saabhaar Ashok Bhaumik :- Mohalla Live
एम.एफ. हुसैन : लगभग शताब्दी भर के कैनवास में पसरा जीवन
Wednesday, February 06, 2013 2:23:24 PM
रोहित
हुसैन की जिन वजहों से आलोचना होनी चाहिए, वह ‘इतर विवादों’ और व्यक्ति पूजक सामंती मूल्यों के आधार पर उन्हें तकरीबन द्वंद्व से परे विलक्षण प्रतिभा मान लेने के कारण छूटी रही है जबकि वहीं उनकी भत्र्सना जिन सांप्रदायिक, रूढि़वादी वजहों से हुई, वे हुसैन के कला कर्म की काबिल-ए-तारीफ जगहें थी। त करीबन एक शताब्दी का सक्रिय जीवन जीने के बाद मकबूल फिदा हुसैन अब नहीं रहे। हुसैन का पूरा जीवन एक फंतासी की तरह रहा है। 95 वर्षों के लम्बे जीवन की शुरुवात में तंगहाली, तरूणाई में ऊर्जा, जवानी में संघर्ष, अधेड़ उम्र में बेहद सफलता, आखिरी वर्षों में उनकी कलाकृतियों पर हुए विवादों के बाद देश से अघोषित निष्कासन, फिर नागरिकता का त्याग और अंत में देश के बाहर ही मौत, इस सब में एक रोचक ट्रैजिक कहानी है। हुसैन की ट्रैजिक कहानी के अंत से शुरुवात करते हैं। प्रगतिशीलता और साम्प्रदायिक सद्भाव के जिन मूल्यों पर वह ताउम्र सृजन करते रहे, जीवन के आखिरी चरण में न सिर्फ दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों की ओर से हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप उन पर लगे बल्कि प्रगतिशील हलकों से भी छिटपुट ही सही पर इस मसले पर उनकी आलोचना ही सुनाई दी। हुसैन पर एक के बाद एक हजार से ज्यादा केस देश भर में अलग-अलग थानों में दर्ज किए गए। हिन्दू कट्टरपंथियों द्वारा उन्हें जान से मारने के फतवे जारी हुए। इस सबसे उकता कर हुसैन देश छोड़कर चले गए। हालांकि कई कलाकार संगठन और प्रगतिशील सामाजिक/राजनीतिक कार्यकर्ता उनके समर्थन में भी आए। लेकिन 2006 से छिड़े इस विवाद और अपने निर्वासन के बाद, कतर के अरबपति कलाप्रेमी शेख (जो कि अनपेक्षित कीमतों में कलाकृतियां और कई बार तो गैलरियों को ही खरीद लेने के लिए प्रसिद्ध है) के आमंत्रण पर उन्होंने अपने जीवन के आखिरी साल में कतर की नागरिकता स्वीकार ली। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर उसके एक कलाकार का खामोश तमाचा था। जिसकी गूंज, अब देश के बाहर ही हुई उसकी मृत्यु ने स्थाई कर दी है। हुसैन का न रहना बेशक भारतीय कला जगत् की एक अपूर्णीय क्षति है। विगत् 7-8 दशकों में हुसैन का रचनाकर्म भारतीय चित्रकला को समृद्ध करता गया है। हुसैन इसे एक नए दौर से परिचित कराते हैं। बंगाल स्कूल की परम्परा से आगे बढ़ने में भारतीय चित्रकला के लिए हुसैन एक महत्वपूर्ण चितेरे थे। यहां के जन-मानस में रची-बसी रामायण और महाभारत की महाकाव्य परम्पराओं पर अपनी कूची फिराने का महत्वपूर्ण काम कर हुसैन ने भारतीय चित्रकला को समृद्ध किया। हुसैन की समकालीन सामाजिक, राजनैतिक, और सांस्कृतिक परिस्थितियों पर भी निरंतर नजर थी। फैज, राममनोहर लोहिया, यामिनी रॉय, मदर टेरेसा, और सत्यजीत राॅय आदि पर उनकी कलाकृतियां महत्वपूर्ण रही हैं। 1948 में प्रगतिशील कलाकार संघ की स्थापना में हुसैन, सूजा और अन्य चित्रकारों के साथ मुख्य भूमिका में थे। 