज़रूरत पड़े।‘ शमा ने राय दी, 'सबसे पहले तो आप अपने लिये कुछ कपड़े बनवा लीजिए’
बाबा खुश हो गये, कहने लगे, 'हाँ ये बहुत अच्छी बात है। हमारे पास दो ही कुरते रह गये हैं।‘
'और कुछ’ सथ्यू ने पूछा।
वह कुछ देर सोचते रहे फिर बोले, 'हैदराबाद में मेरी एक बहन रहती हैं, अगर किसी सूरत से उनका पता मालूम हो सके तो एक हज़ार रुपये उनको भिजवा दूँ। 'और कुछ?’ 'और कुछ नहीं।‘
'तो एक काम करते हैं।‘ सथ्यू ने कहा, 'हज़ार बहन के, पन्द्रह सौ कपड़े के और ये बाकी के साढ़े सात हज़ार रुपये बैंक में जमा करा देते हैं।‘
'मगर बैंक में तो हमारा खाता नहीं है।‘ 'ये कौन सी बड़ी बात है?’ सथ्यू ने कहा 'चलिये उठिये।‘
सथ्यू बाबा को लेकर अपने बैंक में गये और पूरे साढ़े सात हज़ार रुपये जमा करके बाबा को भी सरमायादारों की फेहरिस्त में खड़ा कर दिया। आपको लग रहा होगा कि ये दिलचस्प कहानी यहाँ खत्म हो गयी। जी नहीं! इसका आिखरी हिस्सा बाकी है।
इस घटना के कोई तीन महीने बाद एक दिन दोपहर बाद नियाज़ बाबा शमा के घर में इस तरह दाखि़ल हुए कि उनके आगे-आगे एक दस ग्यारह बरस का लड़का उनका झोला और डण्डा उठाये हुए चल रहा था और पीछे एक पतली-दुबली खादी की सफेद साड़ी में लिपटी हुई सांवली सी लड़की थी जिसकी उम्र सत्ताईस से अधिक न होगी।
ये बात तो फौरन समझ में आ गयी कि अपना वजन उठाने के लिये बाबा ने एक छोकरा रख लिया है मगर ये लड़की कौन है? जो खादी की सफेद साड़ी में कांग्रेस सेवा दल की वर्कर मालूम होती है। वह लड़का तो बाबा का सामान रख के किचन की तरफ िखसक गया, बाबा खुद दीवान पर फैल कर बैठ गये और लड़की से कहने लगे, 'जाओ-जाओ तुम अंदर चली जाओ और आराम करो, बहुत थक गयी हो।‘
वह लड़की भी बगैर एक शब्द कहे हुए शमा के बेडरूम में गयी और बिस्तर पर जाके लेट गयी।
दिल में तरह-तरह के $ख्याल आ रहे थे। कहीं अनहोनी तो नहीं हो गयी, बड़े मियाँ ने इस उम्र में किसी का हाथ तो नहीं थाम लिया। मुझे बाबा की हालत भी बेहतर लग रही थी, कपड़े साफ सुथरे थे और इस्तरी किये हुए थे, दाढ़ी और बालों पर कैंची चलने के आसार दिखाई दे रहे थे। चेहरे पर वैसी ही चमक थी जैसी पुराने पीतल पे पालिश करने के बाद आती है। हद तो ये थी कि उनके गंदे मैले नाखून भी कटे हुए थे।
बाबा थे कि लहक-लहक कर इधर-उधर की बातें कर रहे थे मगर मेरे दिमाग में वही लड़की घूम रही थी जो अंदर सो रही थी। जब सस्पेंस बहुत अधिक बढ़ गया तो शमा ने मुझे इशारा किया और मैंने पूछ ही लिया, 'बाबा ये साहिबज़ादी कौन हैं?’
'ये! ये मेरी मीरा है। बहुत पढ़ी लिखी लड़की है, इसने हिन्दी, इंगलिश और संस्कृत में एम.ए. किया है। ट्रिपल एम.ए. है।‘
'मगर आपके साथ?’
बाबा ने शमा को इस तरह घूरा जैसे उन्होंने कोई बहुत ही बेहूदा सवाल किया हो।
बोले, 'सिक्रेटी है मेरी’
'सिके्रटी’ हम दोनों को हैरत का ऐसा झटका लगा कि कुछ बोला ही नहीं गया।
बाबा बड़े प्यार से बता रहे थे, 'दिल्ली में मिली थी, मैं अपने साथ ले आया। सारा डिक्टेशन लेती है, नोट्स भी बनाती है, इसकी वजह से काम बहुत आसान हो गया है।‘ पता चला कि बात सिर्फ सिक्रेट्री तक ही महदूद नहीं है, बाबा ने एक मराठी फैमिली को भी अपने साथ रख लिया है जिसका बेटा बाबा का झोला डण्डा उठा के चलता है और बच्चे के माँ-बाप बाबा के खाने कपड़े और दूसरी आवश्यकताओं के इंचार्ज बने हुए हैं।
दूसरे शब्दों में इन दिनों बाबा बहुत ही बेहतर जि़न्दगी गुज़ार रहे थे।
इस मुलाकात को सिर्फ तीन माह गुज़रा कि एक दिन बाबा फिर अपने पुराने हुलिये में दिखाई दिये। वही झाड़-झंकाड़ दाढ़ी, उलझे हुए बाल और मैले कपड़े। आते ही फरमाया, ज़रा टैक्सी का किराया भिजवाना।
किराया अधिक नहीं था इसलिये चुप-चाप दे दिया गया। फिर बाबा से पूछा गया कि गर्दिश-ए-अय्याम (परेशानी के दिन) पीछे की तरफ कैसे दौड़ गयी? वह आपके नौकर चाकर और वह सिक्रेट्री कहाँ हैं? कुछ नाराज़ से हो गये, कहने लगे 'चली गयी।‘ पूछा, 'कहाँ चाले गयी?’
कहने लगे, 'मुझे क्या मालूम? दो महीने तनख्वाह नहीं मिली तो मीरा भी चली गई।‘
शमा ने कहा, 'पैसे तो थे आपके बैंक में?’ बाबा कुछ ज़्यादा ही नाराज़ हो गये, 'कैसी बातें करती हो बीबी? साढ़े सात हज़ार रुपये में इतनी बरकत थोड़ी होती है कि हज़ार रुपये महीने की सिक्रेट्री और पन्द्रह सौ रुपये महीने के नौकर रखे जा सकें।‘
शराब बाबा की बहुत सी कमज़ोरियों में से एक थी। जैसे मिले, जितनी मिले, जहाँ भी मिले, मिलनी चाहिए। हैरत की बात ये थी कि वह ठर्रा पीयें या स्कॉच, उन्हें नशा नहीं होता था। या यूँ कहना चाहिये कि कम से कम मैंने उन्हें कभी नशे में नहीं देखा। हालाँकि पीने बैठते थे तो अच्छी खासी पी लिया करते थे और पिलाने वाले को टोकते भी जाते थे, 'कल के लिए कर आज न कंजूसी शराब में।‘
मुहर्रम के दस दिन छोड़ के हर रोज़ शाम को मुम्बई वालों के अनुसार उनकी घण्टी बज जाया करती है और फिर वह तब तक दम न लेते थे जब तक सागर व मीना उनके सामने न आ जाये।
अब कोई पूछे कि नियाज़ हैदर जैसा नास्तिक मुहर्रम क्यों मानता था? और दस दिन तक काले कपड़े क्यों पहनता था। तो मेरे पास इसका जवाज़ (तर्क) है, न जवाब। मैं तो बस यही समझता हूँ कि नियाज़ बाबा का व्यक्तित्व जिन विरोधाभासों के ताने बाने से तैयार किया गया था, ये अमल भी उसका एक हिस्सा था।
एक शाम मैंने डरते-डरते पूछ ही लिया, 'जब आप पर असर ही नहीं होता है तो पीते क्यों हैं?’
मुस्कराये, और बोले,
मय से गरज़ निशात है किस रू सियाह को
यक गोना बे खुदी मुझे हर रात चाहिये।
मैंने कहा, 'लीवर खराब करने से क्या फायदा? आपको नशा तो होता ही नहीं है जिसके लिये लोग शराब पीते हैं’
बाबा बहुत फलसफयाना मूड में थे। कहने लगे, 'ब्रादर! नशा इंसानी दिमाग की एक कैिफयत का नाम है, ये किसी चीज़ में नहीं होता और ये बात मुझसे अधिक कोई और नहीं जानता। क्योंकि ऐसा कोई नशा नहीं हैं, सिवाये एक के, जो मैंने नहीं किया बल्कि मथुरा के साधुओं के साथ बैठकर धतूरे के लड्डू खा चुके हैं और निहंग सरदारों के साथ पत्थर पर संखिया की लकीरें खींच कर उन्हें ज़बान से चाट चुके हैं।
'संखिया? ये न थी हमारी िकस्मत कि विसाले-यार होता। फिर ज़रा विस्तार से बताया कि संखिया चाटना हर ऐरे-गैरे के बस का नहीं।
पत्थर पर संखिया से लकीरे खींच दी जाती हैं जो तीन से पांच इंच लम्बी होती हैं। इस नशे के शौकीन अपनी आवश्यकता और क्षमता के हिसाब से इन लकीरों को ज़बान से चाट लेते हैं। अधिकतर लोग तीसरी लकीर तक पहुंचते-पहुंचते ढेर हो जाते हैं। सुना है कि कुछ सूरमा सात लकीरों का रिकार्ड भी बना चुके हैं।
'कैसा होता है संखिया का नशा?’
'किसी भी नशे को बयान करना बड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि शब्द एहसास को बयान नहीं कर सकते।‘ 'और वह कौन सा नशा है जो आपने नहीं किया?’
'कुछ लोग नशे के लिए अपने आप को सांप से डसवाते हैं। मगर मैं ये हरकत कभी नहीं कर सकता।‘, 'क्यों? क्या आपको सांपों से डर लगता है?, 'डर तो नहीं लगता मगर बहुत गंदे लगते हैं।, 'बहुत से लोग तो आस्तीनों में सांप रखते हैं? 'वह भी बहुत गंदे होते हैं।
तो ऐसे थे हमारे नियाज़ बाबा!
1988 ई. में बाबा दिल्ली में थे,
एक दिन फोन आया, बहुत जोश में थे कहने लगे 'जावेद मियाँ। हमें मकान मिल गया है, हमारा अपना मकान अरे सरकार ने दिया है भाई! तुम दिल्ली आओ तो हमारे ही पास ठहरना, बल्कि एक काम करो तुम और शमा आजकल जिस स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हो उसे लेकर आ जाओ। बड़ी मज़ेदार सर्दियाँ हैं, अंगीठी जल रही है, शराब भी चल रही है मगर कोई दोस्त पास नहीं है। बल्कि हम तो कहते हैं कि दुल्हन और बच्चों को भी ले आओ, हमारा घर आबाद हो जायेगा। तो तुम लोग आ रहे हो न?’
मैं बहुत खुश हुआ कि सारी उम्र भटकने के बाद बाबा को एक घर मिल ही गया जिसे वह अपना कह सकते हैं। मैंने आने का वादा भी कर लिया और इरादा भी।
फरवरी 1989 ई. में अचानक खबर आई कि बाबा जिस घर को लेकर इतना खुश हो रहे थे, उन्होंने वह भी छोड़ दिया और एक ऐसे मकान में चले गये जहाँ उनके अलावा कोई और नहीं रह सकता।
किसी ने सच ही कहा है, 'बंजारे के सिर को पक्की छत रास नहीं आती!’
(लिप्यंतरण- शकील सिद्दीकी)
जावेद सिद्दीकी थियेटर और सिने जगत का चर्चित नाम है। थियेटर और सिनेमा, दोनों क्षेत्रों में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं तथा नियाज़ हैदर का लम्बा सान्निध्य उन्हें प्राप्त रहा है।
नियाज़ हैदर की संगत में.. जावेद सिद्दीकी
शायर, लेखक और रंगकर्मी की तरह नियाज़ हैदर को जानने वाले कुछ लोग तो ज़रूर उन्हें करीब से जानते ही होंगे पर नियाज़ हैदर का नाम नई पीढ़ी के लोगों के लिए हो सकता है कुछ अनसुना सा लगे या फिल्मों के इतिहास और पटकथा, संवादों आदि के बारे में रूचि रखने वाले कुछ लोग उन्हें गहरे से न सही, पर कुछ-कुछ जानते भी हों, फिर भी इतना तो तय है कि परदे के पीछे के लोगों को दुनिया परदे पर आने वालों की तुलना में तो बहुत कम ही जानती है.
“..जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा..” नियाज़ हैदर की एक नज़्म की ये दो पंक्तियाँ पिछले कई दशकों से जनआन्दोलनों का प्रिय नारा बनी हुई हैं। वे जितने बीहड़ किस्म के कम्युनिस्ट थे उतने ही प्रकाण्ड विद्वान। सुख सुविधा और अवसरों को ठोकर मारने वाले। यायावर, अन्वेषी तथा ज़बरदस्त सृजनात्मक क्षमताओं से सम्पन्न। शायर, लेखक, रंगकर्मी की हैसियत अपनी जगह, कट्टर किस्म के स्वाभिमानी भी थे एक मामले में नीतिगत असहमति के कारण देश के सबसे मजबूत प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था। नियाज़ हैदर को करीब से, आत्मीयता से देखते हुए जावेद सिद्दीकी को यहाँ पढ़िए.. वसुधा -85 के सौजन्य से ...
बंजारा
जावेद सिद्दीकी
अगर सूट पहने हुए होते और ज़रा थोड़े से गोरे होते तो कोई भी कसम खा लेता कि कार्ल मार्क्स जि़न्दा हो गये हैं। वही झाड़-झन्कार दाढ़ी, वही बड़ा सा सिर, आगे से उड़े बाल और सिर के पिछले हिस्से में खिचड़ी बालों की मोटी झालर जो कानों के ऊपर से लटक कर दाढ़ी में शामिल हो गयी थी। बदन भी कुछ वैसा ही था, यानी छोटे भी थे और मोटे भी। खुदा जाने नियाज़ हैदर ने अपना हुलिया खुद बनाया था या बन गया था। सच्चाई जो भी हो वह देखने में ही निहायत मार्क्सिस्ट लगते थे। मैंने पहली बार नियाज़ हैदर को मुज़फ्फर अली के घर पर देखा था। मैं और शमा ज़ैदी, मुज़फ्फर के जुहू वाले बंगले के खूबसूरत लॉन में बैठे थे जिसमें गद्दे और गाव तकिये लगे थे। गद्दों पर चाँदनियाँ बिछी थीं और रंगीन शीशों वाले दरवाज़ों पर बारीक काम की चिकें पड़ी हुई थीं। मुज़फ्फर सदैव इस बात की कोशिश करते हैं कि उनके घर में दाखिल होने वाला हर शख्स फौरन समझ जाये कि मुज़फ्फर अपना लखनऊ हर जगह अपने साथ लेकर चलते हैं। हमारी ये मुलाकातें लगभग प्रति दिन होती थीं क्योंकि उमराव जान की शूटिंग सिर पर थी और स्क्रिप्ट के नोंक पलक ठीक किए जा रहे थे। अचानक सुभाषिनी ने दरवाजे में से मुंह निकाला और ऐलान किया 'बाबा आ रहे हैं’ बाबा का नाम सुनते ही मुज़फ्फर संभल कर ठीक होकर बैठ गये, आँखों में एक शरारत भरी सी चमक आयी और होटों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी। शमा ने सिर टेढ़ा करके दरवाज़े की तरफ देखा और अपना कलम (पेन) बन्द करके थैले में डाल दिया।
बड़ी अहम और गरमा गरम बहस चल रही थी, इसमें इस तरह ब्रेक लगना मुझे अच्छा नहीं लगा। गुस्से में जिस तरह आधा लेटा था उसी तरह लेटा रहा। आये जिसको भी आना है, मुझे क्या?
चिक के पीछे से पहले एक निहायत मोटा सा डण्डा आया और फिर बाबा। खादी का ढीला-ढाला घुटनों तक लम्बा कुर्ता जो पहले कभी लाल रहा होगा मगर धुलते-धुलते बादामी हो गया था। बड़े पायचों का मैला सा पाजामा, कन्धे पर खादी का झोला और मामूली सी दो पट्टी वाली चप्पल। हुलिया वही था जो ऊपर बयान कर चुका हूँ। बाबा ने छोटी-छोटी चमकती हुई आँखों से सबको देखा, गले से हँसी जैसी एक आवाज़ निकाली और बोले 'आहा शमा बीबी भी हैं।‘
शमा ने आदाब किया और कहा 'ये जावेद हैं।‘
मुज़फ्फर ने डण्डा लेकर कोने में रखा और जहाँ खुद बैठते थे वहाँ बैठने का इशारा करते हुए अदब से कहा 'बैठिये बाबा।‘
बाबा ने एक निगाह, जो बज़ाहिर निगाह से कम थी मेरी तरफ डाली, हल्के से सिर हिलाया और गाव तकिये से इस तरह लग कर बैठ गये जैसे मजलिस पढऩे वाले हों। सुभाषिनी अन्दर आ गयीं: 'क्या लेंगे बाबा?’
'भई हमारी माचिस खत्म हो गयी है।‘
'अरे माचिस लाओ!’ मुज़फ्फर ने आवाज़ लगायी। माचिस आई, बाबा ने कुर्ते की जेब से बीड़ी का बन्डल निकाला एक बीड़ी चुनी और माचिस जलाकर पहले बीड़ी को सेंका और फिर सुलगाकर एक लम्बा कश लगाया। फिर बीड़ी को उंगलियों में इस तरह पकड़ लिया जैसे बिस्मिल्लाह खाँ शहनाई पकड़ते हैं, और फरमाया 'कहाँ तक पहुँची कहानी?’ 'स्क्रिप्ट तो पूरी हो गयी है, शहरयार का इन्तेज़ार है, आ जायें तो गाने भी फाइनल हो जायें।‘
'जावेद ने डायलाग बहुत अच्छे लिखे हैं बाबा।‘ मुज़फ्फर ने कहा।
'अच्छा आपने पहले क्या लिखा है मियाँ?’
'शतरंज के खिलाड़ी के डायलाग भी हम दोनों ने लिखे थे।‘ शमा ने बताया।
'बेहूदा फिल्म थी, प्रेमचन्द की कहानी का सत्तिया नास कर के रख दिया जाहिल! हाँ डायलाग ठीक-ठाक थे कम से कम ज़बान की कोई गलती नहीं थी।‘
गुस्से में मेरे होठों तक एक शब्द आया 'ईडियट मगर मुँह से निकला: 'शुक्रिया’
नियाज़ हैदर इधर-इधर की बातें करते रहे और मैं उन्हें घूरता रहा। ये हैं कौन? बातें तो ऐसी कर रहा है जैसे सारा अदब अभी-अभी पीकर आ रहा हो। ढोंगी।
बीच में थोड़ी सी तवज्जो बंट गयी थी, शायद मुज़फ्फर का बेटा शाद आ गया था और बाबा उससे बातें करने लगे थे। मैंने मौका पाकर शमा से पूछा: 'ये कौन हैं शमा?’
