Thursday, January 30, 2014

waah-waah
मैं झूम के गाता हूँ कमज़र्फ ज़माने में,
एक आग लगा ली है एक आग बुझाने में !

ये सोच के दरियां में मैं कूद गया यारों,
मुझको वो बचा लेगा माहिर है बचाने में !

आये हो जो आँखों में कुछ देर ठहर जाओ,
एक उम्र गुजरती है एक ख्वाब सजाने में !

जो खूब सहेजा था वो पास नहीं लेकिन,
जो खूब लुटाया था अब भी है खजाने में !

उठने दे जो उठता है इस दिल से धुँआ कोई,
क्या होगा तुझे हासिल कोहराम मचाने में !

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