60 के दशक में राममनोहर लोहिया के संपर्क में आने से हुसैन को सृजन की एक नई दृष्टि मिली। लोहिया ने अपने राजनीतिक एक्टिविज़्म के दौरान देशभर में रामलीलाओं के मंचन को भी अपना जरिया बनाया था। हुसैन भी इसी से रामायण और महाभारत पर बनाई अपनी चित्रश्रंखला के लिए प्रेरित हुए। इंद्रागांधी को दुर्गा की तरह चित्रित करने सरीखे कई अन्य उदाहरण भी हंै जिसमें हुसैन की कला में विचलन भी दिखाई देता है। हुसैन की जिन वजहों से आलोचना होनी चाहिए, वह ‘इतर विवादों’ और व्यक्ति पूजक सामंती मूल्यों के आधार पर उन्हें तकरीबन द्वंद्व से परे विलक्षण प्रतिभा मान लेने के कारण छूटी रही है जबकि वहीं उनकी भत्र्सना जिन सांप्रदायिक, रूढि़वादी वजहों से हुई, वे हुसैन के कला कर्म की काबिल-ए-तारीफ जगहें थी। हुसैन की आलोचना के लिए सबसे मुकम्मल बात है कि इस महत्वपूर्ण कलाकार की चित्रकला को तकरीबन पिछले आधे दशक में लोगों ने उसके रंगों, आकारों की महत्ता से इतर केवल लगातार पुतते कैनवासों की उत्तरोत्तर बेतहाशा कीमतों के जरिए जाना है। भारत में हुसैन ही वह पहले चित्रकार रहे हैं जिन्होंने अपनी एक पेंटिंग के लिए एक लाख रूपये की मांग की थी। इसके बाद 1986 में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की 150वीं वर्षगांठ में पहली बार उनकी सफदर पर बनी एक कृति दस लाख की कीमत को छू सकी। इसके बाद हुसैन पेंटिंग बिक सकने की कीमतों के करिश्माई आकड़ों को छूते हुए लगातार सबसे महंगे कलाकार बने रहे और इसी क्रम में हुसैन ने 1 करोड़ का आकड़ा भी छू लिया। ऐसे में मूलतः भारतीय जनमानस में हुसैन एक महत्वपूर्ण चित्रकार होने के बजाय एक करिश्माई कला व्यवसायी अधिक रहे हैं। जिन्हें महान चित्रकार कहा/समझा जाता रहा है। यह बात कहने का आशय यह कतई नहीं है कि हुसैन महत्वपूर्ण चित्रकार नहीं हैं। कोई भी कलाकार अपने परिवेश से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होता। उसका पूरा निर्माण समाज के भीतर के द्वंद्वों और परिस्थितियों से ही होता है। यहीं वह अपने रचनाकर्म की पृष्टभूमि बनाता है और उसके सृजन में भी यही सब परावर्तित होता है। पिछली डेढ़-दो सदी में कलाऐं सीधे ही राजनीतिक आंदोलनों से प्रेरित रही हैं। यहीं कलाओं के जनसरोकारों की बहस भी जन्मीं हैं और कलाकारांे से सामाजिक उत्तरदायित्व की अपेक्षा भी। हुसैन भी इस अपेक्षा से परे नहीं हैं। हुसैन अपने जीवन के शुरुवाती दौर में ही अभावग्रस्तता के चलते इस अपेक्षा से परिचित हो गए थे। प्रगतिशील आर्टिस्ट ग्रुप की स्थापना और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों से उनका जुड़ाव इसी से संभव हो पाया। लेकिन हुसैन के जीवन मे इसके बाद एक अद्भुत् मोड़ है जो जनपक्षधरता के प्रतिभाशाली लोगों को बाजार द्वारा कब्जा कर सिलिब्रिटी बना देने का सबसे बड़ा उदाहरण है। हुसैन की एक और बड़ी आलोचना यह है कि वह उस दौर में देश के महान और सबसे महंगे चित्रकार रहे हैं जिस दौर में देश के कई चित्रकारों के ब्रश, रंगों और कैनवास के अभाव में सूखे और बांझ पड़े हुए हैं। हुसैन और इस तरह के कलाकारों के जीवन और सृजनकर्म के कंट्रास्ट को प्रतिभा नहीं जब्कि बाजार तय कर रहा है। इस बाजार को कुछ सैलिब्रिटीज चाहिए और बाकी बचे लोगों के, आश्चर्य से उसे ताकते और उसके सपनों में जीते चेहरे। बाजार की ताकतें कई बार कलाकारों को इस कदर प्रभावित करती हैं कि वह प्रतिरोध की धाराओं से परिचित होने के बावजूद भी अक्सर मुख्यधाराओं में बहे चले जाते हैं। हुसैन का मसला भी यही है।