'अरे! तुम नहीं जानते, ये नियाज़ बाबा हैं, नियाज़ हैदर’ नियाज हैदर? मैं दिल ही दिल में अपना सिर पकड़ के बैठ गया। मुझे क्या मालूम था कि ऐसे होते हैं नियाज़ हैदर। ये थी बाबा से मेरी पहली मुलाकात।
इसके बाद बाबा से लगातार मुलाकातें होती रहीं। कभी मुज़फ्फर अली के घर पे, कभी शमा के घर पे, कभी कैफी साहब के यहाँ, और कभी पृथ्वी थियेटर पर। और जैसे-जैसे नियाज़ बाबा के साथ मुलाकातें बढ़ीं, मेरी नियाज़ मन्दी भी बढ़ती गई। जैसे-जैसे मैं उनके करीब आता गया या यूँ कहना चाहिए, जैसे-जैसे वह मेरे करीब आते गये मुझ पर राज खुलता गया कि बाबा तो बड़े बा कमाल आदमी हैं। और इस बात पर हैरत और अफसोस भी हुआ कि दुनिया उनके बारे में कितना कम जानती है। बाबा अच्छाइयों और बुराइयों का अजीबो गरीब मजमूआ (संकलन) थे। उनकी बातें सुनकर कभी डर लगता था और कभी अकीदत से सिर झुका लेने को जी चाहता था।
अल्लाह जाने कहाँ तक पढ़ा था, कोई डिग्री विग्री भी थी या नहीं, मगर बहुत कम सब्जेक्ट ऐसे थे जिन पर वह नहीं बोल सकते थे। भाषायें भी बहुत सारी जानते थे। उर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी तो जानते ही थे, थोड़ी बहुत संस्कृत, कुछ लैटिन और तेलुगू भी जानते थे। और बोलियों ठोलियों का तो जि़क्र ही क्या, अवधी से लेकर भोजपुरी तक अच्छी तरह समझते थे, बल्कि समझा भी सकते थे। याददाश्त इस $गज़ब की थी कि $खौफ आने लगता था। शायर का नाम लीजिए और कलाम का नमूना हाजि़र है। इ$कबाल उनके पसंदीदा शायर थे। मेरा $ख्याल है उन्हें इकबाल का सारा फारसी और उर्दू कलाम याद था।
बाँग-ए-दरा से ज़र्ब-ए-कलीम तक यूँ मज़े ले लेकर सुनाया करते थे, जैसे अभी रट के आये हों। बाबा के अपने कलाम में भी ल$फ्ज़ों का जो आहंग मिलता था, उनमें इकबाल की गूंज सुनाई देती थी। ये कमज़ोरी थी या खूबी, जानबूझ कर ऐसा करते थे या लाशुऊर (अवचेतन) अपना खेल दिखाता था। कुछ कहा नहीं जा सकता। मैं अक्सर उन्हें छेडऩे के लिये इ$कबाल के खिलाफ कुछ कह दिया करता था। एक बार मैंने कहा: 'इकबाल तो शायर-ए-इस्लाम हैं, मेरी समझ में नहीं आता कि आप और सरदार जाफरी जैसे कट्टर माक्र्सवादी उनकी पूजा क्यों करते हैं?’ बाबा गुस्से में लाल-पीले हो गये और पूरे दो घण्टे का एक बड़ा लेक्चर दिया जिसमें ये साबित किया कि इकबाल तरक्की पसन्द शायर थे।
उनकी फारसी का भी यही आलम था। एक दिन मैंने काआनी (फारसी का एक शायर) के कसीदे का जि़क्र किया जो मैंने मुंशी कामिल के कोर्स में पढ़ा था, और जिसका एक ही शेर याद रह गया था:
बगर दूँ तीरहे अब्र बा आमदा बरुश्द अज़ दरिया
जवाहर खेज़ व गौहर बेज़ व गौहर रेज़ व गौहर ज़ा
सुनते ही बाबा की आँखों में चमक आ गयी, सम्भल कर बैठे, एक हाथ से बालों को ठीक किया, दूसरे हाथ से हवा में बीड़ी लहराई और काआनी का करीब सौ शेर का कसीदा फर-फर सुना दिया। यही नहीं बल्कि इस ज़मीन में उर्फी और नज़ीरी ने भी जो कुछ कहा था वह भी सुना दिया। आप सोच सकते हैं कि क्या हालत हुई होगी। कबीर के दोहे, तुलसी की चौपाइयाँ और गालिब के शेर तो बातों के बीच में पके हुये आमों की तरह टपकते ही रहते थे। बाबा के गैर मामूली हाफ्ज़े (स्मरण शक्ति) और अध्ययन का असर उनकी तहरीर में साफ झलकता है, उन्होंने बहुत कम लिखा मगर जो कुछ भी लिखा खूब लिखा।
जब कुदसिया ज़ैदी ने बरतोल बर्तोल्त के नाटक- काकेशियन चाक सर्किल का अनुवाद- 'सफेद कुण्डली’ के नाम से किया तो गीत नियाज़ बाबा से लिखवाये। इस नाटक में उनके लिखे हुये कई गीत: 'सुन मेरा अफसाना रे भाई, 'चार सूरमा, 'चार जरनैल, चले ईरान, और ‘सिपहइया जल्दी आना, एक ज़माने में फिल्मी गानों की तरह मशहूर हो गये थे। बाबा की लेखनी में भी बड़ा दम-खम था। मुज़फ्फर अली का सीरियल जान-ए-आलम और श्याम बेनेगल की फिल्म 'आरोहण’ में भाषा और बयान पर बाबा की पकड़ का अंदाज़ा किया जा सकता है।
बाबा को किस्से कहानियाँ सुनाने का बड़ा शौक था। खास बात ये थी कि सुनी सुनाई नहीं सुनाते थे। अधिकतर किस्से उनके ऊपर गुज़री हुई घटनाओं या सामने होने वाले वाक्यात होते थे। एक बार उन्होंने एक कम उम्र तवायफ की कहानी सुनाई और इस तरह सुनाई थी कि आज तक मुझे याद है और दिल पर उसका असर भी है।
बाबा ने बताया कि हैदराबाद में नाचने गाने और वैश्यावृत्ति करने वालों के बाज़ार का नाम महबूब की मेंहदी है। और यहाँ एक बड़ी मज़ेदार रस्म होती है, जिसे 'दरीचे की सलामी’ कहा जाता है। जब कोई कमसिन तवायफ इस उम्र को पहुंचती है जब जिस्म के हिस्से उभरने लगते हैं, होंठ मुस्कराने लगते हैं और आँखों में एक शरारत भरी चमक आ आती है तो उसे 'दरीचे की सलामी’ के लिये तैयार किया जाता है। कई दिन पहले से जश्न शुरू होता है। साहिबे-ज़ौक और साहिब-ए-नज़र सरपरस्तों को खबर भिजवायी जाती है, दूर-दूर तक निमंत्रण भेजे जाते हैं। करीबी, रिश्तेदार, पड़ोसी और हम पेशा औरतें जमा होना शुरू हो जाती हैं। रतजगे होते हैं, पकवान पकते हैं, मुसलमान वेश्याओं के कोठों पर मजलिसें और मीलाद शरीफ भी होते हैं। जिस लड़की की रस्म होने वाली होती है उसकी नाक में एक बड़ी सी नथ पहनाकर सात दरगाहों पर ले जाया जाता है फिर उसे दुल्हन बनाया जाता है, हालात के मुताबिक आभूषण, कपड़े पहनाये जाते हैं, फूलों के आभूषणों से सजाया जाता है और जब सूरज के जाने और शमाओं के आँखें खोलने का समय होता है तो कमसिन वैश्या की आरती उतारी जाती है, नज़र का टीका लगाया जाता है। और वह उस दरीचे को जो आगे के जीवन में उसे रोज़ी-रोटी और खुशी देने वाला है, झुककर सात सलाम करती है। और उस झरोखे में बैठकर एक नयी रोशनी में उन असंख्य तमाशबीनों को देखती है जिन में से बहुत से वह होते हैं जिनकी आँखों में दिल होते हैं और बहुत से वह भी होते जिनके पास दिल नहीं होते मगर जेब में माल बहुत होता है और फिर नथ उतारने वालों की बोली लगती है।
बाबा ने जिस लड़की की कहानी सुनाई थी उसका (क्लाइमेक्स) ये नहीं था। उन्होंने कहा कि जब उस लड़की को दरीचे पर लाके बिठाया गया तो वह बहुत देर तक चुपचाप बैठी रही। अचानक वह खड़ी हुई, उसने दरीचे की जाली को हाथ लगाकर अपने माथे से छुआ और एक दम से नीचे छलांग लगा दी। इस बाज़ार में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था, इसलिये चारों तरफ सनसनी फैल गयी। जिसने सुना वह दौड़ा आया ताकि उस पागल लड़की को देख सके जिसने शोहरत और दौलत के शिखर से कूद कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। वह लड़की मरी नहीं, बच गयी। मगर उसकी टांगें टूट गयी थी। बाद में वह लड़की, लंगड़ी खुर्शीद के नाम से मशहूर हुई और अपने समय में 'महबूब की मेंहदी’ की बेहद मशहूर गानेवालियों में उसकी गिनती होती है।
मुझे बाबा का सुनाया हुआ एक और किस्सा याद आ रहा है।
हुआ यूँ कि बाबा दिल्ली में थे। एक दिन उसका फोन आया और उन्होंने बताया कि वह बम्बई आ रहे हैं। उन्होंने अपनी रवानगी (प्रस्थान) का दिन और तारी$ख बताई और तय किया कि दो दिन बाद मुझसे मुला$कात करेंगे। दो दिन गुज़र गये, चार दिन गुज़र गये, ह$फ्ता होने को आया मगर बाबा का कोई पता नहीं था। मैंने इधर-उधर मालूम किया तो बताया गया कि बाबा आये ही नहीं हैं। मैंने दिल्ली फोन किया तो $खबर मिली कि वह वहाँ से चल चुके हैं। अब हम सब ज़रा परेशान हुए हालाँकि परेशानी की कोई बात नहीं थी क्योंकि वह अक्सर ऐसी हरकतें किया करते थे। निकलते थे कहीं जाने के लिये और पहुंच जाते थे कहीं और। मगर डर यह भी था कि वह ट्रेन में अकेले थे। उन्हें सांस की बीमारी थी, और ब्लड प्रेशर की भी। अगर रास्ते में कुछ हो गया तो क्या होगा, मगर सिवाये सब्र करने और परेशान होने के रास्ता भी क्या था। इसलिये चुप-चाप बैठे रहे और दुआएँ करते रहे कि बड़े मियाँ खैरियत से पहुंच जायें।
कोई दस दिन बाद अचानक शमा के घर पर नुमूदार हुए। मैं और शमा तो उन पर बरस ही पड़े, 'ये कोई तरीका है, अगर बम्बई नहीं आना था तो फोन क्यों किया था? और अगर इरादा बदल गया था तो दूसरा फोन करके क्यों नहीं बताया।‘
बाबा पर हमारी डांट डपट का कोई असर नहीं हुआ। वह बड़े प्यार से मुस्कुराये 'अरे छोड़ो यार! एक अच्छी वाली चाय पिलाओ तो एक ऐसा किस्सा सुनाता हूँ कि इस पर फिल्म बन सकती है।‘
बाबा ने सुनाया कि मेरठ के पास ग्राण्ड ट्रक रोड के पास दोनों तरफ आमने-सामने दो गांव हैं। (गांव का नाम तो अब मुझे याद नहीं रहा) मगर नाम एक ही था, एक गांव छोटा कहलाता था दूसरा बड़ा। जो गांव बड़ा था वह हिन्दुओं का था और छोटे गांव में मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी। वहां कोई सवा सौ साल से एक रस्म अदा की जाती है।
हर ब$करीद पर हिन्दुओं के गांव से एक गाय, कुर्बानी के लिए मुस्लिम गांव में भेजी जाती है। ब$करीद के दिन सवेरे-सवेरे हिन्दू गांव में गाय को सजाया संवारा जाता है, उसकी पीठ पर नयी झोल डाली जाती है, गले में हार होते हैं, सींग और दुम पर रंगीन रिबन और गोटे से सजावट की जाती है। उसकी आरती उतारी जाती है और फिर ये गाय बैण्ड बाजे और सैकड़ों गांव वालों के साथ किसी दुल्हन की तरह, मुसलमानों के गांव लाई जाती है। गांव के मुसलमान गाय का हार फूल से स्वागत करते हैं। साथ ही आने वालों को मिठाईयाँ बाँटी जाती हैं। फिर गाय को एक चबूतरे पर खड़ा कर दिया जाता है, जिसके चारों तरफ सारे गांव वाले जमा हो जाते हैं। गांव का कसाई, गाय की गर्दन पर छुरी रखता है और कलमा पढ़ के हटा लेता है। फूलों से लदी फदी गाय और उसके साथ आने वाले, तोहफे और मिठाईयाँ लेकर अपने गांव वापस आ जाते हैं।
बाबा ने मुझे बताया कि 1857 ई. में जब अंग्रेज हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने के लिए गाय की कुर्बानी का मसला छेड़ रहे थे और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम झगड़े हो रहे थे उस समय इस छोटे से गांव के जमींदार ने कहा कि हम अपनी गाय कुर्बानी के लिए दे सकते हैं मगर अपनी एकता की कुर्बानी नहीं दे सकते। और तब से यह खूबसूरत रस्म हर साल इसी तरह निभायी जाती है। (किसी पाठक को जी.टी. रोड पर बसे हुये इन दो गांवों के बारे में मालूम हो तो मुझे अवश्य सूचना दें, एहसान मन्द रहूंगा) बाबा को ये कहानी किसी ने ट्रेन में सुनाई थी और वह इस रस्म की सच्चाई मालूम करने उस गांव में जा पहुंचे थे।
बाबा स्वभाव के ऐतबार से काफी बोहेमियन थे। उन्होंने जि़न्दगी भर घर बनाने या घर बसाने की कोई कोशिश नहीं की। वह जीवन की तेज़ धारा में एक तिनके की तरह थे, जो स्वयं को लहरों के सहारे छोड़ देता है। और सदैव एक मंजिल की तलाश में मुब्तिला रहता है। $गालिब ने शायद नियाज़ बाबा के लिए ही कहा था।
रौ में है रक्से उम्र कहां देखिये थके
नै हात बाग पर है, न पा है रकाब में
वह अक्सर कहा करते थे 'मैं तो बंजारा हूँ, खाना बदोश।‘
मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि बाबा में क्या खास बात थी, जिसकी वजह से जो भी उनसे मिलता था उन्हीं का हो जाता था। बाबा के चाहने वाले हज़ारों थे और भांति-भांति के थे। सज्जाद ज़हीर से लेकर कुदसिया ज़ैदी तक, मुज़फ्फर अली से लेकर श्याम बेनेगल तक, और शशि कपूर से लेकर शमा ज़ैदी तक।
कभी-कभी एक आध झलकी बाबा के व्यक्तित्व में छुपी हुई, मक्नातीस (चुम्बक) की भी दिखाई दे जाती थी।
एक शाम मैं कोई नाटक देखकर पृथ्वी थियेटर से बाहर निकला देखा कि पत्थर की सीढिय़ों पर बाबा बैठे हुए हैं, और हाथों में बीड़ी सुलग रही है। देखते ही खड़े हो गये, बड़े प्यार से गले लगाया और कहने लगे 'अरे यार जावेद! बहुत अच्छा हुआ जो तुम मिल गये मैं तुम्हीं को याद कर रहा था। दुल्हन कहाँ है? (मेरी बीबी फरीदा) मैंने कहा 'वह तो आज नहीं आयी।‘
कहने लगे 'अरे ये तो बड़ा नुकसान हो गया। मैंने थोड़ा परेशान होते हुए पूछा, 'क्यों क्या हो गया?’ मेरे पूछने पर बोले 'भई दुल्हन जो है, वह हमारी खजांची है। जब कभी पैसों की ज़रूरत होती है। उससे ले लेते हैं। तुम्हारे पास तो होंगे नहीं।‘ मैंने कहा थोड़े बहुत हैं आपको कितने चाहिये?’ कहने लगे 'हमें तो एक पैसा भी नहीं चाहिये बस- शराब पीनी है अगर पिला सको तो पिला दो अल्लाह भला करेगा।‘
मैं और बाबा पृथ्वी थियेटर से बाहर निकले, वहीं करीब में एक बार था उसमें घुस गये। बार का बंगाली मालिक लपकता हुआ आया, बाबा की खैर-खैरियत पूछी, फिर दरियाफ्त किया 'क्या पियेंगे?’
बाबा ने बड़ी अदा से किया 'व्हिस्की!’ बंगाली कुछ परेशान हो गया 'व्हिस्की?’
बाबा मुस्कराये और बोले 'आज जावेद मियाँ पिला रहे हैं इसलिये ठर्रा नहीं पियेंगे।‘
बंगाली परेशानी से इधर-उधर देखता रहा फिर धीरे से बोला 'बाबा आज व्हिस्की ठर्रा कुछ नहीं मिल सकता। क्यों नहीं मिल सकता? 'ड्राई डे है बाबा!’ बंगाली ने कहा, बाबा परेशान हो गये, 'अब इस सरकारी कमीनेपन को क्या कहा जाये कि जिस लीडर की याद में ड्राई डे रखा गया है वह बहुत बड़ा आदमी था, उसकी मौत का गम दूर करने के लिये शराब से बढ़कर कोई चीज़ नहीं हो सकती मगर इन गधों को कौन समझाये कि जिन्हें प्यासा मार रहे हैं वह मरने वाले को याद नहीं करेंगे, फरियाद करेंगे।Ó
बंगाली सिर खुजाता हुआ चला गया, मैंने पूछा, 'अब?Ó थोड़ी देर सोचते रहे फिर पूछा, 'क्या बजा है? मैंने कहा: दस बज रहे हैंÓ। कहने लगे: चलो कैफी के घर चलते हैं। वह पी रहा होगा।‘ हम दोनों पैदल चलते हुए जानकी कुटीर पहुंचे और कैफी साहब के दरवाज़े पर लगे हुए जहाँगीरी घण्टे की रस्सी खींची।
घण्टा देर तक बजता रहा मगर कोई गेट खोलने नहीं आया। मैंने कहा बाबा अंदर अंधेरा है लगता है कैफी साहब बाहर गये हैं, बाबा ने उचक कर अंदर झांका, अपने मोटे से डण्डे से लकड़ी के गेट को ठोंका और फरमाया, 'कमरा बंद करके बैठा होगा आज ज़रा सर्दी है ना!’ देर तक घण्टा बजाने के बाद एक नौकर आँखें मलता हुआ नुमूदार हुआ और गेट खोले ब$गैर ही कहने लगा, 'साहब और आपा बाहर गये हुए हैं’, 'कब आयेंगे?’ 'ये तो मालूम नहीं’
बाबा कुछ झुँझला से गये। धीरे-धीरे आगे बढ़े, अचानक आँखों में चमक आयी, कहने लगे, 'आदिल’। विश्वामित्र आदिल का घर सामने ही था मगर उनके बरामदे में भी एक नन्हा सा बल्ब जल रहा था जिससे मालूम होता था कि वह लोग भी नहीं हैं।
बाबा ने सिर हिलाया 'ये भी नहीं है। लगता है कैफी के साथ गया होगा।‘ मैंने घड़ी देखी ग्यारह बजने वाले थे, पृथ्वी की भीड़ भी जा चुकी थी। मैंने बाबा की तरफ देखा अचानक रुके। कहने लगे, 'रिक्शा पकड़ लो, मज़रूह साहब के घर चलते हैं। ज़रा कंजूस ज़रूर हैं मगर इतने कंजूस भी नहीं हैं, कि घर आये मेहमानों को दो पैग न पिला सकें चलो-चलो जल्दी करो।‘
मज़रूह साहब का बंगला जुहू के दक्षिणी किनारे पर लगभग आखिरी बंगला था। लेकिन ज़्यादा दूर नहीं था इसलिये जल्दी से पहुंच गये।
घण्टी बजाई, दरवाज़ा खुला, फिरदौस भाभी ने बड़े तपाक से बाबा का स्वागत किया और ड्राइंग रूम में बिठाया। बाबा के चेहरे की मुस्कुराहट कह रही थी, 'देखा आखिर कामयाबी ने कदम चूम ही लिये।‘
फिरदौस भाभी ने पूछा, 'क्या पियेंगे नियाज़ भाई?’ 'मज़रूह कहाँ है?’ बाबा ने पूछा। 'सुबह से बुखार है, सो गये हैं।‘ बाबा का चेहरा देखने लायक था। वह कभी मुझे देखते थे कभी सामने खड़ी फिरदौस भाभी को। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह दिल की बात ज़बान पर लायें या न लायें। अचानक वह खड़े हो गये, 'आदाब कह देना’ और जवाब का इंतज़ार किये बगैर बाहर निकल आये। तब तक रात के बारह बज रहे थे। और हम दोनों जुहू तारा की सड़क पर उन लुटे हुए मुसाफिरों की तरह चल रहे थे जिस के पास न सिर छिपाने का ठिकाना होता है और न कोई उम्मीद!
बड़ी हिम्मत करके मैंने कहा, 'बाबा मैं निकल जाऊँ? कुर्ला पहुंचना है सान्ताक्रूज़ से आखिरी बस मिल जायेगी।‘
बाबा वहीं बीच सड़क पर रुक गये और गरज कर बोले, 'बिल्कुल नहीं! अब तो जि़द आ गयी है जब तक पी नहीं लेंगे तब तक न आप कहीं जायेंगे और न हम।‘
मैं बोल भी क्या सकता था। एक तो अकीदत ऊपर से यह खौफ कि बड़े मियाँ को अकेला छोड़ दिया तो खुदा जाने कहाँ जायें, क्या करें, इसलिये चुप-चाप चलता रहा। चलते-चलते हम लोग जुहू बीच के पास आ गये तब तक बाबा की सारी बीडिय़ाँ खत्म हो चुकी थीं, और सारी गालियाँ भी! अचानक उनके चेहरे से ऐसी रौशनी फूटी जैसे साठ वाट का बल्ब जल गया हो। बहुत ज़ोर से मेरी कमर पर हाथ मारा और कहा, 'वापस।‘ जुहू कोली बाड़ा और उसके आस-पास बहुत सी छोटी मोटी गलियाँ हैं बाबा ऐसी एक गली में घुस गये। दूर-दूर तक अंधेरा था, दो बल्ब जल रहे थे मगर वह रौशनी देने के बजाये तन्हाई और सन्नाटे के एहसास को बढ़ा रहे थे। बाबा थोड़ी दूर चलते फिर रुक जाते, घरों को गौर से देखते और आगे बढ़ जाते।
अचानक वह रुक गये, सामने एक कम्पाउण्ड था जिसके अंदर दस-बारह घर दिखाई दे रहे थे। इनमें से कोई भी घर एक मंजि़ल से अधिक नहीं था और बीच में छोटा सा मैदान पड़ा था जिसमें एक कुआँ भी दिखाई दे रहा था। बाबा ने कहा 'यही है’ और गेट के अंदर घुस गये। मैं भी पीछे-पीछे था मगर डर रहा था कि आज ये हज़रत ज़रूर पिटवायेंगे। बाबा कम्पाउण्ड के बीच में खड़े हो गये। चारों तरफ सन्नाटा था। किसी घर में रौशनी नहीं थी। बाबा ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, 'लारेन्स-लारेन्स’ अचानक एक झोपड़े नुमा घर में रोशनी जली, दरवाज़ा खुला और एक लम्बा-चौड़ा बड़ी सी तोंद वाला आदमी बाहर आया, जिसने एक गंदा सा नेकर और एक धारीदार बनियान पहन रखा था।
जैसे ही उसने बाबा को देखा एक अजीब सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर फैल गयी, 'अरे बाबा। किधर है तुम? कितना टाइम के बाद आया है?’ ये कहते-कहते उसने बाबा को दबोच लिया और फिर ज़ोर-ज़ोर से गवानी भाषा में चीखने लगा। उसने बाबा का हाथ पकड़ा और अंदर की तरफ खींचने लगा, 'आओ आओ अंदर बैठो, चलो, चलो’ फिर वह मेरी तरफ मुड़ा 'आप भी आओ साब! आजाओ आजाओ अपना ही घर है।‘ हम तीनों एक कमरे में दाखिल हुए जहां दो तीन मेज़ें थीं, कुछ कुर्सियाँ और एक सोफा। अंदर एक दरवाज़ा था जिस पर परदा पड़ा हुआ था। बाबा पूछ रहे थे, 'कैसा है तू लारेन्स? माँ कैसी है? बच्चा लोग कैसा है?’
इतनी देर में अंदर का परदा खुला और बहुत से चेहरे दिखाई देने लगे। एक बूढ़ी औरत एक मैली सी मैक्सी पहने बाहर आई और बाबा के पैरों पर झुक गई। बाबा ने उसकी खैर खैरियत पूछी, बच्चों के सिर पे हाथ फेरा और जब ये हंगामा $खत्म हुआ तो लारेन्स ने पूछा, 'क्या पियेंगे बाबा?’
'व्हिस्की!’ बाबा ने कहा
लारेन्स अंदर गया और विहस्की की एक बोतल टेबिल पे ला के रख दी। इसके बाद दो गिलास थे, कुछ चने कुछ नमक, सोडे और पानी की बोतलें। बाबा ने पैग बनाया, लारेन्स अलादीन के जिन की तरह हाथ बांध कर सामने खड़ा हो गया, 'और क्या खाने का है बाबा? माँ मच्छी बनाती, और कुछ चाहिये तो बोलो कोमड़ी (मुर्गी) खाने का मूड है?’ बाबा ने मुझ से पूछा, 'बोलो बोलो भई क्या खाओगे?’
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि बाबा की इतनी आव भगत क्यों हो रही है। अगर ऐसा भी होता कि वह लारेन्स के मुस्तिकल ग्राहकों में से एक होते तो भी रात के दो बजे ऐसी खातिर तो कहीं नहीं होती। यहां तो ऐसा लग रहा था जैसे बाबा अपनी ससुराल में आ गये हों।
थोड़ी देर में मछली भी आ गयी, उबले हुए अण्डे भी और पाव भी। बहरहाल मुझसे बरदाश्त नहीं हुआ, खाना खाते हुए मैंने बाबा से पूछा, 'बाबा अब इस राज़ से पर्दा उठा दीजिए कि इस लारेन्स और उसकी माँ से आपका क्या रिश्ता है?’
