Friday, August 30, 2013

‘अगर मेरी बेटी वहीं बता देती तो मैं एक पत्थर उठाकर वहीं आसाराम को मार देता’
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29/08/2013 19:03:00


आसाराम बापू पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली बच्ची के पिता बता रहे हैं कि असल में हुआ क्या था और उन पर किस तरह के दबाव डाले जा रहे हैं.प्रियंका दुबे की रिपोर्ट.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर हम शाहजहांपुर जिले के मुख्य कोतवाली क्षेत्र में हैं. सुबह से जारी तेज बारिश के बावजूद यहां 'दुर्गा ट्रासंपोर्ट' नामक एक तीन मंजिला इमारत के बाहर गहमा-गहमी का माहौल है. इमारत के परिसर में एक सब-इंस्पेक्टर और अन्य पुलिसवालों समेत लखनऊ, दिल्ली से आए और स्थानीय मीडियाकर्मी खड़े हैं. सभी 'दुर्गा ट्रांसपोर्ट' के मालिक और विवादास्पद धर्मगुरु आसाराम बापू के खिलाफ अपनी बेटी के शारीरिक उत्पीड़न का मामला दर्ज कराने वाले धर्म सिंह से मिलना चाहते हैं. लोहे के विशाल दरवाजे के बाहर ही 'आसाराम बापू ट्रस्ट' लिखा हुआ एक लोहे का बोर्ड उखड़ा पड़ा है.

इसी बीच खबर आती है कि धर्म सिंह और उनका परिवार किसी मीडिया -कर्मी से नहीं मिलना चाहता. बीते दस दिन के दौरान इस परिवार को मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ रहा है. 15 अगस्त की रात जब भारत अपने 67 वें स्वतंत्रता दिवस के जश्न में डूबा हुआ था, तभी कथित तौर पर धर्म सिंह की 16 वर्षीया बेटी रौशनी के साथ उनके गुरु और 'आराध्य' आसाराम बापू ने जोधपुर में बलात्कार किया. 20 अगस्त को दिल्ली में शिकायत दर्ज करवाने और रौशनी की मेडिकल जांच करवाने के बाद सिंह दम्पत्ति कानूनी जांच-पड़ताल के लिए जोधपुर गया था. वहां बेटी से पूछताछ पूरी होने के बाद वे मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से होते हुए बीती रात को ही शाहजहांपुर पहुंचे हैं. वहां से बड़ी मुश्किल से वे अपने बेटे को वापस लेकर आ पाए हैं. उनका बेटा भी आसाराम के ट्रस्ट द्वारा संचालित उसी आवासीय विद्यालय - छिंदवाड़ा गुरुकुल - में पढ़ता था, जिसमें उनकी बेटी पढ़ती थी.

सिंह के पड़ोसी और पुराने मित्र किशन अग्रवाल बताते हैं कि उनके लौटते ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ पत्रकारों ने पहले तो उनसे कुछ अशोभनीय सवाल किए, फिर उनसे बिना पूछे उनके कान और गले में एक लीड और एक माइक फंसा दिया इससे पहले कि सिंह कुछ समझ पाते, उनका चेहरा टीवी पर था. अग्रवाल जोड़ते हैं, 'एक तो पहले ही परिवार बहुत सदमे में है, उस पर कल रात के इस हादसे से सिंह इतने परेशान हैं कि किसी मीडियाकर्मी से बात ही नहीं करना चाहते.' लेकिन एक लिखित अर्जी भेजने के लगभग चार घंटे बाद परिसर के पीछे वाले हिस्से में रहने वाला सिंह परिवार सिर्फ इस तहलका संवाददाता से मिलने के लिए राज़ी हो जाता है.
मकान के पहले माले पर रहने वाले सिंह परिवार से मिलने के लिए हमें इमारत के पीछे वाले रास्ते से ऊपर ले जाया जाता है. घर के भीतर बैठक में दाखिल होते ही हमारी मुलाक़ात धर्म सिंह और उनके परिवार से होती है. मटमैले रंग का कुर्ता- पाजामा पहने लगभग 50 वर्षीय धर्म सिंह सोफे पर बैठे हुए फोन पर बात कर रहे हैं और लगातार रो भी रहे हैं.