चित्रों में, सिंधु घाटी से हुसैन तक, अश्लिीलता नहीं है नग्नता के मायने।
Wednesday, February 06, 2013 2:09:00 PM
रोहित
-अशोक भौमिक (प्रतिनिधि चित्रकार एम0 एफ0 हुसैन के हिन्दू धर्म के देवी देवताओं पर चित्रांकन ने लम्बे समय से एक विवाद को जन्म दिया है। इसी विवाद के चलते हुसैन पर एक हजार से ज्यादा मामले हिन्दू धर्म की आस्थाओं को ठेस पहुचाने के नाम पर दर्ज किए गऐ। तमाम जानलेवा धमकियों के चलते हुसैन अब तक भारत से बाहर रह रहे हैं। पिछले दिनों हुसैन द्वारा कतर की नागरिकता ले लेने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कला की मर्यादाओं और भारतीय लोकतंत्र की असलियत सरीखी तमाम बातों पर बहस छिड़ पड़ी हैं। क्यूंकि भारतीय चित्रकला का साधारण सा विद्यार्थी भी ‘कला में नग्नता’ और ‘अश्लीलता’ के अन्तर को समझ सकता है। इस लिए इस बात के लिए हुसैन के पक्ष में बड़ी दलीलों की जरूरत नहीं है। लेकिन फिर भी कई कला के नासमझ और राजनीति के विद्वान मस्तिस्कों को इस बात को समझाने के लिए वरिष्ठ चित्रकार और कथाकार ‘अशोक भौमिक’ का बया में प्रकाषित यह आलेख, मैं http://mohallalive.com से लेकर साभार प्रकाशित कर रहा हूं। आशा है कि चित्रकला में रूचि रखने वाले अन्य लोगों को भी यह आलेख महत्वपूर्ण लगेगा...... -मॉडरेटर) -अशोक भौमिक चित्र 1, सातवाहन, आंध्र चित्र 2, नर्तकी, सिंधु घाटी (2005 ईपू) चित्र 3, आरंभिक लोक मूर्तिकला के नमूने चित्र 4, लौरिया नंदनगढ़ की देवी मूर्ति (1300 ईपू) चित्र 5, मौर्यकालीन यक्षी, दीदारगंज (300 ईपू) चित्र 6, गांधार कला का नमूना (200-100 ईपू) चित्र 7, यक्षी चित्र 8, शुंगकालीन शालभंजिका (184 से 72 ईपू) चित्र 9, गौतम बुद्ध का जन्म चित्र 10, अंदमान की आदिवासी नारी (21वीं सदी) चित्र 11, बस्तर की आदिवासी नारी (21वीं सदी) चित्र 12, एमएफ हुसैन, पार्वती चित्र 13, एमएफ हुसैन, हनुमान और रावण चित्र 14, एमएफ हुसैन, द्रौपदी चित्र 15, एमएफ हुसैन सरस्वती चित्र 18, नायिका गांधार, 200 ईप चित्र 16, एमएफ हुसैन, लक्ष्मी चित्र 20, कुबेर, लक्ष्मी, हराती। मथुरा-कुषाण 100 ई चित्र 17, एमएफ हुसैन, दुर्गा चित्र 19, नारी मूर्ति। मथुरा-कुषाण 100 ई चित्र 21, भारतमाता कैलेंडर चित्र चित्र 22, एमएफ हुसैन, भारतमाता आ ज हम ऐसे समय में जी रहे हैं कि जहां कई बार वर्तमान को सिद्ध करने के लिए हमें अतीत के संदर्भों को परखने की आवश्यकता होती है। हम जानते हैं कि भारतीय कला के एक बड़े हिस्से का विकास मिथकों, धार्मिक प्रतीकों के आधारंपर निश्चय ही हुआ पर इससे भी महत्वपूर्ण सत्य यह है कि ऐसी महान उत्कृष्ट कला का विकास जिन कलाकारों द्वारा हुआ, उनमें परिवेश, समाज, सौन्दर्य बोध, स्वीकार और निषेध के बीच का संघर्ष आदि का सुस्पष्ट प्रभाव था। और इसीलिए हमें आश्चर्य नहीं होता, जब हम पाते हैं कि सदियों से कलाकार अपनी सृजनशीलता, स्वाधीनता और स्वायत्तता को आधार मानकर कला की ऐसी चुनौतियों को स्वीकार करने में समर्थ रहा है, जहां वह देवी-देवताओं के रूप की