कहानी ये सामने आई कि वर्षों पहले जब बाबा अपनी हर शाम लारेन्स के अड्डे पर गुज़ारा करते थे तो एक दिन जब लारेन्स कहीं बाहर गया हुआ था तो उसकी माँ के पेट में दर्द उठा था, दर्द इतना तेज़ था कि वह बेहोश हो गयी थी। उस वक्त बाबा उसे अपने साथ लेकर अस्पताल पहुंचे, पता लगा कि अपेंडिक्स फट गया है, केस बहुत सीरियस था ऑपरेशन उसी वक्त होना था वरना मौत यकीनी थी। बाबा ने डॉक्टर से कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये और न जाने कहां से और किन दोस्तों से पैसे जमा करके लाये, बुढिय़ा का ऑपरेशन कराया और जब लारेन्स अस्पताल पहुंचा तो उसे खुश खबरी मिली कि उसकी माँ मौत के दरवाजे पे दस्तक दे वापस आ चुकी है।
............ थैंक्स टु नियाज़ बाबा................
इस कहानी में एक खास बात ये है कि लारेन्स और उसकी माँ के बार-बार खुशामद करने के बाद भी बाबा ने वह पैसे कभी वापस नहीं लिये जो उन्होंने अस्पताल में भरे थे।
सुबह तीन बजे के करीब जब बाबा को लेकर बाहर निकल रहा था तो मैंने पलट कर देखा था, लारेन्स की माँ अपनी आँखें पोछ रही थी और लारेन्स अपने हाथ जोड़े सिर झुकाये इस तरह खड़ा था जैसे किसी चर्च में खड़ा हो। बाबा का एक मज़ेदार किस्सा हरी भाई (संजीव कुमार) ने मुझे सुनाया था।
जब तक विश्वामित्र आदिल बम्बई में रहे हर साल इप्टा की 'दावत-ए-शीराज़Ó उनके घर पर होती रही। हर नया और पुराना इप्टा वाला अपना खाना और अपनी शराब लेकर आता था और इस महफिल में शरीक होता था। सारी शराब और सारे खाने एक बड़ी सी मेज़ पर चुन दिये जाते और जिसका जो जी चाहता खा लेता और जो पसन्द आता वह पी लेता। ये एक अजीबो गरीब महफिल होती थी। जिसमें गाना, बजाना, नाचना, लतीफे, चुटकुले, ड्रामे सभी कुछ होता था। और बहुत कम ऐसे इप्टा वाले होते जो इसमें शरीक न होते हों। ऐसी ही एक 'दावते शीराज़Ó में हरी भाई नियाज़ बाबा से टकरा गये और जब पार्टी खत्म हो गई तो अपने साथ अपने घर ले गये। हरी भाई देर से सोते थे और देर से जागते थे। इसलिये वहाँ भी सुबह तक महफिल जमी रही। पता नहीं किस समय हरी भाई सोने के लिये चले गये और बाबा वहीं कालीन पे लेट गये। दूसरे दिन दोपहर में हरी भाई सोकर उठे और रोज़ाना की तरह तैयार होने के लिए अपने बाथरूम में गये। मगर जब उन्होंने पहनने के लिए अपने कपड़े उठाने चाहे तो हैरान हो गये, क्योंकि वहाँ बाबा का मैला कुर्ता पाजामा रखा हुआ था और हरी भाई का सिल्क का कुर्ता और लुंगी $गायब थे।
हरी भाई ने नौकर से पूछा तो यह बात मालूम हुई कि वह मेहमान जो रात को आये थे सुबह सवेरे नहा धोकर सिल्क का लुंगी कुर्ता पहन के रु$ख्सत हो चुके हैं।
कहानी यहाँ $खत्म नहीं होती है।
इस कहानी का दूसरा हिस्सा ये है कि कोई दो महीने बाद एक दिन अचानक नियाज़ बाबा हरी भाई के घर जा धमके और छूटते ही पूछा, 'अरे यार हरी! पिछली दफा जब हम आये थे तो अपना एक जोड़ा कपड़ा छोड़ गये थे वह कहाँ है?’ हरी भाई ने कहा, 'आपके कपड़े तो मैंने धुलवा के रख लिये हैं मगर आप जो मेरा लुंगी कुर्ता पहन के चले गये थे वह कहाँ है?’
बाबा ने बड़ी मासूमियत से अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, सिर खुजाया और बोले, 'हमें क्या मालूम तुम्हारा लुंगी कुर्ता कहाँ है? हम कोई एक जगह कपड़े थोड़ी बदलते हैं?’
हरी भाई जब भी ये किस्सा सुनाते थे बाबा का जुमला याद करके वे बेतहाशा हंसने लगते थे। बाबा के छोटे-मोटे चुटकुले तो इतने हैं कि किताब तैयार हो सकती है। मगर चलते-चलते एक ऐसा किस्सा सुन लीजिए जिससे उनके व्यक्तित्व के एक और पहलू पर प्रकाश पड़ता है।
एक दिन बाबा मिले तो बहुत खिले-खिले से थे, कुछ धुले-धुलाये भी लग रहे थे। मैंने वजह पूछी तो कहने लगे, 'अरे तुम्हें नहीं मालूम श्याम हम से अपनी फिल्म लिखवा रहा है।‘
पूछा, 'श्याम कौन?’
कहने लगे, 'ओफ्फोह श्याम बेनेगल और कौन? भई बहुत अच्छा आदमी है। जितना अच्छा डायरेक्टर है उससे भी ज़्यादा अच्छा इंसान है। उसने हमें अपने आफिस में एक मेज दे दी है और होटल में खाने का प्रबन्ध कर दिया है। सुबह जाते हैं तो मेज़ पर बीड़ी के दो बण्डल और माचिस भी मिलती है। और चाय तो दिन भर आफिस में बनती रहती है और क्या बतायें, हम आजकल ऐश कर रहे हैं।‘
मैंने बाबा को मुबारक बाद दी और दबी जुबान से कहा, 'आपको अपनी सलाहियत दिखाने का बेहतरीन मौका मिला है इसे बीच में छोड़ के भाग मत जाइयेगा जैसा कि आपकी आदत है।‘
कुछ दिन बाद की बात है, मैं शमा के घर बैठा हुआ था। हम दोनों किसी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे कि अचानक आ धमके। न जाने कहाँ से आ रहे थे, बुरी तरह हांफ रहे थे और काफी उजड़े-उजड़े लग रहे थे। जब पानी वानी पी चुके थे तो हमने खैरियत पूछी, फरमाया, 'अजीब आदमी है बात को समझता ही नहीं है। अरे दो वक्त खाने और दो बण्डल बीड़ी से जि़न्दगी थोड़ी गुज़र सकती है।‘ शमा ने पूछा, 'क्या श्याम ने कुछ कह दिया बाबा’
'अरे कहे तो तब, जब सुने। वह सुनता ही नहीं।‘
'क्या नहीं सुनता।‘ मैंने पूछा
'अरे भई हमें पैसे की ज़रूरत पड़ती है और भी तो पचास ज़रूरतें हैं कि नहीं?’
शमा ने कहा, 'मगर ये बात तो मेरे सामने तय हुई थी कि आपको कैश नहीं दिया जायेगा, क्योंकि आप उसकी शराब पी डालेंगे! और काम अधूरा छोड़कर चले जायेंगे। बाबा, गुस्से में लाल हो गये, बीड़ी जो अभी-अभी सुलगाई थी उसे चाय की प्याली में बुझा दिया और गरजकर बोले, 'कैसे बातें करती हो शमा बीबी। हमारी शराब से हमारे काम का क्या ताल्लुक है? तुम ने तो देखा था बेगम साहिबा (बेगम कुदसिया ज़ैदी, शमा ज़ैदी की वालिदा) के लिये हमने कितना काम किया। क्या उन्होंने हमारी शराब बन्द करवाई थी?’
शमा अचानक बहुत ज़ोर से हंसी और मेरी तरफ मुड़ के बोली, 'तुम को मालूम है जावेद! हमारी अम्मा उनसे कैसे काम करवाती थी। इन्हें कमरे में बन्द कर देती थीं और खिड़की के बाहर उनकी पहुंच से दूर एक बोतल रख दिया करती थीं और कहती थी कि काम खत्म करोगे तभी ये बोतल तुम्हारे पास आयेगी। ये बहुत चीखते थे मगर हमारी अम्मी पर उनकी किसी बात का कोई असर नहीं होता था।‘
बाबा को भी पुराने दिन याद आ गये, 'बहुत ज़ोर से कहकहा लगाया और फरमाया, 'तो हम कहाँ कहते हैं कि काम के बीच में पीयेंगे मगर शाम के लिये तो पैसे मिलने ही चाहिये। पैसों पर हमें याद आया, अरे भाई बाहर एक टैक्सी खड़ी है उसका किराया भिजवा देना!’
मैं बाहर निकला, टैक्सी वाले से पूछा, 'किराया कितना हुआ?Ó
कहने लगा, 'एक सौ सत्तर रुपये’
'एक सौ सत्तर?’ मैंने हैरान होकर पूछा।
टैक्सी वाला बाहर निकल आया, 'आप खुद देख लो साब! मीटर अभी तक चल रहा है।‘ मुझे मालूम था कि बाबा वरली पर एक गेस्ट हाउस में रहते हैं मगर ये वह ज़माना था जब वरली से जुहू तक का टैक्सी का किराया पच्चीस तीस रुपये होता था, इसलिये एक सौ सत्तर सुनकर मेरी हैरत ठीक थी।
मीटर भी झूठ नहीं बोल रहा था, मगर ये कैसे हो सकता है। मैंने कहा, 'मगर मेरे भाई वरली से यहाँ तक इतने बहुत से पैसे कैसे हो सकते हैं?’ टैक्सी वाला चिढ़ गया, 'क्या बात करते हैं साब? सवेरे नौ बजे गाड़ी पकड़ी थी, किधर-किधर जाके आये हैं, साब मजगांव, माहिम, बान्द्रा और सब जगह पे मेरे को रोक के रखा।‘
मैं समझ गया और मैंने चुप-चाप एक सौ सत्तर रुपये अदा कर दिये मगर गुस्सा बहुत आया। ये क्या तरीका है, जेब में पैसे नहीं तो टैक्सी में घूमने की क्या ज़रूरत है, मगर वह ऐसी छोटी-छोटी बातों की परवाह करते तो नियाज़ हैदर काहे को होते।
श्याम बाबू को बुरा भला कहने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कई महीनों जारी रहा। जब भी मिलते बेनेगल की शान में ऐसे $कसीदे पढ़ते कि लिखे नहीं जा सकते। शिकायत एक ही थी कि बाबा के चीखने चिल्लाने डराने धमकाने और खुशामद के बावजूद श्याम बेनेगल ने उन्हें पैसे नहीं दिये थे।
फिर एक दिन यूँ हुआ कि मैं रोजाना की तरह शमा के घर बैठा हुआ था जो एक तरीके से हमारा आफिस बन चुका था। एम.एस. सथ्यू भी बंगलौर से आये हुए थे और कुछ बहुत मज़ेदार बातें हो रही थीं कि बाबा प्रकट हो गये। उस दिन भी वह हांफ रहे थे और पसीने में तर थे। आते ही उन्होंने अपनी फूली हुई सांसों में श्याम को बुरा भला कहना शुरू कर दिया, 'मुझे आज तक किसी ने इतना परेशान नहीं किया जितना इस आदमी ने किया है। मेरी समझ में इसकी कोई भी बात नहीं आती।‘
'अब क्या कर दिया श्याम ने?’ शमा कुछ उखड़ सी गयीं।
बाबा बैठे से खड़े हो गये, जेब में हाथ डाला और दस हज़ार रुपये निकाल कर बोले, 'ये देखो इस नालायक आदमी ने ये रुपये मुझे थमा दिये। अब तुम बताओ मैं इनका क्या करूँ?’
हम तीनों एक दूसरे का मुँह देखने लगे। क्या आदमी है भई, नहीं मिला था तो भी नाराज़ और अब मिलने पर भी नाराज़। शमा ने कहा, 'ये आपके काम की मेहनत है खर्च कीजिए!’ 'वही तो पूछ रहा हूँ कहाँ खर्च करूँ?’ बाबा ने पूछा। सथ्यू ने अपनी दाढ़ी खुजाई और कुछ सोचते हुए बोले 'आपको किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है क्या?’ बाबा ने कहा, 'ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है कि इतने बहुत से पैसों की ज़रूरत पड़े।‘ शमा ने राय दी, 'सबसे पहले तो आप अपने लिये कुछ कपड़े बनवा लीजिए’
बाबा खुश हो गये, कहने लगे, 'हाँ ये बहुत अच्छी बात है। हमारे पास दो ही कुरते रह गये हैं।‘
'और कुछ’ सथ्यू ने पूछा।
वह कुछ देर सोचते रहे फिर बोले, 'हैदराबाद में मेरी एक बहन रहती हैं, अगर किसी सूरत से उनका पता मालूम हो सके तो एक हज़ार रुपये उनको भिजवा दूँ। 'और कुछ?’ 'और कुछ नहीं।‘
'तो एक काम करते हैं।‘ सथ्यू ने कहा, 'हज़ार बहन के, पन्द्रह सौ कपड़े के और ये बाकी के साढ़े सात हज़ार रुपये बैंक में जमा करा देते हैं।‘
'मगर बैंक में तो हमारा खाता नहीं है।‘ 'ये कौन सी बड़ी बात है?’ सथ्यू ने कहा 'चलिये उठिये।‘
सथ्यू बाबा को लेकर अपने बैंक में गये और पूरे साढ़े सात हज़ार रुपये जमा करके बाबा को भी सरमायादारों की फेहरिस्त में खड़ा कर दिया। आपको लग रहा होगा कि ये दिलचस्प कहानी यहाँ खत्म हो गयी। जी नहीं! इसका आिखरी हिस्सा बाकी है।
इस घटना के कोई तीन महीने बाद एक दिन दोपहर बाद नियाज़ बाबा शमा के घर में इस तरह दाखि़ल हुए कि उनके आगे-आगे एक दस ग्यारह बरस का लड़का उनका झोला और डण्डा उठाये हुए चल रहा था और पीछे एक पतली-दुबली खादी की सफेद साड़ी में लिपटी हुई सांवली सी लड़की थी जिसकी उम्र सत्ताईस से अधिक न होगी।
ये बात तो फौरन समझ में आ गयी कि अपना वजन उठाने के लिये बाबा ने एक छोकरा रख लिया है मगर ये लड़की कौन है? जो खादी की सफेद साड़ी में कांग्रेस सेवा दल की वर्कर मालूम होती है। वह लड़का तो बाबा का सामान रख के किचन की तरफ िखसक गया, बाबा खुद दीवान पर फैल कर बैठ गये और लड़की से कहने लगे, 'जाओ-जाओ तुम अंदर चली जाओ और आराम करो, बहुत थक गयी हो।‘
वह लड़की भी बगैर एक शब्द कहे हुए शमा के बेडरूम में गयी और बिस्तर पर जाके लेट गयी।
दिल में तरह-तरह के $ख्याल आ रहे थे। कहीं अनहोनी तो नहीं हो गयी, बड़े मियाँ ने इस उम्र में किसी का हाथ तो नहीं थाम लिया। मुझे बाबा की हालत भी बेहतर लग रही थी, कपड़े साफ सुथरे थे और इस्तरी किये हुए थे, दाढ़ी और बालों पर कैंची चलने के आसार दिखाई दे रहे थे। चेहरे पर वैसी ही चमक थी जैसी पुराने पीतल पे पालिश करने के बाद आती है। हद तो ये थी कि उनके गंदे मैले नाखून भी कटे हुए थे।
बाबा थे कि लहक-लहक कर इधर-उधर की बातें कर रहे थे मगर मेरे दिमाग में वही लड़की घूम रही थी जो अंदर सो रही थी। जब सस्पेंस बहुत अधिक बढ़ गया तो शमा ने मुझे इशारा किया और मैंने पूछ ही लिया, 'बाबा ये साहिबज़ादी कौन हैं?’
'ये! ये मेरी मीरा है। बहुत पढ़ी लिखी लड़की है, इसने हिन्दी, इंगलिश और संस्कृत में एम.ए. किया है। ट्रिपल एम.ए. है।‘
'मगर आपके साथ?’
बाबा ने शमा को इस तरह घूरा जैसे उन्होंने कोई बहुत ही बेहूदा सवाल किया हो।
बोले, 'सिक्रेटी है मेरी’
'सिके्रटी’ हम दोनों को हैरत का ऐसा झटका लगा कि कुछ बोला ही नहीं गया।
बाबा बड़े प्यार से बता रहे थे, 'दिल्ली में मिली थी, मैं अपने साथ ले आया। सारा डिक्टेशन लेती है, नोट्स भी बनाती है, इसकी वजह से काम बहुत आसान हो गया है।‘ पता चला कि बात सिर्फ सिक्रेट्री तक ही महदूद नहीं है, बाबा ने एक मराठी फैमिली को भी अपने साथ रख लिया है जिसका बेटा बाबा का झोला डण्डा उठा के चलता है और बच्चे के माँ-बाप बाबा के खाने कपड़े और दूसरी आवश्यकताओं के इंचार्ज बने हुए हैं।
दूसरे शब्दों में इन दिनों बाबा बहुत ही बेहतर जि़न्दगी गुज़ार रहे थे।
इस मुलाकात को सिर्फ तीन माह गुज़रा कि एक दिन बाबा फिर अपने पुराने हुलिये में दिखाई दिये। वही झाड़-झंकाड़ दाढ़ी, उलझे हुए बाल और मैले कपड़े। आते ही फरमाया, ज़रा टैक्सी का किराया भिजवाना।
किराया अधिक नहीं था इसलिये चुप-चाप दे दिया गया। फिर बाबा से पूछा गया कि गर्दिश-ए-अय्याम (परेशानी के दिन) पीछे की तरफ कैसे दौड़ गयी? वह आपके नौकर चाकर और वह सिक्रेट्री कहाँ हैं? कुछ नाराज़ से हो गये, कहने लगे 'चली गयी।‘ पूछा, 'कहाँ चाले गयी?’
कहने लगे, 'मुझे क्या मालूम? दो महीने तनख्वाह नहीं मिली तो मीरा भी चली गई।‘
शमा ने कहा, 'पैसे तो थे आपके बैंक में?’ बाबा कुछ ज़्यादा ही नाराज़ हो गये, 'कैसी बातें करती हो बीबी? साढ़े सात हज़ार रुपये में इतनी बरकत थोड़ी होती है कि हज़ार रुपये महीने की सिक्रेट्री और पन्द्रह सौ रुपये महीने के नौकर रखे जा सकें।‘
शराब बाबा की बहुत सी कमज़ोरियों में से एक थी। जैसे मिले, जितनी मिले, जहाँ भी मिले, मिलनी चाहिए। हैरत की बात ये थी कि वह ठर्रा पीयें या स्कॉच, उन्हें नशा नहीं होता था। या यूँ कहना चाहिये कि कम से कम मैंने उन्हें कभी नशे में नहीं देखा। हालाँकि पीने बैठते थे तो अच्छी खासी पी लिया करते थे और पिलाने वाले को टोकते भी जाते थे, 'कल के लिए कर आज न कंजूसी शराब में।‘
मुहर्रम के दस दिन छोड़ के हर रोज़ शाम को मुम्बई वालों के अनुसार उनकी घण्टी बज जाया करती है और फिर वह तब तक दम न लेते थे जब तक सागर व मीना उनके सामने न आ जाये।
अब कोई पूछे कि नियाज़ हैदर जैसा नास्तिक मुहर्रम क्यों मानता था? और दस दिन तक काले कपड़े क्यों पहनता था। तो मेरे पास इसका जवाज़ (तर्क) है, न जवाब। मैं तो बस यही समझता हूँ कि नियाज़ बाबा का व्यक्तित्व जिन विरोधाभासों के ताने बाने से तैयार किया गया था, ये अमल भी उसका एक हिस्सा था।
एक शाम मैंने डरते-डरते पूछ ही लिया, 'जब आप पर असर ही नहीं होता है तो पीते क्यों हैं?’
मुस्कराये, और बोले,
मय से गरज़ निशात है किस रू सियाह को
यक गोना बे खुदी मुझे हर रात चाहिये।
मैंने कहा, 'लीवर खराब करने से क्या फायदा? आपको नशा तो होता ही नहीं है जिसके लिये लोग शराब पीते हैं’
बाबा बहुत फलसफयाना मूड में थे। कहने लगे, 'ब्रादर! नशा इंसानी दिमाग की एक कैिफयत का नाम है, ये किसी चीज़ में नहीं होता और ये बात मुझसे अधिक कोई और नहीं जानता। क्योंकि ऐसा कोई नशा नहीं हैं, सिवाये एक के, जो मैंने नहीं किया बल्कि मथुरा के साधुओं के साथ बैठकर धतूरे के लड्डू खा चुके हैं और निहंग सरदारों के साथ पत्थर पर संखिया की लकीरें खींच कर उन्हें ज़बान से चाट चुके हैं।
'संखिया? ये न थी हमारी िकस्मत कि विसाले-यार होता। फिर ज़रा विस्तार से बताया कि संखिया चाटना हर ऐरे-गैरे के बस का नहीं।
पत्थर पर संखिया से लकीरे खींच दी जाती हैं जो तीन से पांच इंच लम्बी होती हैं। इस नशे के शौकीन अपनी आवश्यकता और क्षमता के हिसाब से इन लकीरों को ज़बान से चाट लेते हैं। अधिकतर लोग तीसरी लकीर तक पहुंचते-पहुंचते ढेर हो जाते हैं। सुना है कि कुछ सूरमा सात लकीरों का रिकार्ड भी बना चुके हैं।
'कैसा होता है संखिया का नशा?’
'किसी भी नशे को बयान करना बड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि शब्द एहसास को बयान नहीं कर सकते।‘ 'और वह कौन सा नशा है जो आपने नहीं किया?’
'कुछ लोग नशे के लिए अपने आप को सांप से डसवाते हैं। मगर मैं ये हरकत कभी नहीं कर सकता।‘, 'क्यों? क्या आपको सांपों से डर लगता है?, 'डर तो नहीं लगता मगर बहुत गंदे लगते हैं।, 'बहुत से लोग तो आस्तीनों में सांप रखते हैं? 'वह भी बहुत गंदे होते हैं।
तो ऐसे थे हमारे नियाज़ बाबा!