‘जब तक वह बाहर है, हम पर दबाव पड़ता ही रहेगा. हमें पैसे के साथ-साथ जान का खतरा बताकर डराने-धमकाने की हर संभव कोशिश की जा रही है’

अपनी भरभराती आवाज में फोन पर लगभग गिड़गिड़ाते हुए वे कह रहे हैं, 'नहीं जी, अब चाहे जो हो जाए, मैं मामला वापस नहीं लूंगा. यहां हालत बहुत खराब है. मेरी पत्नी और लड़की दोनों की तबीयत बहुत खराब है... जब तक वो जेल नहीं जाएगा, खुला घूमेगा तब तक तो हमें धमकाता ही रहेगा. हम पर बहुत दबाव पड़ रहा है... पुलिस ने अभी तक उसे गिरफ्तार भी नहीं किया है... उसने जो हमारी लड़की के साथ किया उसके बाद आप ही बताओ मैं शिकायत वापस कैसे ले सकता हूं?'

जब तक धर्म सिंह फोन पर बात करते हैं, उनके रिश्तेदार हमें बताते हैं कि सुबह से ही परिचितों और शुभचिंतकों के साथ-साथ उन्हें समझाने के लिए मंत्रियों और बिचौलियों के भी कई फोन आ चुके हैं. वे हमें यह भी बताते हैं कि आश्रम के लोग सिंह परिवार को उनके छोटे बेटे के जरिए भी तोड़ना चाहते थे. वे उनके बेटे को आश्रम से बाहर ही नहीं आने दे रहे थे. 26 अगस्त को काफी जद्दोजहद के बाद उसको ट्रांसफर सर्टिफिकेट देकर उनके हवाले किया गया.

फोन पर अपनी बात खत्म करके धर्म सिंह रुमाल से आंसू पोंछते हैं और हमसे बात करने को तैयार हो जाते हैं. बातचीत के बीच में रौशनी से मिलने के आग्रह पर वे उसकी खराब तबियत के बारे में बताकर हमें उससे न मिलने का अनुरोध करते हैं. उनसे हमारी बातचीत में वे हमें जो बताते हैं वह तो है ही लेकिन यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की चोट के साथ-साथ उन्हें और उनके परिवार को अपनी धार्मिक आस्था के टूटने का भी गहरा धक्का पहुंचा है.

वे हमें जो बताते हैं वह उन्हीं के शब्दों में बिंदुवार इस प्रकार है.

आसाराम बापू से अपने संबंध के बारे में
'शुरू में हमारे पास कुछ नहीं था. फिर मैंने यहां शाहजहांपुर में अपने छोटे-से ट्रांसपोर्ट के काम की शुरुआत की. धीरे-धीरे काम चल निकला. लगभग 10 साल पहले मुझे आसाराम के बारे में पता चला था. उसमें कुछ ऐसा है कि वो लोगों को मोह लेता है... सम्मोहित कर लेता है. हमारे साथ भी यही हुआ. मैं और मेरा पूरा परिवार हम सब उसके भक्त हो गए. हमने उससे दीक्षा भी ली. शाहजहांपुर में हमारा परिवार उसके शुरुआती भक्तों में से था... हमीं ने यहां उसके सेवकों की संख्या बढ़वाई. हमारी और हमारे परिवार की उसमें इतनी गहरी आस्था थी कि हमने यहां से लगभग आठ-दस किलोमीटर दूर, तिलहड़ तहसील में सात बीघा ज़मीन खरीदी और खड़े होकर इसके लिए एक आश्रम बनवाया. वो जमीन, आश्रम सब कुछ हमने इसके बेटे नारायण साईं और इसके ट्रस्ट के नाम कर दी. मैंने बिना किसी स्वार्थ के, सिर्फ श्रद्धा की वजह से इस आदमी पर लाखों रुपया खर्च कर दिया और आज ये हमें ही पैसे दिखा रहा है? कहता है पैसे लेकर अपना मामला वापस ले लो! जैसे ये सबको खरीदता आया है, वैसे मुझे भी खरीदना चाहता है!'