परिकल्पना कर, उसे उनकी अवधारणा और मिथकों से जोड़ते हुए और उनकी मूर्ति तक गढ़ने में सफल होता है। कल्पना कीजिए कि ब्रह्मांड के रचयिता की मूर्ति तक की रचना, भारतीय कला में एक कलाकार अनायास ही, बिना किसी जटिलता के कर डालता है। प्रख्यात कला समीक्षक आर्नल्ड हाउजर ने कहा है कि “कला-निर्माण के पहले कलाकार का निर्माण होता है।” और कि एक कलाकार अपने हर कलाकर्म के साथ प्रवीण होता रहता है। कला के विकास क्रम में कला और कलाकार के बीच की यह द्वंद्वात्मकता, निरंतरंप्रवहमान रही है। चूंकि एक कलाकार की रचना में उसके अतीत, वर्तमान के साथ-साथ उसके वैचारिक संघर्ष का और उसके सामाजिक, सांस्कृतिक अवधारणाओं का प्रभाव अवश्य रहता है। लिहाजा यहां यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि कला एक कलाकार की कृति होते हुए भी उसके समाज के विभिन्न लक्षणों औरंप्रवृत्तियों के स्वीकारों और बहिष्कारों का दस्तावेज भी होता है। किसी राजा के सिंहासन पर बैठने या उसके साम्राज्य के पतन से कलाधारा बदल नहीं जाया करती है। बल्कि इसकी निरंतरता, इसकी स्वयत्तता को रेखांकित करती है। जो लोग कला से कला की निरपेक्षता की मांग करते हुए एक अराजनैतिक कला की पक्षधरता की बात करते हैं वे दरअसल सामाजिक परिस्थितियों के परिपेक्ष में ही निर्वाक या तटस्थता की पैरवी करते हैं। और सतही तौरंपर निरीह और कलावादी लगने वाली यह स्थिति कभी भी अराजनैतिक नहीं होती। मैंने यहां इसका उल्लेख इसलिए किया कि प्राय: चित्रकार को हम उसे समाज से विच्छिन्न एक विशिष्ट प्राणी का दर्जा दे देते हैं जो वास्तव में एक असंभव सी परिकल्पना है। हजारों वर्षों की भारतीय कला परंपरा में चित्रकला अपने समाज या अन्य कलाओं से कटकर विकसित नहीं हुई। अन्य सभी कलाओं की तरह यह भी समाज और समय के साक्षी बनकर अतीत की कथाओं, अवधारणाओं और मिथकों का प्रतिनिधित्व करती रही है। इसलिए चित्रकला परंपरा में मिथकों को चिन्हित करना दरअसल हमारे साहित्य एवं अन्य कलाओं पर मिथकों के प्रभाव को तलाशना है। धर्म से लेकर इतिहास की रचना प्रक्रिया में कला का एक स्वतंत्र महत्व है। पृथ्वी का कोई धर्म शुद्ध इतिहास नहीं है या घटनाओं का प्रामाणिक गजट भी नहीं है। ये सभी रचित हैं। कलाकारों की रचनाएं हैं। हालांकि धर्मांध और कठमुल्लों के लिए यह सच आसानी से पचाना संभव नहीं है। वे यही कहेंगे कि ऐसी रचनाओं का आधार सत्य होता है, या फिर ये सब कोरी कल्पनाएं नहीं हैं। अपनी गजब कल्पनाशील दलीलों से वे धार्मिक कथाओं को इतिहासम्मान लेते हैं, पर बावजूद इसके सभी धार्मिक ग्रंथ निर्विवाद रूप से साहित्य कला के उदाहरण हैं। जैसे धर्म पर आधारित कलाएं – भित्तिचित्र और मूर्तियां, चित्र तथा मूर्तिकला के उदाहरण हैं। ठीक वैसे ही मंदिर, मस्जिद, गिर्जा, स्तूप आदि वास्तुकला के निदर्शन हैं। यहां अगर ये स्वीकारा जाए कि समाज निर्माण में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तो इसके साथ यह भी मानना पड़ेगा कि धर्म और समाज निर्माण में कला की एक रचनात्मक भूमिका रही है। चूंकि ऐसी स्थिति में जहां कलाकार का अस्तित्व इतना स्पष्ट हो वहां रचनाशीलता, प्रयोगधर्मिता और गतिमयता की उपस्थिति निश्चय ही होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय कला में निहित है। इन कलाकारों की महत्वपूर्ण उपस्थिति ने ही भारतीय कला में संशय (Confusion) और अज्ञानता (Ignorance) में से संशय को आधार मानकर अपनी अवधारणाओं को निर्विवाद समझकर, उसे प्रश्नों के दायरे के बाहर नहीं रखा। और इसलिए भारतीय कला विकास के कालक्रम में मिथकों में व्यापक परिवर्तन होते हुए देख पाते हैं। हम देवी-देवताओं और नायकों के चित्रण में एक अद्भुत वैविध्य से परिचित होते हैं। यहां उल्लेख करना उचित होगा, जहां एक ओर भारतीय कला निरंतर बाहरी प्रभावों को ग्रहण कर अपनी कला को समृद्ध करती है वहीं अपने समाज के प्रति एक जिम्मेदार भूमिका भी निभायी है। इस जिम्मेदारी को हालांकि कई बार धर्मप्रचार, राजाओं के गुणगान और मिथकों के निर्माण के रूप में देख सकते हैं, पर इसके अलावा भी एक महत्वपूर्ण दर्शन या विचारधारा के लोकहित चेष्टाओं को सफल बनाने में साहित्य से अधिक कारगर होते हुए पाते हैं। पर साहित्य को आधार मानकर मनोरंजन के उद्देश्य लिए विकसित, भारतीय कला की भी एक लंबी परंपरा रही है। इस प्रकार भारतीय कला परंपरा एक उदार, संकीर्णता रहित निर्भीक कलाकर्म की निरंतर विकास के इतिहास की परंपरा रही है। भारतीय कला में धर्म मिथक के बारे में विस्तार से व्याख्या लगभग असंभव-सा जान पड़ता है क्योंकि इसकी व्याप्ति सात-आठ हजार वर्षों और एक विशाल इलाके में फैली सभ्यता की देन है। पर इस विशाल कला परंपरा के कुछ पहलुओं को छूने की कोशिश अवश्य ही की जा सकती है। भारतीय कला को लेकर जो सबसे बड़ी आपत्ति विदेशियों की रही है – वो एक लंबे समय से नग्नता की विभिन्न अवधारणाओं के इर्द-गिर्द ही बनी रही है। इधर के दिनों में एक प्रचलन विदेशों में दिखाई दे रहा है, जहां भारतीय देवी-देवताओं को यानी कि भारतीय कलाकारों की रचनाओं का अद्भुत ढंग से विश्लेषण किया जा रहा है। जैसे गणेश जी को लें। यह भारतीय कला की रचनाशीलता की एक नायाब मिसाल है। स्थूलकाय मानव शरीर और सिर हाथी का! गणेश की एक फ्रॉयडियन व्याख्या अभी सामने आयी है कि गणेश का सूंढ़ उनके लिंग शैथिल्य का प्रतिनिधित्व करता है और मोदक नामक मिष्टान्न के प्रति उनकी अतिशय रुचि उनकी इडिपस ग्रंथि और अन्य अस्वाभाविक यौनप्रवृत्तियों के लक्षण हैं। इन सब व्याख्याओं के बारे में बातचीत हमें गैरजरूरी लगता है, क्योंकि अपने विचारों के वर्चस्व की कोशिश में (छद्म) बुद्धिजीवियों के ऐसे उदगारों को पिछले कई दशकों से हमने नये-नये रूपों में देखा है। इन दिनों अपने इतिहास और परंपरा से अभिन्न रूप से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण अवधारणाओं की (सतही) आलोचना करना, प्रगतिशील विचारक बनने का एक सहज और लगभग स्वीकृत रास्ता बन चुका है। और चौंकानेवाली स्थापनाओं की अनिवार्य उपस्थिति जहां गौरतलब है, वहीं यह भी सच है कि ऐसे विचार प्राय: स्वल्पायु के ही रहे हैं। पर हां, नग्नता के बारे में भारतीय विचार निश्चय ही पश्चिमी अवधारणाओं से भिन्न है। गुलामी के लंबे इतिहास में नग्नता के बारे में हमारे अपने विचारों को पश्चिमी विचारों ने काफी हद तक प्रभावित किया है। और भारतीय चित्रकला की अधूरी समझ और कभी-कभी निहित स्वार्थों के चलते अश्लील