1988 ई. में बाबा दिल्ली में थे,
एक दिन फोन आया, बहुत जोश में थे कहने लगे 'जावेद मियाँ। हमें मकान मिल गया है, हमारा अपना मकान अरे सरकार ने दिया है भाई! तुम दिल्ली आओ तो हमारे ही पास ठहरना, बल्कि एक काम करो तुम और शमा आजकल जिस स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हो उसे लेकर आ जाओ। बड़ी मज़ेदार सर्दियाँ हैं, अंगीठी जल रही है, शराब भी चल रही है मगर कोई दोस्त पास नहीं है। बल्कि हम तो कहते हैं कि दुल्हन और बच्चों को भी ले आओ, हमारा घर आबाद हो जायेगा। तो तुम लोग आ रहे हो न?’
मैं बहुत खुश हुआ कि सारी उम्र भटकने के बाद बाबा को एक घर मिल ही गया जिसे वह अपना कह सकते हैं। मैंने आने का वादा भी कर लिया और इरादा भी।
फरवरी 1989 ई. में अचानक खबर आई कि बाबा जिस घर को लेकर इतना खुश हो रहे थे, उन्होंने वह भी छोड़ दिया और एक ऐसे मकान में चले गये जहाँ उनके अलावा कोई और नहीं रह सकता।
किसी ने सच ही कहा है, 'बंजारे के सिर को पक्की छत रास नहीं आती!’
(लिप्यंतरण- शकील सिद्दीकी)
जावेद सिद्दीकी थियेटर और सिने जगत का चर्चित नाम है। थियेटर और सिनेमा, दोनों क्षेत्रों में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं तथा नियाज़ हैदर का लम्बा सान्निध्य उन्हें प्राप्त रहा है।
“..जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा..” नियाज़ हैदर की एक नज़्म की ये दो पंक्तियाँ पिछले कई दशकों से जनआन्दोलनों का प्रिय नारा बनी हुई हैं। वे जितने बीहड़ किस्म के कम्युनिस्ट थे उतने ही प्रकाण्ड विद्वान। सुख सुविधा और अवसरों को ठोकर मारने वाले। यायावर, अन्वेषी तथा ज़बरदस्त सृजनात्मक क्षमताओं से सम्पन्न। शायर, लेखक, रंगकर्मी की हैसियत अपनी जगह, कट्टर किस्म के स्वाभिमानी भी थे एक मामले में नीतिगत असहमति के कारण देश के सबसे मजबूत प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था। नियाज़ हैदर को करीब से, आत्मीयता से देखते हुए जावेद सिद्दीकी को यहाँ पढ़िए.. वसुधा -85 के सौजन्य से ...
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बंजारा
जावेद सिद्दीकी
अगर सूट पहने हुए होते और ज़रा थोड़े से गोरे होते तो कोई भी कसम खा लेता कि कार्ल मार्क्स जि़न्दा हो गये हैं। वही झाड़-झन्कार दाढ़ी, वही बड़ा सा सिर, आगे से उड़े बाल और सिर के पिछले हिस्से में खिचड़ी बालों की मोटी झालर जो कानों के ऊपर से लटक कर दाढ़ी में शामिल हो गयी थी। बदन भी कुछ वैसा ही था, यानी छोटे भी थे और मोटे भी। खुदा जाने नियाज़ हैदर ने अपना हुलिया खुद बनाया था या बन गया था। सच्चाई जो भी हो वह देखने में ही निहायत मार्क्सिस्ट लगते थे। मैंने पहली बार नियाज़ हैदर को मुज़फ्फर अली के घर पर देखा था। मैं और शमा ज़ैदी, मुज़फ्फर के जुहू वाले बंगले के खूबसूरत लॉन में बैठे थे जिसमें गद्दे और गाव तकिये लगे थे। गद्दों पर चाँदनियाँ बिछी थीं और रंगीन शीशों वाले दरवाज़ों पर बारीक काम की चिकें पड़ी हुई थीं। मुज़फ्फर सदैव इस बात की कोशिश करते हैं कि उनके घर में दाखिल होने वाला हर शख्स फौरन समझ जाये कि मुज़फ्फर अपना लखनऊ हर जगह अपने साथ लेकर चलते हैं। हमारी ये मुलाकातें लगभग प्रति दिन होती थीं क्योंकि उमराव जान की शूटिंग सिर पर थी और स्क्रिप्ट के नोंक पलक ठीक किए जा रहे थे। अचानक सुभाषिनी ने दरवाजे में से मुंह निकाला और ऐलान किया 'बाबा आ रहे हैं’ बाबा का नाम सुनते ही मुज़फ्फर संभल कर ठीक होकर बैठ गये, आँखों में एक शरारत भरी सी चमक आयी और होटों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी। शमा ने सिर टेढ़ा करके दरवाज़े की तरफ देखा और अपना कलम (पेन) बन्द करके थैले में डाल दिया।बड़ी अहम और गरमा गरम बहस चल रही थी, इसमें इस तरह ब्रेक लगना मुझे अच्छा नहीं लगा। गुस्से में जिस तरह आधा लेटा था उसी तरह लेटा रहा। आये जिसको भी आना है, मुझे क्या?
चिक के पीछे से पहले एक निहायत मोटा सा डण्डा आया और फिर बाबा। खादी का ढीला-ढाला घुटनों तक लम्बा कुर्ता जो पहले कभी लाल रहा होगा मगर धुलते-धुलते बादामी हो गया था। बड़े पायचों का मैला सा पाजामा, कन्धे पर खादी का झोला और मामूली सी दो पट्टी वाली चप्पल। हुलिया वही था जो ऊपर बयान कर चुका हूँ। बाबा ने छोटी-छोटी चमकती हुई आँखों से सबको देखा, गले से हँसी जैसी एक आवाज़ निकाली और बोले 'आहा शमा बीबी भी हैं।‘
शमा ने आदाब किया और कहा 'ये जावेद हैं।‘
मुज़फ्फर ने डण्डा लेकर कोने में रखा और जहाँ खुद बैठते थे वहाँ बैठने का इशारा करते हुए अदब से कहा 'बैठिये बाबा।‘
बाबा ने एक निगाह, जो बज़ाहिर निगाह से कम थी मेरी तरफ डाली, हल्के से सिर हिलाया और गाव तकिये से इस तरह लग कर बैठ गये जैसे मजलिस पढऩे वाले हों। सुभाषिनी अन्दर आ गयीं: 'क्या लेंगे बाबा?’
'भई हमारी माचिस खत्म हो गयी है।‘
'अरे माचिस लाओ!’ मुज़फ्फर ने आवाज़ लगायी। माचिस आई, बाबा ने कुर्ते की जेब से बीड़ी का बन्डल निकाला एक बीड़ी चुनी और माचिस जलाकर पहले बीड़ी को सेंका और फिर सुलगाकर एक लम्बा कश लगाया। फिर बीड़ी को उंगलियों में इस तरह पकड़ लिया जैसे बिस्मिल्लाह खाँ शहनाई पकड़ते हैं, और फरमाया 'कहाँ तक पहुँची कहानी?’ 'स्क्रिप्ट तो पूरी हो गयी है, शहरयार का इन्तेज़ार है, आ जायें तो गाने भी फाइनल हो जायें।‘
'जावेद ने डायलाग बहुत अच्छे लिखे हैं बाबा।‘ मुज़फ्फर ने कहा।
'अच्छा आपने पहले क्या लिखा है मियाँ?’
'शतरंज के खिलाड़ी के डायलाग भी हम दोनों ने लिखे थे।‘ शमा ने बताया।
'बेहूदा फिल्म थी, प्रेमचन्द की कहानी का सत्तिया नास कर के रख दिया जाहिल! हाँ डायलाग ठीक-ठाक थे कम से कम ज़बान की कोई गलती नहीं थी।‘
गुस्से में मेरे होठों तक एक शब्द आया 'ईडियट मगर मुँह से निकला: 'शुक्रिया’
नियाज़ हैदर इधर-इधर की बातें करते रहे और मैं उन्हें घूरता रहा। ये हैं कौन? बातें तो ऐसी कर रहा है जैसे सारा अदब अभी-अभी पीकर आ रहा हो। ढोंगी।
बीच में थोड़ी सी तवज्जो बंट गयी थी, शायद मुज़फ्फर का बेटा शाद आ गया था और बाबा उससे बातें करने लगे थे। मैंने मौका पाकर शमा से पूछा: 'ये कौन हैं शमा?’
'अरे! तुम नहीं जानते, ये नियाज़ बाबा हैं, नियाज़ हैदर’ नियाज हैदर? मैं दिल ही दिल में अपना सिर पकड़ के बैठ गया। मुझे क्या मालूम था कि ऐसे होते हैं नियाज़ हैदर। ये थी बाबा से मेरी पहली मुलाकात।
इसके बाद बाबा से लगातार मुलाकातें होती रहीं। कभी मुज़फ्फर अली के घर पे, कभी शमा के घर पे, कभी कैफी साहब के यहाँ, और कभी पृथ्वी थियेटर पर। और जैसे-जैसे नियाज़ बाबा के साथ मुलाकातें बढ़ीं, मेरी नियाज़ मन्दी भी बढ़ती गई। जैसे-जैसे मैं उनके करीब आता गया या यूँ कहना चाहिए, जैसे-जैसे वह मेरे करीब आते गये मुझ पर राज खुलता गया कि बाबा तो बड़े बा कमाल आदमी हैं। और इस बात पर हैरत और अफसोस भी हुआ कि दुनिया उनके बारे में कितना कम जानती है। बाबा अच्छाइयों और बुराइयों का अजीबो गरीब मजमूआ (संकलन) थे। उनकी बातें सुनकर कभी डर लगता था और कभी अकीदत से सिर झुका लेने को जी चाहता था।
अल्लाह जाने कहाँ तक पढ़ा था, कोई डिग्री विग्री भी थी या नहीं, मगर बहुत कम सब्जेक्ट ऐसे थे जिन पर वह नहीं बोल सकते थे। भाषायें भी बहुत सारी जानते थे। उर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी तो जानते ही थे, थोड़ी बहुत संस्कृत, कुछ लैटिन और तेलुगू भी जानते थे। और बोलियों ठोलियों का तो जि़क्र ही क्या, अवधी से लेकर भोजपुरी तक अच्छी तरह समझते थे, बल्कि समझा भी सकते थे। याददाश्त इस $गज़ब की थी कि $खौफ आने लगता था। शायर का नाम लीजिए और कलाम का नमूना हाजि़र है। इ$कबाल उनके पसंदीदा शायर थे। मेरा $ख्याल है उन्हें इकबाल का सारा फारसी और उर्दू कलाम याद था।
बाँग-ए-दरा से ज़र्ब-ए-कलीम तक यूँ मज़े ले लेकर सुनाया करते थे, जैसे अभी रट के आये हों। बाबा के अपने कलाम में भी ल$फ्ज़ों का जो आहंग मिलता था, उनमें इकबाल की गूंज सुनाई देती थी। ये कमज़ोरी थी या खूबी, जानबूझ कर ऐसा करते थे या लाशुऊर (अवचेतन) अपना खेल दिखाता था। कुछ कहा नहीं जा सकता। मैं अक्सर उन्हें छेडऩे के लिये इ$कबाल के खिलाफ कुछ कह दिया करता था। एक बार मैंने कहा: 'इकबाल तो शायर-ए-इस्लाम हैं, मेरी समझ में नहीं आता कि आप और सरदार जाफरी जैसे कट्टर माक्र्सवादी उनकी पूजा क्यों करते हैं?’ बाबा गुस्से में लाल-पीले हो गये और पूरे दो घण्टे का एक बड़ा लेक्चर दिया जिसमें ये साबित किया कि इकबाल तरक्की पसन्द शायर थे।
उनकी फारसी का भी यही आलम था। एक दिन मैंने काआनी (फारसी का एक शायर) के कसीदे का जि़क्र किया जो मैंने मुंशी कामिल के कोर्स में पढ़ा था, और जिसका एक ही शेर याद रह गया था:
बगर दूँ तीरहे अब्र बा आमदा बरुश्द अज़ दरिया
जवाहर खेज़ व गौहर बेज़ व गौहर रेज़ व गौहर ज़ा
सुनते ही बाबा की आँखों में चमक आ गयी, सम्भल कर बैठे, एक हाथ से बालों को ठीक किया, दूसरे हाथ से हवा में बीड़ी लहराई और काआनी का करीब सौ शेर का कसीदा फर-फर सुना दिया। यही नहीं बल्कि इस ज़मीन में उर्फी और नज़ीरी ने भी जो कुछ कहा था वह भी सुना दिया। आप सोच सकते हैं कि क्या हालत हुई होगी। कबीर के दोहे, तुलसी की चौपाइयाँ और गालिब के शेर तो बातों के बीच में पके हुये आमों की तरह टपकते ही रहते थे। बाबा के गैर मामूली हाफ्ज़े (स्मरण शक्ति) और अध्ययन का असर उनकी तहरीर में साफ झलकता है, उन्होंने बहुत कम लिखा मगर जो कुछ भी लिखा खूब लिखा।
जब कुदसिया ज़ैदी ने बरतोल बर्तोल्त के नाटक- काकेशियन चाक सर्किल का अनुवाद- 'सफेद कुण्डली’ के नाम से किया तो गीत नियाज़ बाबा से लिखवाये। इस नाटक में उनके लिखे हुये कई गीत: 'सुन मेरा अफसाना रे भाई, 'चार सूरमा, 'चार जरनैल, चले ईरान, और ‘सिपहइया जल्दी आना, एक ज़माने में फिल्मी गानों की तरह मशहूर हो गये थे। बाबा की लेखनी में भी बड़ा दम-खम था। मुज़फ्फर अली का सीरियल जान-ए-आलम और श्याम बेनेगल की फिल्म 'आरोहण’ में भाषा और बयान पर बाबा की पकड़ का अंदाज़ा किया जा सकता है।
बाबा को किस्से कहानियाँ सुनाने का बड़ा शौक था। खास बात ये थी कि सुनी सुनाई नहीं सुनाते थे। अधिकतर किस्से उनके ऊपर गुज़री हुई घटनाओं या सामने होने वाले वाक्यात होते थे। एक बार उन्होंने एक कम उम्र तवायफ की कहानी सुनाई और इस तरह सुनाई थी कि आज तक मुझे याद है और दिल पर उसका असर भी है।
बाबा ने बताया कि हैदराबाद में नाचने गाने और वैश्यावृत्ति करने वालों के बाज़ार का नाम महबूब की मेंहदी है। और यहाँ एक बड़ी मज़ेदार रस्म होती है, जिसे 'दरीचे की सलामी’ कहा जाता है। जब कोई कमसिन तवायफ इस उम्र को पहुंचती है जब जिस्म के हिस्से उभरने लगते हैं, होंठ मुस्कराने लगते हैं और आँखों में एक शरारत भरी चमक आ आती है तो उसे 'दरीचे की सलामी’ के लिये तैयार किया जाता है। कई दिन पहले से जश्न शुरू होता है। साहिबे-ज़ौक और साहिब-ए-नज़र सरपरस्तों को खबर भिजवायी जाती है, दूर-दूर तक निमंत्रण भेजे जाते हैं। करीबी, रिश्तेदार, पड़ोसी और हम पेशा औरतें जमा होना शुरू हो जाती हैं। रतजगे होते हैं, पकवान पकते हैं, मुसलमान वेश्याओं के कोठों पर मजलिसें और मीलाद शरीफ भी होते हैं। जिस लड़की की रस्म होने वाली होती है उसकी नाक में एक बड़ी सी नथ पहनाकर सात दरगाहों पर ले जाया जाता है फिर उसे दुल्हन बनाया जाता है, हालात के मुताबिक आभूषण, कपड़े पहनाये जाते हैं, फूलों के आभूषणों से सजाया जाता है और जब सूरज के जाने और शमाओं के आँखें खोलने का समय होता है तो कमसिन वैश्या की आरती उतारी जाती है, नज़र का टीका लगाया जाता है। और वह उस दरीचे को जो आगे के जीवन में उसे रोज़ी-रोटी और खुशी देने वाला है, झुककर सात सलाम करती है। और उस झरोखे में बैठकर एक नयी रोशनी में उन असंख्य तमाशबीनों को देखती है जिन में से बहुत से वह होते हैं जिनकी आँखों में दिल होते हैं और बहुत से वह भी होते जिनके पास दिल नहीं होते मगर जेब में माल बहुत होता है और फिर नथ उतारने वालों की बोली लगती है।
बाबा ने जिस लड़की की कहानी सुनाई थी उसका (क्लाइमेक्स) ये नहीं था। उन्होंने कहा कि जब उस लड़की को दरीचे पर लाके बिठाया गया तो वह बहुत देर तक चुपचाप बैठी रही। अचानक वह खड़ी हुई, उसने दरीचे की जाली को हाथ लगाकर अपने माथे से छुआ और एक दम से नीचे छलांग लगा दी। इस बाज़ार में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था, इसलिये चारों तरफ सनसनी फैल गयी। जिसने सुना वह दौड़ा आया ताकि उस पागल लड़की को देख सके जिसने शोहरत और दौलत के शिखर से कूद कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। वह लड़की मरी नहीं, बच गयी। मगर उसकी टांगें टूट गयी थी। बाद में वह लड़की, लंगड़ी खुर्शीद के नाम से मशहूर हुई और अपने समय में 'महबूब की मेंहदी’ की बेहद मशहूर गानेवालियों में उसकी गिनती होती है।
मुझे बाबा का सुनाया हुआ एक और किस्सा याद आ रहा है।
हुआ यूँ कि बाबा दिल्ली में थे। एक दिन उसका फोन आया और उन्होंने बताया कि वह बम्बई आ रहे हैं। उन्होंने अपनी रवानगी (प्रस्थान) का दिन और तारी$ख बताई और तय किया कि दो दिन बाद मुझसे मुला$कात करेंगे। दो दिन गुज़र गये, चार दिन गुज़र गये, ह$फ्ता होने को आया मगर बाबा का कोई पता नहीं था। मैंने इधर-उधर मालूम किया तो बताया गया कि बाबा आये ही नहीं हैं। मैंने दिल्ली फोन किया तो $खबर मिली कि वह वहाँ से चल चुके हैं। अब हम सब ज़रा परेशान हुए हालाँकि परेशानी की कोई बात नहीं थी क्योंकि वह अक्सर ऐसी हरकतें किया करते थे। निकलते थे कहीं जाने के लिये और पहुंच जाते थे कहीं और। मगर डर यह भी था कि वह ट्रेन में अकेले थे। उन्हें सांस की बीमारी थी, और ब्लड प्रेशर की भी। अगर रास्ते में कुछ हो गया तो क्या होगा, मगर सिवाये सब्र करने और परेशान होने के रास्ता भी क्या था। इसलिये चुप-चाप बैठे रहे और दुआएँ करते रहे कि बड़े मियाँ खैरियत से पहुंच जायें।
कोई दस दिन बाद अचानक शमा के घर पर नुमूदार हुए। मैं और शमा तो उन पर बरस ही पड़े, 'ये कोई तरीका है, अगर बम्बई नहीं आना था तो फोन क्यों किया था? और अगर इरादा बदल गया था तो दूसरा फोन करके क्यों नहीं बताया।‘
बाबा पर हमारी डांट डपट का कोई असर नहीं हुआ। वह बड़े प्यार से मुस्कुराये 'अरे छोड़ो यार! एक अच्छी वाली चाय पिलाओ तो एक ऐसा किस्सा सुनाता हूँ कि इस पर फिल्म बन सकती है।‘
बाबा ने सुनाया कि मेरठ के पास ग्राण्ड ट्रक रोड के पास दोनों तरफ आमने-सामने दो गांव हैं। (गांव का नाम तो अब मुझे याद नहीं रहा) मगर नाम एक ही था, एक गांव छोटा कहलाता था दूसरा बड़ा। जो गांव बड़ा था वह हिन्दुओं का था और छोटे गांव में मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी। वहां कोई सवा सौ साल से एक रस्म अदा की जाती है।
हर ब$करीद पर हिन्दुओं के गांव से एक गाय, कुर्बानी के लिए मुस्लिम गांव में भेजी जाती है। ब$करीद के दिन सवेरे-सवेरे हिन्दू गांव में गाय को सजाया संवारा जाता है, उसकी पीठ पर नयी झोल डाली जाती है, गले में हार होते हैं, सींग और दुम पर रंगीन रिबन और गोटे से सजावट की जाती है। उसकी आरती उतारी जाती है और फिर ये गाय बैण्ड बाजे और सैकड़ों गांव वालों के साथ किसी दुल्हन की तरह, मुसलमानों के गांव लाई जाती है। गांव के मुसलमान गाय का हार फूल से स्वागत करते हैं। साथ ही आने वालों को मिठाईयाँ बाँटी जाती हैं। फिर गाय को एक चबूतरे पर खड़ा कर दिया जाता है, जिसके चारों तरफ सारे गांव वाले जमा हो जाते हैं। गांव का कसाई, गाय की गर्दन पर छुरी रखता है और कलमा पढ़ के हटा लेता है। फूलों से लदी फदी गाय और उसके साथ आने वाले, तोहफे और मिठाईयाँ लेकर अपने गांव वापस आ जाते हैं।
बाबा ने मुझे बताया कि 1857 ई. में जब अंग्रेज हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने के लिए गाय की कुर्बानी का मसला छेड़ रहे थे और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम झगड़े हो रहे थे उस समय इस छोटे से गांव के जमींदार ने कहा कि हम अपनी गाय कुर्बानी के लिए दे सकते हैं मगर अपनी एकता की कुर्बानी नहीं दे सकते। और तब से यह खूबसूरत रस्म हर साल इसी तरह निभायी जाती है। (किसी पाठक को जी.टी. रोड पर बसे हुये इन दो गांवों के बारे में मालूम हो तो मुझे अवश्य सूचना दें, एहसान मन्द रहूंगा) बाबा को ये कहानी किसी ने ट्रेन में सुनाई थी और वह इस रस्म की सच्चाई मालूम करने उस गांव में जा पहुंचे थे।
बाबा स्वभाव के ऐतबार से काफी बोहेमियन थे। उन्होंने जि़न्दगी भर घर बनाने या घर बसाने की कोई कोशिश नहीं की। वह जीवन की तेज़ धारा में एक तिनके की तरह थे, जो स्वयं को लहरों के सहारे छोड़ देता है। और सदैव एक मंजिल की तलाश में मुब्तिला रहता है। $गालिब ने शायद नियाज़ बाबा के लिए ही कहा था।
रौ में है रक्से उम्र कहां देखिये थके
नै हात बाग पर है, न पा है रकाब में
वह अक्सर कहा करते थे 'मैं तो बंजारा हूँ, खाना बदोश।‘
मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि बाबा में क्या खास बात थी, जिसकी वजह से जो भी उनसे मिलता था उन्हीं का हो जाता था। बाबा के चाहने वाले हज़ारों थे और भांति-भांति के थे। सज्जाद ज़हीर से लेकर कुदसिया ज़ैदी तक, मुज़फ्फर अली से लेकर श्याम बेनेगल तक, और शशि कपूर से लेकर शमा ज़ैदी तक।
कभी-कभी एक आध झलकी बाबा के व्यक्तित्व में छुपी हुई, मक्नातीस (चुम्बक) की भी दिखाई दे जाती थी।
एक शाम मैं कोई नाटक देखकर पृथ्वी थियेटर से बाहर निकला देखा कि पत्थर की सीढिय़ों पर बाबा बैठे हुए हैं, और हाथों में बीड़ी सुलग रही है। देखते ही खड़े हो गये, बड़े प्यार से गले लगाया और कहने लगे 'अरे यार जावेद! बहुत अच्छा हुआ जो तुम मिल गये मैं तुम्हीं को याद कर रहा था। दुल्हन कहाँ है? (मेरी बीबी फरीदा) मैंने कहा 'वह तो आज नहीं आयी।‘
कहने लगे 'अरे ये तो बड़ा नुकसान हो गया। मैंने थोड़ा परेशान होते हुए पूछा, 'क्यों क्या हो गया?’ मेरे पूछने पर बोले 'भई दुल्हन जो है, वह हमारी खजांची है। जब कभी पैसों की ज़रूरत होती है। उससे ले लेते हैं। तुम्हारे पास तो होंगे नहीं।‘ मैंने कहा थोड़े बहुत हैं आपको कितने चाहिये?’ कहने लगे 'हमें तो एक पैसा भी नहीं चाहिये बस- शराब पीनी है अगर पिला सको तो पिला दो अल्लाह भला करेगा।‘
मैं और बाबा पृथ्वी थियेटर से बाहर निकले, वहीं करीब में एक बार था उसमें घुस गये। बार का बंगाली मालिक लपकता हुआ आया, बाबा की खैर-खैरियत पूछी, फिर दरियाफ्त किया 'क्या पियेंगे?’
