Thursday, August 22, 2013


तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुई
वोह ज़िंदगी तो मुहब्बत की ज़िंदगी न हुई!

कोई बढ़े  बढ़े हम तो जान देते हैं
फिर ऐसी चश्म--तवज्जोह कभी हुई  हुई!

तमाम हर्फ़-ओ-हिकायत तमाम दीदा-ओ-दिल
इस एह्तेमाम पे भी शरह-ए-आशिकी न हुई

सबा यह उन से हमारा पयाम कह देना
गए हो जब से यहां सुबह--शाम ही  हुई

इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी
की हमने आह तो की, उनसे आह भी  हुई

ख़्याल-ए-यार सलामत तुझे खुदा रखे
तेरे बगैर कभी घर में रोशनी न हुई

गए थे हम भी जिगर जलवा-गाह-ए-जानां में
वोह पूछते ही रहे हमसे बात ही न हुई

जिगर मुरादाबादी

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