बेटी के साथ क्या हुआ?
'वो(रौशनी) पिछले पांच सालों से आसाराम के छिंदवाड़ा वाले आश्रम में पढ़ रही थी... छिंदवाड़ा गुरुकुल में. मेरा छोटा बेटा भी वहीं पढ़ता था. कभी कोई दिक्कत नहीं हुई... रौशनी की सेहत के बारे में कही जा रही सारी बातें भी झूठी हैं. वो हमेशा बिल्कुल ठीक रही है. लेकिन इन लोगों ने जबरदस्ती उसका इलाज शुरू कर दिया. मेरी लड़की ने मुझे बताया कि उसे कोई तकलीफ नहीं थी लेकिन अचानक गुरुकुल की सेविकाओं ने आकर कहा कि उसे भूत चढ़ गया है. सेविकाओं ने कहा कि भूत-प्रेत उतारने के लिए मेरी लड़की को रात भर पूजा करनी होगी. फिर ये लोग उसे ले गए और रात को पांच-छह सेविकाएं उसे एक हॉल में घेर कर बैठ गईं और महामृत्युंजय का जाप करवाने लगीं. लड़की ने बताया कि रात भर की पूजा की वजह से उसका सर दुखने लगा था. अगले दिन हमें आश्रम से फोन आया कि हमारी लड़की की तबीयत खराब है. सेविकाओं ने कहा उसे अब सिर्फ आसाराम बापू ही ठीक कर सकते हैं. हमें बताया कि आसाराम ने हमें 15 अगस्त को मिलने का समय दिया है... हमें उससे मिलने जोधपुर वाले आश्रम जाना होगा. फोन आते ही मैं और मेरी पत्नी छिंदवाड़ापहुंचे और वहां से रौशनी को लेकर जोधपुर के लिए निकल गए.'
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'हमें 15 अगस्त की रात का समय दिया गया था. जोधपुर के मनाई आश्रम में पीछे कुछ अलग कॉटेज बने हुए हैं. रात को आसाराम ने हमें वहीं मिलने को बुलाया. जाने के बाद उसने हमसे कहा कि हम उसकी आंखों में देखकर ध्यान करें. अब लोग जिसके दर्शन को तरसते हैं वो हमसे अपनी आंखों में देखने के लिए कह रहा है, यह सोच कर ही हम लोग खुश हो गए. लेकिन अब मुझे समझ में आता है कि वह सब सिर्फ एक ट्रैप था, एक जाल था, हमें सम्मोहित करने के लिए. उसके बाद उसने कहा कि हम अपनी बेटी को वहीं छोड़कर चले जाएं. उसने कहा कि उसे रौशनी पर कोई मंत्र फूंकना है और वो आज रात उसका इलाज करके उसे हमेशा के लिए स्वस्थ कर देगा. हम लोगों ने कहा कि रात बहुत हो चुकी है अब हम कहां जाएंगे. और वैसे भी हम अपनी लड़की को छोड़कर नहीं जाएंगे. इस पर बाबा ने कहा कि जब तक वह हमारी बेटी का इलाज करता है तब तक हम लोग बगल की कुटिया में विश्राम कर लें. हम लोग उसे भगवान मानते थे, उसकी पूजा करते थे इसलिए उस पर बहुत विश्वास था. हम रौशनी को छोड़कर बगल वाली कुटिया में आ गए और उसी के भजन पढ़ने लगे. एक-डेढ़ घंटे बाद जब रौशनी वापस आई तो बहुत रो रही थी. मैंने पूछा तो बोली बस चलो यहां से. मुझे शक-सा हुआ.

घर आने के बाद मैंने पत्नी से कहा कि बेटी से पूछे कि क्या हुआ है. बहुत पूछने पर उसने हमें बताया कि उस रात हमारे जाने के बाद उसे जिस कमरे में रखा गया था, वहां से एक दूसरे कमरे में ले जाया गया. असल में उस कमरे में पीछे की ओर एक और दरवाजा था. वहीं से आसाराम उसे एक दूसरे कमरे में ले गया और उससे कहा कि आज वह उसका इलाज कर देगा. साथ ही उसने उससे कहा कि वह एक बहुत बढ़िया वक्ता बनेगी. फिर मेरी लड़की से कपड़े उतारने के लिए कहा और उसके साथ बलात्कार किया. उसे धमकी भी दी कि वह किसी को नहीं बताए वर्ना उसके परिवार के साथ बहुत बुरा होगा. आज मैं सोचता हूं तो लगता है कि रौशनी ने मुझे वहां क्यों नहीं बताया. अगर बता देती, तो उस समय वहां ज्यादा सिक्योरिटी भी नहीं थी. वहां बाहर कई पत्थर पड़े थे. मैं एक पत्थर उठाकर वहीं आसाराम को मार देता, फिर चाहे जो होता. हमने उसे भगवान माना और वो हमारी बच्ची, हमारी ही इज्जत को खा गया. हम उसे कभी माफ नहीं करेंगे.'

दिल्ली में और देरी से अपराध दर्ज करवाने पर

(15 अगस्त की रात जोधपुर में हुए इस अपराध की रिपोर्ट 20 अगस्त की शाम को दिल्ली के कमला नगर थाने में दर्ज करवाई गई )

'सब यही पूछते हैं कि हमने इतने दिन बाद दिल्ली में रिपोर्ट क्यों लिखवाई. असल में 15 की रात को हमारी बेटी ने हमें कुछ बताया ही नहीं और सिर्फ रोती रही. बाद में मेरे और मेरी पत्नी के बार-बार पूछने पर दो दिन बाद उसने हमें पूरी बात बताई. सच जानकर हम सब सदमे में आ गए और हमने तुरंत उससे (आसाराम से) मिलने का तय किया. मालूम करने पर पता चला कि 18 और 19 अगस्त को आसाराम का दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रवचन है. हम लोग उससे मिलने सीधे दिल्ली पहुंचे लेकिन रामलीला मैदान में हमें रोक दिया गया. बाबा ने हमसे मिलने से इनकार कर दिया. ये 19 अगस्त की बात है. हम लोगों ने तभी पुलिस में जाने का फैसला कर लिया. सबसे पास का थाना (कमला नगर) हमें जो बताया गया हमने वहां जाकर रिपोर्ट दर्ज करा दी.'