बाबा ने बड़ी अदा से किया 'व्हिस्की!’ बंगाली कुछ परेशान हो गया 'व्हिस्की?’
बाबा मुस्कराये और बोले 'आज जावेद मियाँ पिला रहे हैं इसलिये ठर्रा नहीं पियेंगे।‘
बंगाली परेशानी से इधर-उधर देखता रहा फिर धीरे से बोला 'बाबा आज व्हिस्की ठर्रा कुछ नहीं मिल सकता। क्यों नहीं मिल सकता? 'ड्राई डे है बाबा!’ बंगाली ने कहा, बाबा परेशान हो गये, 'अब इस सरकारी कमीनेपन को क्या कहा जाये कि जिस लीडर की याद में ड्राई डे रखा गया है वह बहुत बड़ा आदमी था, उसकी मौत का गम दूर करने के लिये शराब से बढ़कर कोई चीज़ नहीं हो सकती मगर इन गधों को कौन समझाये कि जिन्हें प्यासा मार रहे हैं वह मरने वाले को याद नहीं करेंगे, फरियाद करेंगे।Ó
बंगाली सिर खुजाता हुआ चला गया, मैंने पूछा, 'अब?Ó थोड़ी देर सोचते रहे फिर पूछा, 'क्या बजा है? मैंने कहा: दस बज रहे हैंÓ। कहने लगे: चलो कैफी के घर चलते हैं। वह पी रहा होगा।‘ हम दोनों पैदल चलते हुए जानकी कुटीर पहुंचे और कैफी साहब के दरवाज़े पर लगे हुए जहाँगीरी घण्टे की रस्सी खींची।
घण्टा देर तक बजता रहा मगर कोई गेट खोलने नहीं आया। मैंने कहा बाबा अंदर अंधेरा है लगता है कैफी साहब बाहर गये हैं, बाबा ने उचक कर अंदर झांका, अपने मोटे से डण्डे से लकड़ी के गेट को ठोंका और फरमाया, 'कमरा बंद करके बैठा होगा आज ज़रा सर्दी है ना!’ देर तक घण्टा बजाने के बाद एक नौकर आँखें मलता हुआ नुमूदार हुआ और गेट खोले ब$गैर ही कहने लगा, 'साहब और आपा बाहर गये हुए हैं’, 'कब आयेंगे?’ 'ये तो मालूम नहीं’
बाबा कुछ झुँझला से गये। धीरे-धीरे आगे बढ़े, अचानक आँखों में चमक आयी, कहने लगे, 'आदिल’। विश्वामित्र आदिल का घर सामने ही था मगर उनके बरामदे में भी एक नन्हा सा बल्ब जल रहा था जिससे मालूम होता था कि वह लोग भी नहीं हैं।
बाबा ने सिर हिलाया 'ये भी नहीं है। लगता है कैफी के साथ गया होगा।‘ मैंने घड़ी देखी ग्यारह बजने वाले थे, पृथ्वी की भीड़ भी जा चुकी थी। मैंने बाबा की तरफ देखा अचानक रुके। कहने लगे, 'रिक्शा पकड़ लो, मज़रूह साहब के घर चलते हैं। ज़रा कंजूस ज़रूर हैं मगर इतने कंजूस भी नहीं हैं, कि घर आये मेहमानों को दो पैग न पिला सकें चलो-चलो जल्दी करो।‘
मज़रूह साहब का बंगला जुहू के दक्षिणी किनारे पर लगभग आखिरी बंगला था। लेकिन ज़्यादा दूर नहीं था इसलिये जल्दी से पहुंच गये।
घण्टी बजाई, दरवाज़ा खुला, फिरदौस भाभी ने बड़े तपाक से बाबा का स्वागत किया और ड्राइंग रूम में बिठाया। बाबा के चेहरे की मुस्कुराहट कह रही थी, 'देखा आखिर कामयाबी ने कदम चूम ही लिये।‘
फिरदौस भाभी ने पूछा, 'क्या पियेंगे नियाज़ भाई?’ 'मज़रूह कहाँ है?’ बाबा ने पूछा। 'सुबह से बुखार है, सो गये हैं।‘ बाबा का चेहरा देखने लायक था। वह कभी मुझे देखते थे कभी सामने खड़ी फिरदौस भाभी को। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह दिल की बात ज़बान पर लायें या न लायें। अचानक वह खड़े हो गये, 'आदाब कह देना’ और जवाब का इंतज़ार किये बगैर बाहर निकल आये। तब तक रात के बारह बज रहे थे। और हम दोनों जुहू तारा की सड़क पर उन लुटे हुए मुसाफिरों की तरह चल रहे थे जिस के पास न सिर छिपाने का ठिकाना होता है और न कोई उम्मीद!
बड़ी हिम्मत करके मैंने कहा, 'बाबा मैं निकल जाऊँ? कुर्ला पहुंचना है सान्ताक्रूज़ से आखिरी बस मिल जायेगी।‘
बाबा वहीं बीच सड़क पर रुक गये और गरज कर बोले, 'बिल्कुल नहीं! अब तो जि़द आ गयी है जब तक पी नहीं लेंगे तब तक न आप कहीं जायेंगे और न हम।‘
मैं बोल भी क्या सकता था। एक तो अकीदत ऊपर से यह खौफ कि बड़े मियाँ को अकेला छोड़ दिया तो खुदा जाने कहाँ जायें, क्या करें, इसलिये चुप-चाप चलता रहा। चलते-चलते हम लोग जुहू बीच के पास आ गये तब तक बाबा की सारी बीडिय़ाँ खत्म हो चुकी थीं, और सारी गालियाँ भी! अचानक उनके चेहरे से ऐसी रौशनी फूटी जैसे साठ वाट का बल्ब जल गया हो। बहुत ज़ोर से मेरी कमर पर हाथ मारा और कहा, 'वापस।‘ जुहू कोली बाड़ा और उसके आस-पास बहुत सी छोटी मोटी गलियाँ हैं बाबा ऐसी एक गली में घुस गये। दूर-दूर तक अंधेरा था, दो बल्ब जल रहे थे मगर वह रौशनी देने के बजाये तन्हाई और सन्नाटे के एहसास को बढ़ा रहे थे। बाबा थोड़ी दूर चलते फिर रुक जाते, घरों को गौर से देखते और आगे बढ़ जाते।
अचानक वह रुक गये, सामने एक कम्पाउण्ड था जिसके अंदर दस-बारह घर दिखाई दे रहे थे। इनमें से कोई भी घर एक मंजि़ल से अधिक नहीं था और बीच में छोटा सा मैदान पड़ा था जिसमें एक कुआँ भी दिखाई दे रहा था। बाबा ने कहा 'यही है’ और गेट के अंदर घुस गये। मैं भी पीछे-पीछे था मगर डर रहा था कि आज ये हज़रत ज़रूर पिटवायेंगे। बाबा कम्पाउण्ड के बीच में खड़े हो गये। चारों तरफ सन्नाटा था। किसी घर में रौशनी नहीं थी। बाबा ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, 'लारेन्स-लारेन्स’ अचानक एक झोपड़े नुमा घर में रोशनी जली, दरवाज़ा खुला और एक लम्बा-चौड़ा बड़ी सी तोंद वाला आदमी बाहर आया, जिसने एक गंदा सा नेकर और एक धारीदार बनियान पहन रखा था।
जैसे ही उसने बाबा को देखा एक अजीब सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर फैल गयी, 'अरे बाबा। किधर है तुम? कितना टाइम के बाद आया है?’ ये कहते-कहते उसने बाबा को दबोच लिया और फिर ज़ोर-ज़ोर से गवानी भाषा में चीखने लगा। उसने बाबा का हाथ पकड़ा और अंदर की तरफ खींचने लगा, 'आओ आओ अंदर बैठो, चलो, चलो’ फिर वह मेरी तरफ मुड़ा 'आप भी आओ साब! आजाओ आजाओ अपना ही घर है।‘ हम तीनों एक कमरे में दाखिल हुए जहां दो तीन मेज़ें थीं, कुछ कुर्सियाँ और एक सोफा। अंदर एक दरवाज़ा था जिस पर परदा पड़ा हुआ था। बाबा पूछ रहे थे, 'कैसा है तू लारेन्स? माँ कैसी है? बच्चा लोग कैसा है?’
इतनी देर में अंदर का परदा खुला और बहुत से चेहरे दिखाई देने लगे। एक बूढ़ी औरत एक मैली सी मैक्सी पहने बाहर आई और बाबा के पैरों पर झुक गई। बाबा ने उसकी खैर खैरियत पूछी, बच्चों के सिर पे हाथ फेरा और जब ये हंगामा $खत्म हुआ तो लारेन्स ने पूछा, 'क्या पियेंगे बाबा?’
'व्हिस्की!’ बाबा ने कहा
लारेन्स अंदर गया और विहस्की की एक बोतल टेबिल पे ला के रख दी। इसके बाद दो गिलास थे, कुछ चने कुछ नमक, सोडे और पानी की बोतलें। बाबा ने पैग बनाया, लारेन्स अलादीन के जिन की तरह हाथ बांध कर सामने खड़ा हो गया, 'और क्या खाने का है बाबा? माँ मच्छी बनाती, और कुछ चाहिये तो बोलो कोमड़ी (मुर्गी) खाने का मूड है?’ बाबा ने मुझ से पूछा, 'बोलो बोलो भई क्या खाओगे?’
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि बाबा की इतनी आव भगत क्यों हो रही है। अगर ऐसा भी होता कि वह लारेन्स के मुस्तिकल ग्राहकों में से एक होते तो भी रात के दो बजे ऐसी खातिर तो कहीं नहीं होती। यहां तो ऐसा लग रहा था जैसे बाबा अपनी ससुराल में आ गये हों।
थोड़ी देर में मछली भी आ गयी, उबले हुए अण्डे भी और पाव भी। बहरहाल मुझसे बरदाश्त नहीं हुआ, खाना खाते हुए मैंने बाबा से पूछा, 'बाबा अब इस राज़ से पर्दा उठा दीजिए कि इस लारेन्स और उसकी माँ से आपका क्या रिश्ता है?’
कहानी ये सामने आई कि वर्षों पहले जब बाबा अपनी हर शाम लारेन्स के अड्डे पर गुज़ारा करते थे तो एक दिन जब लारेन्स कहीं बाहर गया हुआ था तो उसकी माँ के पेट में दर्द उठा था, दर्द इतना तेज़ था कि वह बेहोश हो गयी थी। उस वक्त बाबा उसे अपने साथ लेकर अस्पताल पहुंचे, पता लगा कि अपेंडिक्स फट गया है, केस बहुत सीरियस था ऑपरेशन उसी वक्त होना था वरना मौत यकीनी थी। बाबा ने डॉक्टर से कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये और न जाने कहां से और किन दोस्तों से पैसे जमा करके लाये, बुढिय़ा का ऑपरेशन कराया और जब लारेन्स अस्पताल पहुंचा तो उसे खुश खबरी मिली कि उसकी माँ मौत के दरवाजे पे दस्तक दे वापस आ चुकी है।
............ थैंक्स टु नियाज़ बाबा................
इस कहानी में एक खास बात ये है कि लारेन्स और उसकी माँ के बार-बार खुशामद करने के बाद भी बाबा ने वह पैसे कभी वापस नहीं लिये जो उन्होंने अस्पताल में भरे थे।
सुबह तीन बजे के करीब जब बाबा को लेकर बाहर निकल रहा था तो मैंने पलट कर देखा था, लारेन्स की माँ अपनी आँखें पोछ रही थी और लारेन्स अपने हाथ जोड़े सिर झुकाये इस तरह खड़ा था जैसे किसी चर्च में खड़ा हो। बाबा का एक मज़ेदार किस्सा हरी भाई (संजीव कुमार) ने मुझे सुनाया था।
जब तक विश्वामित्र आदिल बम्बई में रहे हर साल इप्टा की 'दावत-ए-शीराज़Ó उनके घर पर होती रही। हर नया और पुराना इप्टा वाला अपना खाना और अपनी शराब लेकर आता था और इस महफिल में शरीक होता था। सारी शराब और सारे खाने एक बड़ी सी मेज़ पर चुन दिये जाते और जिसका जो जी चाहता खा लेता और जो पसन्द आता वह पी लेता। ये एक अजीबो गरीब महफिल होती थी। जिसमें गाना, बजाना, नाचना, लतीफे, चुटकुले, ड्रामे सभी कुछ होता था। और बहुत कम ऐसे इप्टा वाले होते जो इसमें शरीक न होते हों। ऐसी ही एक 'दावते शीराज़Ó में हरी भाई नियाज़ बाबा से टकरा गये और जब पार्टी खत्म हो गई तो अपने साथ अपने घर ले गये। हरी भाई देर से सोते थे और देर से जागते थे। इसलिये वहाँ भी सुबह तक महफिल जमी रही। पता नहीं किस समय हरी भाई सोने के लिये चले गये और बाबा वहीं कालीन पे लेट गये। दूसरे दिन दोपहर में हरी भाई सोकर उठे और रोज़ाना की तरह तैयार होने के लिए अपने बाथरूम में गये। मगर जब उन्होंने पहनने के लिए अपने कपड़े उठाने चाहे तो हैरान हो गये, क्योंकि वहाँ बाबा का मैला कुर्ता पाजामा रखा हुआ था और हरी भाई का सिल्क का कुर्ता और लुंगी $गायब थे।
हरी भाई ने नौकर से पूछा तो यह बात मालूम हुई कि वह मेहमान जो रात को आये थे सुबह सवेरे नहा धोकर सिल्क का लुंगी कुर्ता पहन के रु$ख्सत हो चुके हैं।
कहानी यहाँ $खत्म नहीं होती है।
इस कहानी का दूसरा हिस्सा ये है कि कोई दो महीने बाद एक दिन अचानक नियाज़ बाबा हरी भाई के घर जा धमके और छूटते ही पूछा, 'अरे यार हरी! पिछली दफा जब हम आये थे तो अपना एक जोड़ा कपड़ा छोड़ गये थे वह कहाँ है?’ हरी भाई ने कहा, 'आपके कपड़े तो मैंने धुलवा के रख लिये हैं मगर आप जो मेरा लुंगी कुर्ता पहन के चले गये थे वह कहाँ है?’
बाबा ने बड़ी मासूमियत से अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, सिर खुजाया और बोले, 'हमें क्या मालूम तुम्हारा लुंगी कुर्ता कहाँ है? हम कोई एक जगह कपड़े थोड़ी बदलते हैं?’
हरी भाई जब भी ये किस्सा सुनाते थे बाबा का जुमला याद करके वे बेतहाशा हंसने लगते थे। बाबा के छोटे-मोटे चुटकुले तो इतने हैं कि किताब तैयार हो सकती है। मगर चलते-चलते एक ऐसा किस्सा सुन लीजिए जिससे उनके व्यक्तित्व के एक और पहलू पर प्रकाश पड़ता है।
एक दिन बाबा मिले तो बहुत खिले-खिले से थे, कुछ धुले-धुलाये भी लग रहे थे। मैंने वजह पूछी तो कहने लगे, 'अरे तुम्हें नहीं मालूम श्याम हम से अपनी फिल्म लिखवा रहा है।‘
पूछा, 'श्याम कौन?’
कहने लगे, 'ओफ्फोह श्याम बेनेगल और कौन? भई बहुत अच्छा आदमी है। जितना अच्छा डायरेक्टर है उससे भी ज़्यादा अच्छा इंसान है। उसने हमें अपने आफिस में एक मेज दे दी है और होटल में खाने का प्रबन्ध कर दिया है। सुबह जाते हैं तो मेज़ पर बीड़ी के दो बण्डल और माचिस भी मिलती है। और चाय तो दिन भर आफिस में बनती रहती है और क्या बतायें, हम आजकल ऐश कर रहे हैं।‘
मैंने बाबा को मुबारक बाद दी और दबी जुबान से कहा, 'आपको अपनी सलाहियत दिखाने का बेहतरीन मौका मिला है इसे बीच में छोड़ के भाग मत जाइयेगा जैसा कि आपकी आदत है।‘
कुछ दिन बाद की बात है, मैं शमा के घर बैठा हुआ था। हम दोनों किसी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे कि अचानक आ धमके। न जाने कहाँ से आ रहे थे, बुरी तरह हांफ रहे थे और काफी उजड़े-उजड़े लग रहे थे। जब पानी वानी पी चुके थे तो हमने खैरियत पूछी, फरमाया, 'अजीब आदमी है बात को समझता ही नहीं है। अरे दो वक्त खाने और दो बण्डल बीड़ी से जि़न्दगी थोड़ी गुज़र सकती है।‘ शमा ने पूछा, 'क्या श्याम ने कुछ कह दिया बाबा’
'अरे कहे तो तब, जब सुने। वह सुनता ही नहीं।‘
'क्या नहीं सुनता।‘ मैंने पूछा
'अरे भई हमें पैसे की ज़रूरत पड़ती है और भी तो पचास ज़रूरतें हैं कि नहीं?’
शमा ने कहा, 'मगर ये बात तो मेरे सामने तय हुई थी कि आपको कैश नहीं दिया जायेगा, क्योंकि आप उसकी शराब पी डालेंगे! और काम अधूरा छोड़कर चले जायेंगे। बाबा, गुस्से में लाल हो गये, बीड़ी जो अभी-अभी सुलगाई थी उसे चाय की प्याली में बुझा दिया और गरजकर बोले, 'कैसे बातें करती हो शमा बीबी। हमारी शराब से हमारे काम का क्या ताल्लुक है? तुम ने तो देखा था बेगम साहिबा (बेगम कुदसिया ज़ैदी, शमा ज़ैदी की वालिदा) के लिये हमने कितना काम किया। क्या उन्होंने हमारी शराब बन्द करवाई थी?’
शमा अचानक बहुत ज़ोर से हंसी और मेरी तरफ मुड़ के बोली, 'तुम को मालूम है जावेद! हमारी अम्मा उनसे कैसे काम करवाती थी। इन्हें कमरे में बन्द कर देती थीं और खिड़की के बाहर उनकी पहुंच से दूर एक बोतल रख दिया करती थीं और कहती थी कि काम खत्म करोगे तभी ये बोतल तुम्हारे पास आयेगी। ये बहुत चीखते थे मगर हमारी अम्मी पर उनकी किसी बात का कोई असर नहीं होता था।‘
बाबा को भी पुराने दिन याद आ गये, 'बहुत ज़ोर से कहकहा लगाया और फरमाया, 'तो हम कहाँ कहते हैं कि काम के बीच में पीयेंगे मगर शाम के लिये तो पैसे मिलने ही चाहिये। पैसों पर हमें याद आया, अरे भाई बाहर एक टैक्सी खड़ी है उसका किराया भिजवा देना!’
मैं बाहर निकला, टैक्सी वाले से पूछा, 'किराया कितना हुआ?Ó
कहने लगा, 'एक सौ सत्तर रुपये’
'एक सौ सत्तर?’ मैंने हैरान होकर पूछा।
टैक्सी वाला बाहर निकल आया, 'आप खुद देख लो साब! मीटर अभी तक चल रहा है।‘ मुझे मालूम था कि बाबा वरली पर एक गेस्ट हाउस में रहते हैं मगर ये वह ज़माना था जब वरली से जुहू तक का टैक्सी का किराया पच्चीस तीस रुपये होता था, इसलिये एक सौ सत्तर सुनकर मेरी हैरत ठीक थी।
मीटर भी झूठ नहीं बोल रहा था, मगर ये कैसे हो सकता है। मैंने कहा, 'मगर मेरे भाई वरली से यहाँ तक इतने बहुत से पैसे कैसे हो सकते हैं?’ टैक्सी वाला चिढ़ गया, 'क्या बात करते हैं साब? सवेरे नौ बजे गाड़ी पकड़ी थी, किधर-किधर जाके आये हैं, साब मजगांव, माहिम, बान्द्रा और सब जगह पे मेरे को रोक के रखा।‘
मैं समझ गया और मैंने चुप-चाप एक सौ सत्तर रुपये अदा कर दिये मगर गुस्सा बहुत आया। ये क्या तरीका है, जेब में पैसे नहीं तो टैक्सी में घूमने की क्या ज़रूरत है, मगर वह ऐसी छोटी-छोटी बातों की परवाह करते तो नियाज़ हैदर काहे को होते।
श्याम बाबू को बुरा भला कहने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कई महीनों जारी रहा। जब भी मिलते बेनेगल की शान में ऐसे $कसीदे पढ़ते कि लिखे नहीं जा सकते। शिकायत एक ही थी कि बाबा के चीखने चिल्लाने डराने धमकाने और खुशामद के बावजूद श्याम बेनेगल ने उन्हें पैसे नहीं दिये थे।
फिर एक दिन यूँ हुआ कि मैं रोजाना की तरह शमा के घर बैठा हुआ था जो एक तरीके से हमारा आफिस बन चुका था। एम.एस. सथ्यू भी बंगलौर से आये हुए थे और कुछ बहुत मज़ेदार बातें हो रही थीं कि बाबा प्रकट हो गये। उस दिन भी वह हांफ रहे थे और पसीने में तर थे। आते ही उन्होंने अपनी फूली हुई सांसों में श्याम को बुरा भला कहना शुरू कर दिया, 'मुझे आज तक किसी ने इतना परेशान नहीं किया जितना इस आदमी ने किया है। मेरी समझ में इसकी कोई भी बात नहीं आती।‘
'अब क्या कर दिया श्याम ने?’ शमा कुछ उखड़ सी गयीं।
बाबा बैठे से खड़े हो गये, जेब में हाथ डाला और दस हज़ार रुपये निकाल कर बोले, 'ये देखो इस नालायक आदमी ने ये रुपये मुझे थमा दिये। अब तुम बताओ मैं इनका क्या करूँ?’
हम तीनों एक दूसरे का मुँह देखने लगे। क्या आदमी है भई, नहीं मिला था तो भी नाराज़ और अब मिलने पर भी नाराज़। शमा ने कहा, 'ये आपके काम की मेहनत है खर्च कीजिए!’ 'वही तो पूछ रहा हूँ कहाँ खर्च करूँ?’ बाबा ने पूछा। सथ्यू ने अपनी दाढ़ी खुजाई और कुछ सोचते हुए बोले 'आपको किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है क्या?’ बाबा ने कहा, 'ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है कि इतने बहुत से पैसों की ज़रूरत पड़े।‘ शमा ने राय दी, 'सबसे पहले तो आप अपने लिये कुछ कपड़े बनवा लीजिए’
बाबा खुश हो गये, कहने लगे, 'हाँ ये बहुत अच्छी बात है। हमारे पास दो ही कुरते रह गये हैं।‘
'और कुछ’ सथ्यू ने पूछा।
वह कुछ देर सोचते रहे फिर बोले, 'हैदराबाद में मेरी एक बहन रहती हैं, अगर किसी सूरत से उनका पता मालूम हो सके तो एक हज़ार रुपये उनको भिजवा दूँ। 'और कुछ?’ 'और कुछ नहीं।‘
'तो एक काम करते हैं।‘ सथ्यू ने कहा, 'हज़ार बहन के, पन्द्रह सौ कपड़े के और ये बाकी के साढ़े सात हज़ार रुपये बैंक में जमा करा देते हैं।‘
'मगर बैंक में तो हमारा खाता नहीं है।‘ 'ये कौन सी बड़ी बात है?’ सथ्यू ने कहा 'चलिये उठिये।‘
सथ्यू बाबा को लेकर अपने बैंक में गये और पूरे साढ़े सात हज़ार रुपये जमा करके बाबा को भी सरमायादारों की फेहरिस्त में खड़ा कर दिया। आपको लग रहा होगा कि ये दिलचस्प कहानी यहाँ खत्म हो गयी। जी नहीं! इसका आिखरी हिस्सा बाकी है।
इस घटना के कोई तीन महीने बाद एक दिन दोपहर बाद नियाज़ बाबा शमा के घर में इस तरह दाखि़ल हुए कि उनके आगे-आगे एक दस ग्यारह बरस का लड़का उनका झोला और डण्डा उठाये हुए चल रहा था और पीछे एक पतली-दुबली खादी की सफेद साड़ी में लिपटी हुई सांवली सी लड़की थी जिसकी उम्र सत्ताईस से अधिक न होगी।
ये बात तो फौरन समझ में आ गयी कि अपना वजन उठाने के लिये बाबा ने एक छोकरा रख लिया है मगर ये लड़की कौन है? जो खादी की सफेद साड़ी में कांग्रेस सेवा दल की वर्कर मालूम होती है। वह लड़का तो बाबा का सामान रख के किचन की तरफ िखसक गया, बाबा खुद दीवान पर फैल कर बैठ गये और लड़की से कहने लगे, 'जाओ-जाओ तुम अंदर चली जाओ और आराम करो, बहुत थक गयी हो।‘
वह लड़की भी बगैर एक शब्द कहे हुए शमा के बेडरूम में गयी और बिस्तर पर जाके लेट गयी।
दिल में तरह-तरह के $ख्याल आ रहे थे। कहीं अनहोनी तो नहीं हो गयी, बड़े मियाँ ने इस उम्र में किसी का हाथ तो नहीं थाम लिया। मुझे बाबा की हालत भी बेहतर लग रही थी, कपड़े साफ सुथरे थे और इस्तरी किये हुए थे, दाढ़ी और बालों पर कैंची चलने के आसार दिखाई दे रहे थे। चेहरे पर वैसी ही चमक थी जैसी पुराने पीतल पे पालिश करने के बाद आती है। हद तो ये थी कि उनके गंदे मैले नाखून भी कटे हुए थे।
बाबा थे कि लहक-लहक कर इधर-उधर की बातें कर रहे थे मगर मेरे दिमाग में वही लड़की घूम रही थी जो अंदर सो रही थी। जब सस्पेंस बहुत अधिक बढ़ गया तो शमा ने मुझे इशारा किया और मैंने पूछ ही लिया, 'बाबा ये साहिबज़ादी कौन हैं?’
'ये! ये मेरी मीरा है। बहुत पढ़ी लिखी लड़की है, इसने हिन्दी, इंगलिश और संस्कृत में एम.ए. किया है। ट्रिपल एम.ए. है।‘
'मगर आपके साथ?’
बाबा ने शमा को इस तरह घूरा जैसे उन्होंने कोई बहुत ही बेहूदा सवाल किया हो।
बोले, 'सिक्रेटी है मेरी’
'सिके्रटी’ हम दोनों को हैरत का ऐसा झटका लगा कि कुछ बोला ही नहीं गया।
बाबा बड़े प्यार से बता रहे थे, 'दिल्ली में मिली थी, मैं अपने साथ ले आया। सारा डिक्टेशन लेती है, नोट्स भी बनाती है, इसकी वजह से काम बहुत आसान हो गया है।‘ पता चला कि बात सिर्फ सिक्रेट्री तक ही महदूद नहीं है, बाबा ने एक मराठी फैमिली को भी अपने साथ रख लिया है जिसका बेटा बाबा का झोला डण्डा उठा के चलता है और बच्चे के माँ-बाप बाबा के खाने कपड़े और दूसरी आवश्यकताओं के इंचार्ज बने हुए हैं।
दूसरे शब्दों में इन दिनों बाबा बहुत ही बेहतर जि़न्दगी गुज़ार रहे थे।
इस मुलाकात को सिर्फ तीन माह गुज़रा कि एक दिन बाबा फिर अपने पुराने हुलिये में दिखाई दिये। वही झाड़-झंकाड़ दाढ़ी, उलझे हुए बाल और मैले कपड़े। आते ही फरमाया, ज़रा टैक्सी का किराया भिजवाना।
किराया अधिक नहीं था इसलिये चुप-चाप दे दिया गया। फिर बाबा से पूछा गया कि गर्दिश-ए-अय्याम (परेशानी के दिन) पीछे की तरफ कैसे दौड़ गयी? वह आपके नौकर चाकर और वह सिक्रेट्री कहाँ हैं? कुछ नाराज़ से हो गये, कहने लगे 'चली गयी।‘ पूछा, 'कहाँ चाले गयी?’
कहने लगे, 'मुझे क्या मालूम? दो महीने तनख्वाह नहीं मिली तो मीरा भी चली गई।‘
शमा ने कहा, 'पैसे तो थे आपके बैंक में?’ बाबा कुछ ज़्यादा ही नाराज़ हो गये, 'कैसी बातें करती हो बीबी? साढ़े सात हज़ार रुपये में इतनी बरकत थोड़ी होती है कि हज़ार रुपये महीने की सिक्रेट्री और पन्द्रह सौ रुपये महीने के नौकर रखे जा सकें।‘
शराब बाबा की बहुत सी कमज़ोरियों में से एक थी। जैसे मिले, जितनी मिले, जहाँ भी मिले, मिलनी चाहिए। हैरत की बात ये थी कि वह ठर्रा पीयें या स्कॉच, उन्हें नशा नहीं होता था। या यूँ कहना चाहिये कि कम से कम मैंने उन्हें कभी नशे में नहीं देखा। हालाँकि पीने बैठते थे तो अच्छी खासी पी लिया करते थे और पिलाने वाले को टोकते भी जाते थे, 'कल के लिए कर आज न कंजूसी शराब में।‘
मुहर्रम के दस दिन छोड़ के हर रोज़ शाम को मुम्बई वालों के अनुसार उनकी घण्टी बज जाया करती है और फिर वह तब तक दम न लेते थे जब तक सागर व मीना उनके सामने न आ जाये।
अब कोई पूछे कि नियाज़ हैदर जैसा नास्तिक मुहर्रम क्यों मानता था? और दस दिन तक काले कपड़े क्यों पहनता था। तो मेरे पास इसका जवाज़ (तर्क) है, न जवाब। मैं तो बस यही समझता हूँ कि नियाज़ बाबा का व्यक्तित्व जिन विरोधाभासों के ताने बाने से तैयार किया गया था, ये अमल भी उसका एक हिस्सा था।
एक शाम मैंने डरते-डरते पूछ ही लिया, 'जब आप पर असर ही नहीं होता है तो पीते क्यों हैं?’
मुस्कराये, और बोले,
मय से गरज़ निशात है किस रू सियाह को
यक गोना बे खुदी मुझे हर रात चाहिये।
मैंने कहा, 'लीवर खराब करने से क्या फायदा? आपको नशा तो होता ही नहीं है जिसके लिये लोग शराब पीते हैं’
बाबा बहुत फलसफयाना मूड में थे। कहने लगे, 'ब्रादर! नशा इंसानी दिमाग की एक कैिफयत का नाम है, ये किसी चीज़ में नहीं होता और ये बात मुझसे अधिक कोई और नहीं जानता। क्योंकि ऐसा कोई नशा नहीं हैं, सिवाये एक के, जो मैंने नहीं किया बल्कि मथुरा के साधुओं के साथ बैठकर धतूरे के लड्डू खा चुके हैं और निहंग सरदारों के साथ पत्थर पर संखिया की लकीरें खींच कर उन्हें ज़बान से चाट चुके हैं।
'संखिया? ये न थी हमारी िकस्मत कि विसाले-यार होता। फिर ज़रा विस्तार से बताया कि संखिया चाटना हर ऐरे-गैरे के बस का नहीं।
पत्थर पर संखिया से लकीरे खींच दी जाती हैं जो तीन से पांच इंच लम्बी होती हैं। इस नशे के शौकीन अपनी आवश्यकता और क्षमता के हिसाब से इन लकीरों को ज़बान से चाट लेते हैं। अधिकतर लोग तीसरी लकीर तक पहुंचते-पहुंचते ढेर हो जाते हैं। सुना है कि कुछ सूरमा सात लकीरों का रिकार्ड भी बना चुके हैं।
'कैसा होता है संखिया का नशा?’
'किसी भी नशे को बयान करना बड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि शब्द एहसास को बयान नहीं कर सकते।‘ 'और वह कौन सा नशा है जो आपने नहीं किया?’
'कुछ लोग नशे के लिए अपने आप को सांप से डसवाते हैं। मगर मैं ये हरकत कभी नहीं कर सकता।‘, 'क्यों? क्या आपको सांपों से डर लगता है?, 'डर तो नहीं लगता मगर बहुत गंदे लगते हैं।, 'बहुत से लोग तो आस्तीनों में सांप रखते हैं? 'वह भी बहुत गंदे होते हैं।
तो ऐसे थे हमारे नियाज़ बाबा!
1988 ई. में बाबा दिल्ली में थे,
एक दिन फोन आया, बहुत जोश में थे कहने लगे 'जावेद मियाँ। हमें मकान मिल गया है, हमारा अपना मकान अरे सरकार ने दिया है भाई! तुम दिल्ली आओ तो हमारे ही पास ठहरना, बल्कि एक काम करो तुम और शमा आजकल जिस स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हो उसे लेकर आ जाओ। बड़ी मज़ेदार सर्दियाँ हैं, अंगीठी जल रही है, शराब भी चल रही है मगर कोई दोस्त पास नहीं है। बल्कि हम तो कहते हैं कि दुल्हन और बच्चों को भी ले आओ, हमारा घर आबाद हो जायेगा। तो तुम लोग आ रहे हो न?’
मैं बहुत खुश हुआ कि सारी उम्र भटकने के बाद बाबा को एक घर मिल ही गया जिसे वह अपना कह सकते हैं। मैंने आने का वादा भी कर लिया और इरादा भी।
फरवरी 1989 ई. में अचानक खबर आई कि बाबा जिस घर को लेकर इतना खुश हो रहे थे, उन्होंने वह भी छोड़ दिया और एक ऐसे मकान में चले गये जहाँ उनके अलावा कोई और नहीं रह सकता।
किसी ने सच ही कहा है, 'बंजारे के सिर को पक्की छत रास नहीं आती!’
(लिप्यंतरण- शकील सिद्दीकी)
जावेद सिद्दीकी थियेटर और सिने जगत का चर्चित नाम है। थियेटर और सिनेमा, दोनों क्षेत्रों में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं तथा नियाज़ हैदर का लम्बा सान्निध्य उन्हें प्राप्त रहा है।
WALEE DAKKENEE
भड़के है दिल की आतिश तुझ नेह की हवा सूँ
शो'ला निमत जला दिल तुझ हुस्न-ए-शो'ला ज़ा सूँ
गुल के चिराग़ गुल हो यक बार झड़ पड़ें सब
मुझ आह की हिकायत बोलें अगर सबा सूँ
निकली है जस्त कर-कर हर संग दिल सूँ
आतिश चक़माक़ जब फ़लक की झाड़ा है तूँ
अदा सूँ सजदा बदल रखे सर, सर ता क़दम ग़रक़ हो
तुझ बाहया के पर पर आकर हिना हया सूँ
याँ विरद है पिरम का बेहूदा सर कहे मत
ये बात सुन 'वली' की जाकर कहो दवा सूँ
Saturday, September 21, 2013
ba-shukriya - Mayank Saxena-
निदा फ़ाज़ली की एक पुरानी नज़्म जो उन्होंने अपने वालिद के लिए कही थी...
तुम्हारी क़ब्र पर मैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आया
मुझे मालूम है
तुम जा नहीं सकते...
तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर
जिस ने उड़ाई थी
वो झूठा है
तुम्हारी कब्र पर जिस ने
तुम्हारा नाम लिखा है
वो झूठा है
तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूं
तुम मुझ में ज़िंदा हो..
निदा फ़ाज़ली की एक पुरानी नज़्म जो उन्होंने अपने वालिद के लिए कही थी...
तुम्हारी क़ब्र पर मैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आया
मुझे मालूम है
तुम जा नहीं सकते...
तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर
जिस ने उड़ाई थी
वो झूठा है
तुम्हारी कब्र पर जिस ने
तुम्हारा नाम लिखा है
वो झूठा है
तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूं
तुम मुझ में ज़िंदा हो..
जनरल वी के सिंह- यक रहैन ईर यक रहैन वीर
आदरणीय पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह जी,
जैसा कि आप जानते हैं मैं बड़े लोगों को चिट्ठियाँ लिखता हूँ । दो दिनों से बोख़ार के कारण बेचैन मन के लिए समय व्यतीत करने का अच्छा तरीक़ा भी है । आप जानते ही हैं कि जब से पत्रकारिता शोरगुल वाली हो गई और दर्शक तू तू मैं मैं की चौपाल में टीवी से लेकर ट्वीटर तक पर मज़ा ले रहे हैं मैं घर पर समाचार माध्यमों से दूर रहता हूँ । आज जब इंडियन एक्सप्रेस में आपके बारे में ख़बरें पढ़ीं तो मैं गूगल करने लगा । कहाँ से शुरू करूँ । लिख रहा हूँ स्नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें समझाने को, खत पढ़कर चल मत आना हमीं को उल्टा समझाने को !
" भारत के सैनिक से ज़्यादा बहादुर, संवेदनशील,सहनशील सैनिक दुनिया में नहीं हैं "
आप अपने राज्य हरियाणा के रेवाड़ी में भूतपूर्व सैनिकों की रैली में बोल रहे थे । राजनीति में सेना से कोई आता है तो अनुशासन और ईमानदारी की दिव्य छवि लेकर आता है । अपने तमाम सहयोगियों के महाभ्रष्टाचार का बचाव करने वाली पार्टियाँ आप लोगों को मेडल की तरह सजा कर दिखाती हैं ताकि लगे न कि राजनीति में सब चोर डाकू ही हैं । आप बोले जा रहे थे-
" आज जब देश की हालत अस्त व्यस्त है । आज जब देश एक मुश्किल दौर से गुज़र रहा है तो भूतपूर्व सैनिकों और सैनिकों आपकी बहुत ज़रूरत है क्योंकि कहीं पर कोई कमी होती है तो सेना को बुलाया जाता है । आज अगर निर्माण का काम करना है , परिवर्तन का काम करना है तो इसमें आपकी भूमिका है "
भूतपूर्व सैनिकों का आह्वान तो ठीक है मगर सैनिकों का ? परिवर्तन और निर्माण क्या है सर? सेना का आह्वान कर रहे हैं ? सैनिकों को बुला रहे हैं तो रेजीमेंटों में नेताओं के तंबू लगवा दीजिये न वोट माँगने की रैली वहाँ भी हो ही जाए । सिर्फ इसलिए कि आप ईमानदार है और सेनाध्यक्ष पद से रिटायर हुए हैं तो एक राजनैतिक मंच से सैनिकों का आह्वान कर सकते हैं । आप फिर बोल रहे है उसी रैली में -
" देश की सुरक्षा नीतियों को देखकर अफ़सोस होता है । हमारी नीतियाँ ठीक नहीं हैं । पड़ोसी देश हमारी सीमाओं का उल्लंघन करते हैं, पश्चिम, उत्तर और पूरब की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं । बेखौफ और बेखटके । इसलिए कि हमारी नीतियां ठीक नहीं हैं । इसलिए नहीं कि हम कमज़ोर हैं । क्या आप कमज़ोर हैं ? नहीं न तो जो कमज़ोर नीतियाँ बनाते हैं उन्हें बदलने की ज़रूरत है । "
मैं सर गूगल कर रहा था । जनवरी २०११ का आपका बयान है लद्दाख में चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय सीमा के अतिक्रमण का ( सोर्स- newindianexpress.com और news.oneindia.com) । आप इस खबर का खंडन कर रहे हैं और बता रहे हैं कि यह अतिक्रमण नहीं बल्कि धारणाओं का मामला है । यानी आपके समय मे भी ऐसी बेसिर पैर की बातें होती थीं और आप खंडन करते थे । वर्ना आप कमज़ोर नीतियों के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा न दे देते । जब आप उम्र के सवाल पर सरकार को अदालत में खींच सकते हैं तो चीनी अतिक्रमण का विरोध तो कर ही सकते थे । अदालत वाली बात से पहले यह समझना चाहता हूँ कि आप बीजेपी के मंच पर क्यों होते हैं और बीजेपी के नेता आपके मंच पर क्यों ? बीजेपी आपका बचाव क्यों करने लगती है ? आपने अन्ना वाले मंच का क्या किया जिस पर आप रिटायर होते ही गए थे ।
( indiatoday.com, timesofindia.com, 02/02/2013, Day and Night news.com 20.9.2013) गूगल ने इस साइट से आपका एक बयान निकाल कर दिया है मुझे । जो अनुवाद के साथ इस प्रकार है-
" एक कमांडर के नाते मुशर्रफ का कारगिल युद्ध से पहले भारतीय सीमा में ग्यारह किमी अंदर आने के साहस की तारीफ करता हूँ । "
आप दुश्मन की करनी को साहस बताते हैं, कोई रोक सकता है आपको, आप सेनाध्यक्ष हैं न सर । खैर आगे जो कहते हैं अगर उसे नरेंद्र मोदी जी ने सुन लिया या संघ ने तो देख लिया तो हमको मत कहियेगा ।
" कारगिल के दौरान भारतीय पक्ष से ग़लतियाँ हुईं थीं जिससे पाकिस्तानी सेना को हमारी सेना में आने का मौका मिला । हमें मुशर्रफ को बच कर जाने नहीं देना चाहिए था "
आप कारगिल युद्ध को भारतीय नीतियों( या एनडीए सरकार की ? ) की ग़लती मानते हैं तो आपने उस वक्त कमज़ोर नीतियाँ बनाने वालों को बदलने का आह्वान किया था ? नीतिसेंट्रल की साइट पर खबर छपी है कि आप रायबरेली से सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ टिकट मांग रहे हैं । ( बीजेपी ने अपने कार्यकर्ताओं को जो बुकलेट दिया है उसमें दिया है कि किन वेबसाइट का अनुसरण करना है । इनमें नीतिसेंट्रल भी एक है )
जनरल साहब बीजेपी में आपकी सेटिंग आडवाणी से भी बेहतर है । जिन्ना को अच्छा क्या बताया बेचारे को निपटा ही दिया गया । आप मुशर्रफ की तारीफ़ कर मोदी जी के साथ रैली करते हैं । उस मोदी जी के साथ जो गुजरात की चुनावी रैलियों में मियाँ मुशर्रफ पुकारा करते थे । संदर्भ बता दूँ या रहने दूँ सर । मोदी जी प्र म पद के उम्मीदवार बनकर पहली बार आपकी रैली में रेवाड़ी आते हैं । अभी आप बीजेपी में थोड़े न शामिल हुए हैं । तब ई हाल है । बीजेपी मरी जा रही है आपका बचाव करने में । कुछ तो बात है । जिन्ना सेकुलर और मुशर्रफ साहसिक । कहीं तब के सेनाध्यक्ष मलिक साहब पर तो टिप्पणी नहीं है ये । वाजपेयी जी की सरकार पर तो आप कर नहीं सकते न !