अपने ऊपर पड़ रहे दबाव पर
'शिकायत दर्ज करवाए एक हफ्ते से भी ज्यादा समय हो गया लेकिन आसाराम आज तक खुला घूम रहा है. और जब तक वह बाहर है, हम पर दबाव पड़ता ही रहेगा. हमें पैसे के साथ-साथ जान का खतरा बताकर डराने-धमकाने की हर संभव कोशिश की जा रही है. हर तरफ से दबाव डाला जा रहा है कि हम किसी तरह केस वापस ले लें. लेकिन आप ही बताइए, अपनी इज्जत किसको प्यारी नहीं होती? अगर आपकी बेटी का बलात्कार करके उसे छोड़ दिया जाए, तो क्या आप पैसे ले लेंगे? मैं नहीं ले सकता पैसे. मुझे सिर्फ अपनी बेटी के लिए इसांफ चाहिए, और कुछ नहीं. मेरी पत्नी और बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल है. मां-बेटी दोनों सदमे में हैं. हम लोग तो लड़ने के लिए तैयार हैं लेकिन पुलिस से लेकर प्रशासन तक हर कोई दबाव में है. अगर उसकी जगह कोई आम आदमी दोषी होता तो क्या वह भी इसी तरह खुला घूम रहा होता? अब जो वो बोल रहा है कि रौशनी उसकी पोती के जैसी है वो सिर्फ मुझे तोड़ने के लिए कह रहा है, वो मुझे फिर से सम्मोहित करने की कोशिश कर रहा है. (फूट-फूट कर रोते हुए) उसने मेरी श्रद्धा तोड़ दी, मेरा विश्वास तोड़ दिया...'

आसाराम के आपराधिक कृत्यों के बारे में
'अगर सीबीआई जांच हो तो इसकी पूरी पोल-पट्टी खुल जाएगी. हर साल छिंदवाड़ा आश्रम से कई लड़कियां गायब होती हैं. वो कहां जाती हैं? उन्हें बाबा के पास अलग-अलग जगहों पर भेजा जाता है. हर समारोह और कथा में ये आदमी छोटी-छोटी लड़कियों से घिरा रहता है. अभी हरिद्वार से 25 लड़कियां आश्रम आईं थीं जिनमें से तीन को छांटा गया. मेरी लड़की को भी शायद ऐसे ही छांटा गया होगा. अब मुझे समझ में आता है कि बाबा के आस-पास हमेशा छोटी लड़कियां क्यों रहती थीं और उनमें से सबसे ठीक-ठाक लड़कियों को उसके अलग-अलग आश्रमों में भेजा जाता है. मुझे तो अब ऐसे और भी मामले पता चले हैं जिसमें इसने और भी कई लड़कियों के साथ गलत किया है. लेकिन वो परिवार अपनी इज्जत के डर से सामने नहीं आए. कुछ लोग इससे डरते हैं और कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें इसके ऐसे कर्मों से कोई दिक्कत नहीं है. लोग इसकी भक्ति में इतने अंधे हैं कि अपनी पत्नियों और बेटियों के साथ हुए गलत काम उन्हें 'बाबा का प्रसाद' लगते हैं. अब मैं और किसी के बारे में क्या कहूं? अगर मैं और मेरी पत्नी वहां खुद मौजूद नहीं होते और हमने अपनी बेटी को उस हालत में बिलखते हुए नहीं देखा होता तो शायद हमें भी विश्वास नहीं होता. अपनी बेटी पर भी विश्वास नहीं हो. इसने हमें ऐसा सम्मोहित किया था कि हम सिर्फ इसी को सच और सही मानते थे. इसलिए अब हम चाहते हैं कि इस बाबा का तिलिस्म टूटे ताकि देश के बाकी बच्चे सुरक्षित रह सकें.'

इस स्टोरी में शामिल सभी लोगों के नाम बदले हुए हैं और ऐसी किसी भी चीज (जैसे घर की फोटो आदि) को इस्तेमाल नहीं किया गया है जिससे पीड़िता की पहचान उजागर होने की जरा सी भी गुंजाइश हो
(जय प्रकाश त्रिपाठी के सहयोग के साथ

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