बीजेपी तो तब भी आपका पक्ष ले रही थी जब आप उम्र के सवाल पर सरकार से लड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट चले गए । वहाँ जब सोलििटर जनरल आर एफ नरीमन ने वे सारे दस्तावेज़ दिखा दिए कि आपने कब कब दस मई १९५० का जन्मदिन मानने की बात कही है तो आपके पास बचाव में कुछ नहीं था । उससे पहले तक आप भी सूत्रों से ऐसी ख़बरें लीक कर रहे थे । आप केस हार गए और पद पर भी बने रहे । इस्तीफ़ा नहीं दिया । मैं नहीं कह रहा कि आप ईमानदार नहीं है । बल्कि सेना मे आपकी यही कमाई है । लेकिन इतिहास यह भी है कि राजनीति में कई लोगों ने इस कमाई को भुनाया भी है ।
इस बीच आपने भी आरोप लगाया कि टेट्रा ट्रक के लिए किसी लेफ्टिनेंट जनरल ने आपको १४ करोड़ की पेशकश की थी । क्या सबूत दिया आपने, नाम लिया कि नहीं और सरकारी जाँच किस स्तर पर है ये सब बाद में गूगल कर यहाँ अपडेट कर दूँगा सर । वो मेजर वाला क़िस्सा भी जो वर्दी में आपके घर दिन के वक्त जासूसी उपकरण लगाने आया था ! कुछ तो चल रहा है आपके सरकार और बीजेपी के बीच ! खंडूड़ी साहब भी सेना से आए थे । ईमानदार और बढ़िया आदमी । निशंक जैसे घोटाले के आरोपी ने उन्हें चुनावी मैदान में हरवा दिया । ख़ैर । कांग्रेस में भी सही सब होता है ।
आज इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर छपी कि आपने कोई सीक्रेट एजेंसी बनाई थी ( नहीं मालूम कि यह सेनाध्यक्ष ऐसा यूनिट बनाते हैं का) जो जम्मू कश्मीर में तख्तापलट पलट का प्रयास कर रही थी । अफ़सरों ने गवाही दी है मगर सबूत मिलने के आसार कम हैं क्योंकि रितु सरीन लिखती हैं कि सबूत मिटा दिये गए होंगे । आपने एनजीओ बनवाया । क्या क्या न किया । यह भी जानता हूँ कि सत्य तो सामने आएगा नहीं हम तो बस इधर उधर की दलीलें ही करते रह जायेंगे ।
तो बीजेपी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि सवाल समय का है । राजनीति का यक्ष प्रश्न है समय । निर्मला पूछती हैं कि रिपोर्ट मार्च में तैयार थी तो अभी क्यों लीक किया । मोदी जी के साथ दिखने के बाद । जो मोदी जी के साथ दिखेगा और राजनीति करेगा तो निर्मला जी सरकार भी तो राजनीति करेगी न । जनरल साहब राजनीति करें तो ठीक और सरकार करें तो बड़ी बेवकूफ । अरे भाई सारा सवाल टाइम को लेकर ही कीजियेगा या जो रिपोर्ट में सवाल किया गया है उस पर भी कुछ बोलियेगा । यह रिपोर्ट सरकार ने बनाई है या सेना के डीजी मिलिट्री आपरेशन ने ? निर्मला जी आपको सेना पर विश्वास नहीं है ? मोदी जी की विश्वसनीयता इतनी असंदिग्ध कब से हो गई कि आपको जनरल साहब उन्हीं के कारण फँसाया जा रहा है । आपकी वजह से क्या लेफ़्टिनेंट जनरल भाटिया पर संदेह करें कि वे सरकार के हाथ खेल रहे हैं या सेना में ईमानदारी आपके बाद समाप्त हो चुकी है । मैं तो पूछ रहा हूँ । मेरी मजबूरी है कि सरकार पर भी शत प्रतिशत भरोसा नहीं कर सकता लेकिन शक सिर्फ सरकार पर ही तो नहीं कर सकता न । निर्मला कहती हैं कि सेना का मनंोबल नहीं गिरना चाहिए । हद है । क्या रिपोर्ट बनाने वाले लेफ़्टिनेंट जनरल भाटिया सेना नहीं है क्या । क्या तब सेना का मनोबल नहीं गिरेगा जब उसके अफ़सर की जाँच रिपोर्ट पर बीजेपी इसलिए शक करे क्योंकि जिसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट है वो अब पार्टी के साथ है । निर्मला जी अगर सरकार जनरल साब को बीजेपी के कारण टारगेट कर रही है तो आप भी तो उनका बचाव इसीलिए कर रही हैं कि वे आपके साथ हैं । गंगाजल की तरह ऐसी पवित्र राजनीति हमने देखी नहीं मैम ।
इस बीच किरण बेदी जी का भी ट्विट आया है कि सरकार जनरल वी के सिंह से सोच समझ कर व्यवहार करे क्योंकि सेना के लाखों जवानों की उन पर नज़र है । वे उनकी आवाज़ भी हैं । क्या बात है जनरल साहब । बेदी जी ने यह भी कहा कि सीक्रेट सर्विस फ़ंड की कोई ज़रूरत नहीं है । जब तक शिखर का सामूहिक नेतृत्व इस पर फैसला न करे । कहीं बेदी जी आप पर शक तो नहीं कर रही हैं ? या आपको बचाने के लिए नया सुझाव दे रही हैं ! और ये क्या बेदी जी । आपके क़ानून में तो सब बराबर हैं फिर ये लाखों सैनिकों की नज़र वाली बात के क्या मायने हैं ? भड़का रही हैं ? ठीक है जनरल साहब को चिट्ठी लिख रहा हूँ मगर वे आपको भी तो फार्वर्ड कर ही सकते हैं न ।
खै़र सरकार की तरफ़ से खबर आ रही है कि वो सीबीआई जाँच के लिए नहीं कहेगी । सीक्रेट फ़ंड और सैन्य ख़ुफ़िया का मामला है पता नहीं क्या क्या
सामने आ जाए । जम्मू कश्मीर के उस मंत्री ने भी खंडन कर दिया है कि आपने उसे पैसे दिये थे राज्य सरकार गिराने को । लेकिन अन्ना जी जो एक सिपाही थे वे अपनी सेना के जनरल से नाराज़ हो गए हैं । उन्होंने कहा है कि अगर जनरल साहब मोदी के साथ गए तो देश का यह सच्चा सिपाही उनसे रिश्ता तोड़ लेगा ( बात सही है थोड़ी नमक मिर्च लगा दी है मैंने जैसे सच्चा सिपाही वाली बात )
अंत भला तो सब भला । आप राजनीति कर रहे हैं । ईश्वर करें आप सफल हों और वो दृश्य भी देख सकूँ कि आपके आह्वान पर सैनिक नीतियाँ बनाने वालों को बदलने निकल पड़ें ! ठीक सर ।
आपका ग़ैर सैनिक देशभक्त
रवीश कुमार' एंकर'
आदरणीय पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह जी,
जैसा कि आप जानते हैं मैं बड़े लोगों को चिट्ठियाँ लिखता हूँ । दो दिनों से बोख़ार के कारण बेचैन मन के लिए समय व्यतीत करने का अच्छा तरीक़ा भी है । आप जानते ही हैं कि जब से पत्रकारिता शोरगुल वाली हो गई और दर्शक तू तू मैं मैं की चौपाल में टीवी से लेकर ट्वीटर तक पर मज़ा ले रहे हैं मैं घर पर समाचार माध्यमों से दूर रहता हूँ । आज जब इंडियन एक्सप्रेस में आपके बारे में ख़बरें पढ़ीं तो मैं गूगल करने लगा । कहाँ से शुरू करूँ । लिख रहा हूँ स्नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें समझाने को, खत पढ़कर चल मत आना हमीं को उल्टा समझाने को !
" भारत के सैनिक से ज़्यादा बहादुर, संवेदनशील,सहनशील सैनिक दुनिया में नहीं हैं "
आप अपने राज्य हरियाणा के रेवाड़ी में भूतपूर्व सैनिकों की रैली में बोल रहे थे । राजनीति में सेना से कोई आता है तो अनुशासन और ईमानदारी की दिव्य छवि लेकर आता है । अपने तमाम सहयोगियों के महाभ्रष्टाचार का बचाव करने वाली पार्टियाँ आप लोगों को मेडल की तरह सजा कर दिखाती हैं ताकि लगे न कि राजनीति में सब चोर डाकू ही हैं । आप बोले जा रहे थे-
" आज जब देश की हालत अस्त व्यस्त है । आज जब देश एक मुश्किल दौर से गुज़र रहा है तो भूतपूर्व सैनिकों और सैनिकों आपकी बहुत ज़रूरत है क्योंकि कहीं पर कोई कमी होती है तो सेना को बुलाया जाता है । आज अगर निर्माण का काम करना है , परिवर्तन का काम करना है तो इसमें आपकी भूमिका है "
भूतपूर्व सैनिकों का आह्वान तो ठीक है मगर सैनिकों का ? परिवर्तन और निर्माण क्या है सर? सेना का आह्वान कर रहे हैं ? सैनिकों को बुला रहे हैं तो रेजीमेंटों में नेताओं के तंबू लगवा दीजिये न वोट माँगने की रैली वहाँ भी हो ही जाए । सिर्फ इसलिए कि आप ईमानदार है और सेनाध्यक्ष पद से रिटायर हुए हैं तो एक राजनैतिक मंच से सैनिकों का आह्वान कर सकते हैं । आप फिर बोल रहे है उसी रैली में -
" देश की सुरक्षा नीतियों को देखकर अफ़सोस होता है । हमारी नीतियाँ ठीक नहीं हैं । पड़ोसी देश हमारी सीमाओं का उल्लंघन करते हैं, पश्चिम, उत्तर और पूरब की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं । बेखौफ और बेखटके । इसलिए कि हमारी नीतियां ठीक नहीं हैं । इसलिए नहीं कि हम कमज़ोर हैं । क्या आप कमज़ोर हैं ? नहीं न तो जो कमज़ोर नीतियाँ बनाते हैं उन्हें बदलने की ज़रूरत है । "
मैं सर गूगल कर रहा था । जनवरी २०११ का आपका बयान है लद्दाख में चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय सीमा के अतिक्रमण का ( सोर्स- newindianexpress.com और news.oneindia.com) । आप इस खबर का खंडन कर रहे हैं और बता रहे हैं कि यह अतिक्रमण नहीं बल्कि धारणाओं का मामला है । यानी आपके समय मे भी ऐसी बेसिर पैर की बातें होती थीं और आप खंडन करते थे । वर्ना आप कमज़ोर नीतियों के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा न दे देते । जब आप उम्र के सवाल पर सरकार को अदालत में खींच सकते हैं तो चीनी अतिक्रमण का विरोध तो कर ही सकते थे । अदालत वाली बात से पहले यह समझना चाहता हूँ कि आप बीजेपी के मंच पर क्यों होते हैं और बीजेपी के नेता आपके मंच पर क्यों ? बीजेपी आपका बचाव क्यों करने लगती है ? आपने अन्ना वाले मंच का क्या किया जिस पर आप रिटायर होते ही गए थे ।
( indiatoday.com, timesofindia.com, 02/02/2013, Day and Night news.com 20.9.2013) गूगल ने इस साइट से आपका एक बयान निकाल कर दिया है मुझे । जो अनुवाद के साथ इस प्रकार है-
" एक कमांडर के नाते मुशर्रफ का कारगिल युद्ध से पहले भारतीय सीमा में ग्यारह किमी अंदर आने के साहस की तारीफ करता हूँ । "
आप दुश्मन की करनी को साहस बताते हैं, कोई रोक सकता है आपको, आप सेनाध्यक्ष हैं न सर । खैर आगे जो कहते हैं अगर उसे नरेंद्र मोदी जी ने सुन लिया या संघ ने तो देख लिया तो हमको मत कहियेगा ।
" कारगिल के दौरान भारतीय पक्ष से ग़लतियाँ हुईं थीं जिससे पाकिस्तानी सेना को हमारी सेना में आने का मौका मिला । हमें मुशर्रफ को बच कर जाने नहीं देना चाहिए था "
आप कारगिल युद्ध को भारतीय नीतियों( या एनडीए सरकार की ? ) की ग़लती मानते हैं तो आपने उस वक्त कमज़ोर नीतियाँ बनाने वालों को बदलने का आह्वान किया था ? नीतिसेंट्रल की साइट पर खबर छपी है कि आप रायबरेली से सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ टिकट मांग रहे हैं । ( बीजेपी ने अपने कार्यकर्ताओं को जो बुकलेट दिया है उसमें दिया है कि किन वेबसाइट का अनुसरण करना है । इनमें नीतिसेंट्रल भी एक है )
जनरल साहब बीजेपी में आपकी सेटिंग आडवाणी से भी बेहतर है । जिन्ना को अच्छा क्या बताया बेचारे को निपटा ही दिया गया । आप मुशर्रफ की तारीफ़ कर मोदी जी के साथ रैली करते हैं । उस मोदी जी के साथ जो गुजरात की चुनावी रैलियों में मियाँ मुशर्रफ पुकारा करते थे । संदर्भ बता दूँ या रहने दूँ सर । मोदी जी प्र म पद के उम्मीदवार बनकर पहली बार आपकी रैली में रेवाड़ी आते हैं । अभी आप बीजेपी में थोड़े न शामिल हुए हैं । तब ई हाल है । बीजेपी मरी जा रही है आपका बचाव करने में । कुछ तो बात है । जिन्ना सेकुलर और मुशर्रफ साहसिक । कहीं तब के सेनाध्यक्ष मलिक साहब पर तो टिप्पणी नहीं है ये । वाजपेयी जी की सरकार पर तो आप कर नहीं सकते न !
बीजेपी तो तब भी आपका पक्ष ले रही थी जब आप उम्र के सवाल पर सरकार से लड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट चले गए । वहाँ जब सोलििटर जनरल आर एफ नरीमन ने वे सारे दस्तावेज़ दिखा दिए कि आपने कब कब दस मई १९५० का जन्मदिन मानने की बात कही है तो आपके पास बचाव में कुछ नहीं था । उससे पहले तक आप भी सूत्रों से ऐसी ख़बरें लीक कर रहे थे । आप केस हार गए और पद पर भी बने रहे । इस्तीफ़ा नहीं दिया । मैं नहीं कह रहा कि आप ईमानदार नहीं है । बल्कि सेना मे आपकी यही कमाई है । लेकिन इतिहास यह भी है कि राजनीति में कई लोगों ने इस कमाई को भुनाया भी है ।
इस बीच आपने भी आरोप लगाया कि टेट्रा ट्रक के लिए किसी लेफ्टिनेंट जनरल ने आपको १४ करोड़ की पेशकश की थी । क्या सबूत दिया आपने, नाम लिया कि नहीं और सरकारी जाँच किस स्तर पर है ये सब बाद में गूगल कर यहाँ अपडेट कर दूँगा सर । वो मेजर वाला क़िस्सा भी जो वर्दी में आपके घर दिन के वक्त जासूसी उपकरण लगाने आया था ! कुछ तो चल रहा है आपके सरकार और बीजेपी के बीच ! खंडूड़ी साहब भी सेना से आए थे । ईमानदार और बढ़िया आदमी । निशंक जैसे घोटाले के आरोपी ने उन्हें चुनावी मैदान में हरवा दिया । ख़ैर । कांग्रेस में भी सही सब होता है ।
आज इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर छपी कि आपने कोई सीक्रेट एजेंसी बनाई थी ( नहीं मालूम कि यह सेनाध्यक्ष ऐसा यूनिट बनाते हैं का) जो जम्मू कश्मीर में तख्तापलट पलट का प्रयास कर रही थी । अफ़सरों ने गवाही दी है मगर सबूत मिलने के आसार कम हैं क्योंकि रितु सरीन लिखती हैं कि सबूत मिटा दिये गए होंगे । आपने एनजीओ बनवाया । क्या क्या न किया । यह भी जानता हूँ कि सत्य तो सामने आएगा नहीं हम तो बस इधर उधर की दलीलें ही करते रह जायेंगे ।
तो बीजेपी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि सवाल समय का है । राजनीति का यक्ष प्रश्न है समय । निर्मला पूछती हैं कि रिपोर्ट मार्च में तैयार थी तो अभी क्यों लीक किया । मोदी जी के साथ दिखने के बाद । जो मोदी जी के साथ दिखेगा और राजनीति करेगा तो निर्मला जी सरकार भी तो राजनीति करेगी न । जनरल साहब राजनीति करें तो ठीक और सरकार करें तो बड़ी बेवकूफ । अरे भाई सारा सवाल टाइम को लेकर ही कीजियेगा या जो रिपोर्ट में सवाल किया गया है उस पर भी कुछ बोलियेगा । यह रिपोर्ट सरकार ने बनाई है या सेना के डीजी मिलिट्री आपरेशन ने ? निर्मला जी आपको सेना पर विश्वास नहीं है ? मोदी जी की विश्वसनीयता इतनी असंदिग्ध कब से हो गई कि आपको जनरल साहब उन्हीं के कारण फँसाया जा रहा है । आपकी वजह से क्या लेफ़्टिनेंट जनरल भाटिया पर संदेह करें कि वे सरकार के हाथ खेल रहे हैं या सेना में ईमानदारी आपके बाद समाप्त हो चुकी है । मैं तो पूछ रहा हूँ । मेरी मजबूरी है कि सरकार पर भी शत प्रतिशत भरोसा नहीं कर सकता लेकिन शक सिर्फ सरकार पर ही तो नहीं कर सकता न । निर्मला कहती हैं कि सेना का मनंोबल नहीं गिरना चाहिए । हद है । क्या रिपोर्ट बनाने वाले लेफ़्टिनेंट जनरल भाटिया सेना नहीं है क्या । क्या तब सेना का मनोबल नहीं गिरेगा जब उसके अफ़सर की जाँच रिपोर्ट पर बीजेपी इसलिए शक करे क्योंकि जिसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट है वो अब पार्टी के साथ है । निर्मला जी अगर सरकार जनरल साब को बीजेपी के कारण टारगेट कर रही है तो आप भी तो उनका बचाव इसीलिए कर रही हैं कि वे आपके साथ हैं । गंगाजल की तरह ऐसी पवित्र राजनीति हमने देखी नहीं मैम ।
इस बीच किरण बेदी जी का भी ट्विट आया है कि सरकार जनरल वी के सिंह से सोच समझ कर व्यवहार करे क्योंकि सेना के लाखों जवानों की उन पर नज़र है । वे उनकी आवाज़ भी हैं । क्या बात है जनरल साहब । बेदी जी ने यह भी कहा कि सीक्रेट सर्विस फ़ंड की कोई ज़रूरत नहीं है । जब तक शिखर का सामूहिक नेतृत्व इस पर फैसला न करे । कहीं बेदी जी आप पर शक तो नहीं कर रही हैं ? या आपको बचाने के लिए नया सुझाव दे रही हैं ! और ये क्या बेदी जी । आपके क़ानून में तो सब बराबर हैं फिर ये लाखों सैनिकों की नज़र वाली बात के क्या मायने हैं ? भड़का रही हैं ? ठीक है जनरल साहब को चिट्ठी लिख रहा हूँ मगर वे आपको भी तो फार्वर्ड कर ही सकते हैं न ।
खै़र सरकार की तरफ़ से खबर आ रही है कि वो सीबीआई जाँच के लिए नहीं कहेगी । सीक्रेट फ़ंड और सैन्य ख़ुफ़िया का मामला है पता नहीं क्या क्या
सामने आ जाए । जम्मू कश्मीर के उस मंत्री ने भी खंडन कर दिया है कि आपने उसे पैसे दिये थे राज्य सरकार गिराने को । लेकिन अन्ना जी जो एक सिपाही थे वे अपनी सेना के जनरल से नाराज़ हो गए हैं । उन्होंने कहा है कि अगर जनरल साहब मोदी के साथ गए तो देश का यह सच्चा सिपाही उनसे रिश्ता तोड़ लेगा ( बात सही है थोड़ी नमक मिर्च लगा दी है मैंने जैसे सच्चा सिपाही वाली बात )
अंत भला तो सब भला । आप राजनीति कर रहे हैं । ईश्वर करें आप सफल हों और वो दृश्य भी देख सकूँ कि आपके आह्वान पर सैनिक नीतियाँ बनाने वालों को बदलने निकल पड़ें ! ठीक सर ।
आपका ग़ैर सैनिक देशभक्त
रवीश कुमार' एंकर'
Friday, September 20, 2013
Cinmaya N Singh
22 minutes ago ·
दैया कहां गए वो लोग?
लोगों को मालूम है, कि अंग्रेजों का अधिपत्य रहते हुए भी राजा-महाराजाओं द्वारा सब दिन कला,संगीत आदि का संवर्धन होता रहा। इस मद में रजवाड़ों ने खर्च किये।लेकिन, कई ऐसे भी राजे-महाराजे हुए जिनकी मूर्खता को भूलना भी नहीं चाहिए। ऐसी ही एक घटना का जिक्र स्वर्गीय उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहिब के संस्मरण में मिलता है,जिससे “महाराजा ऑफ़ ग्वालियर,लेफ्टिनेंट जेनरल सर जॉर्ज जीवाजी राव सिंधिया” (माधव राव सिंधिया के पिता) और उस घराने द्वारा देश के साथ किये गए गद्दारी की बात याद आती है। सिंधिया यदि अंग्रेजों को खबर नहीं करते तो कालपी पहुँच कर तांत्या टोपे से मुलाक़ात करतीं।फिर वहां से जगदीशपुर कूच कर इन लोगों की मुलाक़ात बाबू कुंवर सिंह से भेंट होने का कार्यक्रम था.....और सब मिलकर अंग्रेजों से लोहा लेने की योजना थी। लेकिन झांसी की रानी( जो बार-बार अंग्रेजों को यह कहती आई थी कि “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी”) का घोड़ा एक नाला पार करते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया और पीछे पड़े अंग्रेज सैनिक महारानी को मारने में सफल हो गए। उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहिब के साथ किया गया अपमान इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। जिवाजी राव कैसे अंग्रेज भक्त थे,इसका अंदाजा उनके नाम के पूर्व लगे ‘जॉर्ज’ से ही स्पष्ट हो जाता है। यह भी सत्य है कि उस्ताद को ऐसे राजा की छत्रछाया में, जिसे शास्त्रीय संगीत का कुछ भी ज्ञान नहीं,जिसके दरबार में उस कोटि के विद्वान की कोई पूछ नहीं.... वास ही नहीं करना चाहिए था। परन्तु उस्ताद के सामने विकल्प नहीं था। इसी बीच जिवाजी राव का विवाह हुआ। नई महारानी विजयाराजे को संगीत का शौक़ था और उस्ताद तथा उनके गुणों की भी समझ थी। उन्होंने अपनी इच्छा को महाराज के सामने रखा, और तुरंत ही नव महारानी को सितार सिखाने का हुक्म उस्ताद के पास पहुँच गया। साठ बरस के करीब पहुँच चुके उस्ताद को “उषाकिरण पैलेस” तक लाने-पहुंचाने हेतु एक रथनुमा बैलगाड़ी आने लगी।
अब इस बैलगाड़ी पर वो रोज किले के मुख्य द्वार तक जाते थे, और वहां से उषाकिरण पैलेस की अलग यात्रा। नवब्याहता महारानी के कई तरह के शौक थे, सिर्फ संगीत से ही लेना-देना नहीं था।जिवाजी राव अंग्रेजों के कितने बड़े चमचे थे, सो तो कह ही आये हैं।इसलिए महारानी की अधिकतर शामें ‘लेट नाइट पार्टियों’ में बीतती थी, परिणामस्वरूप अधिक दफा उस्ताद को ए.डी.सी. के ऑफिस में घंटों बैठ के वापस अपने डेरे पर लौटना पड़ता था, जिसमें तीन घंटे लगते थे। महारानी के साथ उनकी दो सखियां भी सितार सीखने लगी, जिन्हें बाद में लेडी जाधव और लेडी पाटनकर के नाम से जाना गया। इन तीनों भी.भी.आई.पी के योग्य सितार बनवाने के लिए उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहेब मिरज गए,जहां के हाजी अब्दुल करीम खान के हाथों का निर्मित सितार विख्यात था।वहां से सितार और तानपूरा बन कर आया।तीनों की विधिवत तालीम शुरू हुई। लेडी जाधव और लेडी पाटनकर को तो महीने भर में ही पता चल गया कि वे और कुछ सीख सकें कि नहीं,संगीत उनके औकात से बाहर की चीज़ है।
दोनों ससुराल गयी,और दोनों के सितार को जो मायके के पैलेस की दीवाल में लटकाया गया....सो लटका ही रह गया।
विजयाराजे का सितार कुछ दिन तक बजा, सो इसलिए कि नहीं कि जिवाजी राव को शास्त्रीय संगीत से प्रेम हो चला था। बल्कि इसलिए कि विजयाराजे भतीजी थी ठाकुर चन्दन सिंह की। चूंकि गुणी घर-परिवार की बेटी थी विजयाराजे, इसलिए उन्हें पता था कि उनका सौभाग्य उन्हें उस्ताद हाफ़िज़ अली खान जैसे गुरु से सीखने का अवसर दे रहा है। खैर,किसी तरह पांच-दस दिन पर एक बार महारानी की सितार से भेंट हो जाती थी। अधिकतर, महारानी को बीच में ही उठकर जाना पड़ता था। परिणामतः महारानी का स्वभाव स्त्रियोचित तरीके से व्यवहार करता था और मूड_स्विंग होता रहता था।पैदल जाते-आते बुज़ुर्ग उस्ताद को बड़ा ही कष्ट होता था।जबकि जिवाजी राव के गराज में मर्सिडीज़,पैकार्ड और कैडिलेक गाड़ियों की कतारें लगी रहती थीं। यह सहज ही था कि उस्ताद जी को उस ‘रथनुमा’ बैलगाड़ी की तुलना में ये मोटरगाड़ियां ज्यादा सम्मानजनक और आरामदेह लगी थी।उस्ताद की इस आकांक्षा की जानकारी पाते ही जिवाजी राव आपा खो बैठे। तत्काल अपने ए.डी.सी को बुलाया, और आदेश किया कि चार घोड़े से खींचे जाने वाले एक तोप सरीखी गाडी पर उस्ताद को बैठा के पहले थाटिपुर ले जाया जाय,फिर इनको आर्मी परेड ग्राउंड में ले जा के घोड़ों को फुल स्पीड में दौडाया जाय।ऐसा ही हुआ।संगीत-साहित्य-कला-विहीना जिवाजी राव की की यह मूर्खता(इडियोसिंक्रेसी) की कहानी थी।गुणी को हास्यास्पद बनाना,उनका मखौल उड़ाना।समय बीतता गया।विजयाराजे के मन में भी संगीत या गुणी अथवा गुरु के लिए कोई ख़ास आदर का भाव नहीं रहा।यह सब देख कर उस्ताद का मन खट्टा हो जाता था।अधिकतर वक्त वे सीखने के बदले इधर-उधर की बातें करती रहतीं थी।तरह-तरह के हुक्म देती थीं,फरमान सुनाती थी। लोगों के बीच उस्ताद को आदेश करती थी जो उस्ताद को अपमानजनक लगता था।ऐसे ही एक दिन विजयाराजे ने कहा कि “आज मुझे राग विहाग सिखाइए’’। उस्ताद पशोपेश में, सुबह का वक्त था और इधर महारानी का हुक्म – ‘’कि अभी..अभी इस समय राग विहाग सिखाइए’’। साठ से ज्यादा के उस्ताद,ग्वालियर घराना के संस्थापक,शास्त्रीय संगीत के महान ज्ञाता, ने बहुत सकुचाते हुए,महारानी को जो कुछ कहा...वह उन्हीं के शब्दों में ----“हुज़ूर,ये रात की रागिनी है और इस वक़्त ये सो रही है।इसको दिन के वक़्त जगाना ठीक नहीं है।खादिम हुज़ूर का गुलाम है।हुज़ूर जब भी चाहेंगे ये गुलाम को कभी भी रात के वक्त आने के लिए हुकुम करें तो ये गुलाम हाज़िर होकर हुज़ूर को राग विहाग की तालीम नज़र कर देगा!”
अपने महाराज को पूरा घटनाक्रम सुनाया महारानी ने।महारानी ने तो सुनाया था संगीत की तालीम उस्ताद के अनुशासन को प्रशंसात्मक लहजे में,लेकिन जिवाजी राव यह सुनकर फिर आगबबूले हो गए। तत्काल अपने मिलिट्री सेक्रेटरी कर्नल सूर्याजी राव सुर्वे को बुलाकर उस्ताद को सबक सिखाने का आदेश दिया। उस्ताद को उषाकिरण पैलेस के अहाते में घंटों खड़े रखने के बाद मिलिट्री सेक्रेटरी के दफ्तर में बुलाया गया। कर्नल सुर्वे ने जोर-जोर से “कमीना –नमकहराम-बेइमान” जैसी गालियाँ देते हुए धमकी दी कि महारानी का हुक्म ना मानने के अपराध में उनको ग्वालियर रियासत से निकाला भी जा सकता है। यह सब सुन कर उस्ताद की क्या दशा हुई होगी, सोचा जा सकता है। किसी तरह प्रयत्न करके आप उषाकिरण पैलेस ने विदा हो गए।वहाँ से जय विलास पैलेस के दरवाजे तक चलते हुए आये, और फिर एक तांगे से अपने डेरे तक पहुंचे।उस दिन, अपने हित-अपेक्षित,शागिर्द के सामने बच्चों की तरह रोते हुए बुज़ुर्ग उस्ताद ने सबको भीतर से झकझोर कर रख दिया। इसी दिन से विजयाराजे की संगीत-शिक्षा की भी इतिश्री हो गयी।
(मैथिली के ख्यातिप्राप्त लेखक,साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक स्व.साकेतानंद जी के मैथिली ब्लॉग से। अनुवाद: चिन्मया नन्द।)
22 minutes ago ·
दैया कहां गए वो लोग?
लोगों को मालूम है, कि अंग्रेजों का अधिपत्य रहते हुए भी राजा-महाराजाओं द्वारा सब दिन कला,संगीत आदि का संवर्धन होता रहा। इस मद में रजवाड़ों ने खर्च किये।लेकिन, कई ऐसे भी राजे-महाराजे हुए जिनकी मूर्खता को भूलना भी नहीं चाहिए। ऐसी ही एक घटना का जिक्र स्वर्गीय उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहिब के संस्मरण में मिलता है,जिससे “महाराजा ऑफ़ ग्वालियर,लेफ्टिनेंट जेनरल सर जॉर्ज जीवाजी राव सिंधिया” (माधव राव सिंधिया के पिता) और उस घराने द्वारा देश के साथ किये गए गद्दारी की बात याद आती है। सिंधिया यदि अंग्रेजों को खबर नहीं करते तो कालपी पहुँच कर तांत्या टोपे से मुलाक़ात करतीं।फिर वहां से जगदीशपुर कूच कर इन लोगों की मुलाक़ात बाबू कुंवर सिंह से भेंट होने का कार्यक्रम था.....और सब मिलकर अंग्रेजों से लोहा लेने की योजना थी। लेकिन झांसी की रानी( जो बार-बार अंग्रेजों को यह कहती आई थी कि “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी”) का घोड़ा एक नाला पार करते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया और पीछे पड़े अंग्रेज सैनिक महारानी को मारने में सफल हो गए। उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहिब के साथ किया गया अपमान इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। जिवाजी राव कैसे अंग्रेज भक्त थे,इसका अंदाजा उनके नाम के पूर्व लगे ‘जॉर्ज’ से ही स्पष्ट हो जाता है। यह भी सत्य है कि उस्ताद को ऐसे राजा की छत्रछाया में, जिसे शास्त्रीय संगीत का कुछ भी ज्ञान नहीं,जिसके दरबार में उस कोटि के विद्वान की कोई पूछ नहीं.... वास ही नहीं करना चाहिए था। परन्तु उस्ताद के सामने विकल्प नहीं था। इसी बीच जिवाजी राव का विवाह हुआ। नई महारानी विजयाराजे को संगीत का शौक़ था और उस्ताद तथा उनके गुणों की भी समझ थी। उन्होंने अपनी इच्छा को महाराज के सामने रखा, और तुरंत ही नव महारानी को सितार सिखाने का हुक्म उस्ताद के पास पहुँच गया। साठ बरस के करीब पहुँच चुके उस्ताद को “उषाकिरण पैलेस” तक लाने-पहुंचाने हेतु एक रथनुमा बैलगाड़ी आने लगी।
अब इस बैलगाड़ी पर वो रोज किले के मुख्य द्वार तक जाते थे, और वहां से उषाकिरण पैलेस की अलग यात्रा। नवब्याहता महारानी के कई तरह के शौक थे, सिर्फ संगीत से ही लेना-देना नहीं था।जिवाजी राव अंग्रेजों के कितने बड़े चमचे थे, सो तो कह ही आये हैं।इसलिए महारानी की अधिकतर शामें ‘लेट नाइट पार्टियों’ में बीतती थी, परिणामस्वरूप अधिक दफा उस्ताद को ए.डी.सी. के ऑफिस में घंटों बैठ के वापस अपने डेरे पर लौटना पड़ता था, जिसमें तीन घंटे लगते थे। महारानी के साथ उनकी दो सखियां भी सितार सीखने लगी, जिन्हें बाद में लेडी जाधव और लेडी पाटनकर के नाम से जाना गया। इन तीनों भी.भी.आई.पी के योग्य सितार बनवाने के लिए उस्ताद हाफ़िज़ अली खान साहेब मिरज गए,जहां के हाजी अब्दुल करीम खान के हाथों का निर्मित सितार विख्यात था।वहां से सितार और तानपूरा बन कर आया।तीनों की विधिवत तालीम शुरू हुई। लेडी जाधव और लेडी पाटनकर को तो महीने भर में ही पता चल गया कि वे और कुछ सीख सकें कि नहीं,संगीत उनके औकात से बाहर की चीज़ है।
दोनों ससुराल गयी,और दोनों के सितार को जो मायके के पैलेस की दीवाल में लटकाया गया....सो लटका ही रह गया।
विजयाराजे का सितार कुछ दिन तक बजा, सो इसलिए कि नहीं कि जिवाजी राव को शास्त्रीय संगीत से प्रेम हो चला था। बल्कि इसलिए कि विजयाराजे भतीजी थी ठाकुर चन्दन सिंह की। चूंकि गुणी घर-परिवार की बेटी थी विजयाराजे, इसलिए उन्हें पता था कि उनका सौभाग्य उन्हें उस्ताद हाफ़िज़ अली खान जैसे गुरु से सीखने का अवसर दे रहा है। खैर,किसी तरह पांच-दस दिन पर एक बार महारानी की सितार से भेंट हो जाती थी। अधिकतर, महारानी को बीच में ही उठकर जाना पड़ता था। परिणामतः महारानी का स्वभाव स्त्रियोचित तरीके से व्यवहार करता था और मूड_स्विंग होता रहता था।पैदल जाते-आते बुज़ुर्ग उस्ताद को बड़ा ही कष्ट होता था।जबकि जिवाजी राव के गराज में मर्सिडीज़,पैकार्ड और कैडिलेक गाड़ियों की कतारें लगी रहती थीं। यह सहज ही था कि उस्ताद जी को उस ‘रथनुमा’ बैलगाड़ी की तुलना में ये मोटरगाड़ियां ज्यादा सम्मानजनक और आरामदेह लगी थी।उस्ताद की इस आकांक्षा की जानकारी पाते ही जिवाजी राव आपा खो बैठे। तत्काल अपने ए.डी.सी को बुलाया, और आदेश किया कि चार घोड़े से खींचे जाने वाले एक तोप सरीखी गाडी पर उस्ताद को बैठा के पहले थाटिपुर ले जाया जाय,फिर इनको आर्मी परेड ग्राउंड में ले जा के घोड़ों को फुल स्पीड में दौडाया जाय।ऐसा ही हुआ।संगीत-साहित्य-कला-विहीना जिवाजी राव की की यह मूर्खता(इडियोसिंक्रेसी) की कहानी थी।गुणी को हास्यास्पद बनाना,उनका मखौल उड़ाना।समय बीतता गया।विजयाराजे के मन में भी संगीत या गुणी अथवा गुरु के लिए कोई ख़ास आदर का भाव नहीं रहा।यह सब देख कर उस्ताद का मन खट्टा हो जाता था।अधिकतर वक्त वे सीखने के बदले इधर-उधर की बातें करती रहतीं थी।तरह-तरह के हुक्म देती थीं,फरमान सुनाती थी। लोगों के बीच उस्ताद को आदेश करती थी जो उस्ताद को अपमानजनक लगता था।ऐसे ही एक दिन विजयाराजे ने कहा कि “आज मुझे राग विहाग सिखाइए’’। उस्ताद पशोपेश में, सुबह का वक्त था और इधर महारानी का हुक्म – ‘’कि अभी..अभी इस समय राग विहाग सिखाइए’’। साठ से ज्यादा के उस्ताद,ग्वालियर घराना के संस्थापक,शास्त्रीय संगीत के महान ज्ञाता, ने बहुत सकुचाते हुए,महारानी को जो कुछ कहा...वह उन्हीं के शब्दों में ----“हुज़ूर,ये रात की रागिनी है और इस वक़्त ये सो रही है।इसको दिन के वक़्त जगाना ठीक नहीं है।खादिम हुज़ूर का गुलाम है।हुज़ूर जब भी चाहेंगे ये गुलाम को कभी भी रात के वक्त आने के लिए हुकुम करें तो ये गुलाम हाज़िर होकर हुज़ूर को राग विहाग की तालीम नज़र कर देगा!”
अपने महाराज को पूरा घटनाक्रम सुनाया महारानी ने।महारानी ने तो सुनाया था संगीत की तालीम उस्ताद के अनुशासन को प्रशंसात्मक लहजे में,लेकिन जिवाजी राव यह सुनकर फिर आगबबूले हो गए। तत्काल अपने मिलिट्री सेक्रेटरी कर्नल सूर्याजी राव सुर्वे को बुलाकर उस्ताद को सबक सिखाने का आदेश दिया। उस्ताद को उषाकिरण पैलेस के अहाते में घंटों खड़े रखने के बाद मिलिट्री सेक्रेटरी के दफ्तर में बुलाया गया। कर्नल सुर्वे ने जोर-जोर से “कमीना –नमकहराम-बेइमान” जैसी गालियाँ देते हुए धमकी दी कि महारानी का हुक्म ना मानने के अपराध में उनको ग्वालियर रियासत से निकाला भी जा सकता है। यह सब सुन कर उस्ताद की क्या दशा हुई होगी, सोचा जा सकता है। किसी तरह प्रयत्न करके आप उषाकिरण पैलेस ने विदा हो गए।वहाँ से जय विलास पैलेस के दरवाजे तक चलते हुए आये, और फिर एक तांगे से अपने डेरे तक पहुंचे।उस दिन, अपने हित-अपेक्षित,शागिर्द के सामने बच्चों की तरह रोते हुए बुज़ुर्ग उस्ताद ने सबको भीतर से झकझोर कर रख दिया। इसी दिन से विजयाराजे की संगीत-शिक्षा की भी इतिश्री हो गयी।
(मैथिली के ख्यातिप्राप्त लेखक,साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक स्व.साकेतानंद जी के मैथिली ब्लॉग से। अनुवाद: चिन्मया नन्द।)
Abhishek Goswami
After the great Kannada writer and critic UR Ananthamurthy said he wouldn’t want to live in a country led by Narendra Modi, BJP supporters have gone on the extreme offensive. Some have called for Ananthamurthy to leave the country; less measured Modi supporters have even wished for his death. Speaking to Aradhna Wal, Ananthamurthy argues that Modi has no inner life, that the Gujarat riots have not pricked his conscience, that he is far too sure of himself to deserve voters’ trust.
Is Narendra Modi offensive to your particular idea of India?
Modi is a man who has no inner life. Nehru, our first prime minister, had an abundant inner life. Sometimes that made him hesitant in dealing with a country like India, but he was lucky to have a man like Patel by his side. We have had no rule of that kind since. Even Vajpayee tried to be like Nehru. But Modi is the complete opposite. I’m sure that the 1984 Sikh riots have troubled the minds of some Congress people. I will never forgive them for the riots, but I know they pricked the conscience of some within the Congress. The 2002 riots in Gujarat have not pricked Modi’s conscience at all. It shows in his statements where he used that ‘dog getting crushed by a car’ reference. As a writer, I can tell by this imagery that this man isn’t human. He is trying to catch the media’s attention and the media is giving in. Even I, by talking about this, am giving him attention. I don’t give much value to administrative capabilities. Modi saying that he is a good administrator is like me saying I breathe normally every day. He can’t make a virtue out of that, or out of being honest and incorruptible, though I doubt if he is. One is supposed to be honest and capable to lead the people.
What has been the reaction to your comment? How would you reply to it?
I grew up critical of Nehru and Indira. I was against the Emergency. I was criticised for that but never abused like I have been now. This is the nature of fascism. The man has the might of the corporate world behind him, and most of the media. And all these admirers get worried about one remark made by literary man. After all, that’s what I am, a writer. I don’t even write in English. It shows that literature still has power. When an authoritarian personality comes to power, those who are silent now, will be even more silent. So, I don’t want to live in a world where Modi is Prime Minister.
What are the chances of Modi coming to power?
I am worried about his chances of coming to power, though I don’t think he will. But I am very disappointed in the way the Congress has done nothing about this, despite being a strong party with many great personalities. But I have to tell you, before the Karnataka elections, some literary personalities and I held a press conference to ask people to vote for Congress. We wanted that long BJP rule to end in the state. I personally know and admire Siddaramaiah, the current Karnataka chief minister. I may be disappointed with them, but am happy that the Congress is in power in Karnataka.
Do you think the country can move past the 2002 riots?
I don’t think so. I also don’t think the BJP will get enough seats in the 2014 elections. And if the Congress fails, there are other parties and personalities in the country. There is the man in Bihar, who has been managing such a backward state. In fact, for me, even Deve Gowda was not that bad. Modi, however, is very cheap in the way he publicises himself. I am suspicious of a man always so sure of himself. Unlike Gandhi or Nehru, who could handle the pluralism of this country, he has no inner conflict, no hesitation.
You’ve often called him a fascist. Could you elaborate on that?
An important characteristic of fascism is that it creates rumours. Such as the ones the Sangh Parivar has circulated in my case. There is a Kannada newspaper called Kannada Prabah, which has published these rumours and the ugly things people say about me. Things such as I should die. This is what happened in Hitler’s time. It’s what my PhD was on.
After the great Kannada writer and critic UR Ananthamurthy said he wouldn’t want to live in a country led by Narendra Modi, BJP supporters have gone on the extreme offensive. Some have called for Ananthamurthy to leave the country; less measured Modi supporters have even wished for his death. Speaking to Aradhna Wal, Ananthamurthy argues that Modi has no inner life, that the Gujarat riots have not pricked his conscience, that he is far too sure of himself to deserve voters’ trust.
Is Narendra Modi offensive to your particular idea of India?
Modi is a man who has no inner life. Nehru, our first prime minister, had an abundant inner life. Sometimes that made him hesitant in dealing with a country like India, but he was lucky to have a man like Patel by his side. We have had no rule of that kind since. Even Vajpayee tried to be like Nehru. But Modi is the complete opposite. I’m sure that the 1984 Sikh riots have troubled the minds of some Congress people. I will never forgive them for the riots, but I know they pricked the conscience of some within the Congress. The 2002 riots in Gujarat have not pricked Modi’s conscience at all. It shows in his statements where he used that ‘dog getting crushed by a car’ reference. As a writer, I can tell by this imagery that this man isn’t human. He is trying to catch the media’s attention and the media is giving in. Even I, by talking about this, am giving him attention. I don’t give much value to administrative capabilities. Modi saying that he is a good administrator is like me saying I breathe normally every day. He can’t make a virtue out of that, or out of being honest and incorruptible, though I doubt if he is. One is supposed to be honest and capable to lead the people.
What has been the reaction to your comment? How would you reply to it?
I grew up critical of Nehru and Indira. I was against the Emergency. I was criticised for that but never abused like I have been now. This is the nature of fascism. The man has the might of the corporate world behind him, and most of the media. And all these admirers get worried about one remark made by literary man. After all, that’s what I am, a writer. I don’t even write in English. It shows that literature still has power. When an authoritarian personality comes to power, those who are silent now, will be even more silent. So, I don’t want to live in a world where Modi is Prime Minister.
What are the chances of Modi coming to power?
I am worried about his chances of coming to power, though I don’t think he will. But I am very disappointed in the way the Congress has done nothing about this, despite being a strong party with many great personalities. But I have to tell you, before the Karnataka elections, some literary personalities and I held a press conference to ask people to vote for Congress. We wanted that long BJP rule to end in the state. I personally know and admire Siddaramaiah, the current Karnataka chief minister. I may be disappointed with them, but am happy that the Congress is in power in Karnataka.
Do you think the country can move past the 2002 riots?
I don’t think so. I also don’t think the BJP will get enough seats in the 2014 elections. And if the Congress fails, there are other parties and personalities in the country. There is the man in Bihar, who has been managing such a backward state. In fact, for me, even Deve Gowda was not that bad. Modi, however, is very cheap in the way he publicises himself. I am suspicious of a man always so sure of himself. Unlike Gandhi or Nehru, who could handle the pluralism of this country, he has no inner conflict, no hesitation.
You’ve often called him a fascist. Could you elaborate on that?
An important characteristic of fascism is that it creates rumours. Such as the ones the Sangh Parivar has circulated in my case. There is a Kannada newspaper called Kannada Prabah, which has published these rumours and the ugly things people say about me. Things such as I should die. This is what happened in Hitler’s time. It’s what my PhD was on.
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