चिन्हित कर कटघरे में खड़ा किया जाता रहा है। भारतीय चित्रकला में अनावरण, अनावृत्त और नग्नता के बीच में सुस्पष्ट भेद है। वेदों में काली को महामही के साथ-साथ महानग्नी भी कहा गया है। भारतीय कला में उन्नत वक्ष और योनी को एक लंबे समय से अनावृत्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। मातृ छवि, यक्षी और तमाम देवियों के साथ-साथ आम नारी एवं परिचारिकाओं के चित्रण में इस सत्य की व्यापक उपस्थिति है। जैसा पहले ही कहा गया है, कि भारतीय कलाकारों में एक कुंठारहित स्वायत्तता की तलाश रही है जिसके चलते वे धार्मिक अवधारणाओं पर निरंतर प्रश्न उठाते रहे हैं। नारी चित्रण में उन्होंने नारी को उर्वरता और सृष्टि का आधार माना है और इसीलिए मूर्तियों में स्तन, योनी का प्रदर्शन एक प्रतीक के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है। यहां इसे किसी नारी विशेष की देह संरचना की शुद्ध अनुकृति मान लेने से भारतीय चित्रकला परंपरा के बारे में हमारी समझ न केवल अधूरी रह जाएगी बल्कि इसमें विकृतियों की स भावनाएं भी बढ़ जाएंगी। कला इतिहास में प्रतीकों के उपयोगों को प्राय: जटिल विषय को सरल बनाने के उद्देश्य से किये गये असफल प्रयासों के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय कला इतिहास भी ऐसी जटिलताओं से मुक्त नहीं है। अत्यंत सरल लगनेवाले शिवलिंग एक जटिल अवधारणा को सरल रूप से प्रस्तुत करने का असफल प्रयास सा लगता है। अत्यंत निरीह-सा लगने वाला स्वास्तिक हिटलर के राष्ट्रवाद की जटिल संकीर्णताओं को समझने के लिए पर्याप्त नहीं। शालभंजिका के बारे में एक मिथक यह है कि गौतम बुद्ध की मां माया जब गर्भवती थीं तब उन्होंने शालवन में जाने की इच्छा प्रकट की थी। शाल वृक्ष की टहनी को स्पर्श करते ही उन्हें प्रसव पीड़ा का आभास हुआ। बुद्ध-जन्म के साथ जुड़ी इस घटना का व्यापक चित्रण भारतीय कला के विभिन्न कालों में देखा जा सकता है। दूसरे रूप में शालभंजिका की अवधारणा यह है कि बिना फल फूलों वाले वृक्ष को यदि कोई नारी स्पर्श या आलिंगन करे तो वह वृक्ष फलवती हो उठता है। दोनों अवधारणाओं पर आधारित असंख्य मूर्तियां भारतीय कला के हजारों साल के लंबे इतिहास क्रम में उपस्थित हैं। देवी-देवताओं के रूप और उनके बारे में अवधारणाएं भी समय के साथ-साथ बदली हैं। सुरों और असुरों द्वारा पूजित देवी-देवताओं के बीच के अंतर का लुप्त होने के प्रभाव को भी भारतीय चित्रकला परंपरा में देखा जा सकता है। यह धर्म या मिथक को जड़ न मान लेने से ही संभव हो सका है। लक्ष्मी जहां सुंदरता की देवी थी बाद में धन और सौभाग्य की देवी के रूप में उसकी रचना की गयी। बौद्ध धर्म के प्रचार में कला की न केवल एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है, साथ ही कला विकास में बौद्ध जातक कथाओं, साहित्यिक कृतियों और अवधारणाओं का अपना महत्व रहा है। भारतीय कला का लंबा इतिहास महज धर्म और मिथकों के सहारे ही आगे नहीं बढ़ा है। इसने कला, कहानी, नाट्यकथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं का चित्रण करते हुए अशिक्षित जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकारा भी है। सातवाहन काल के अमरावती स्तूप में अंकित इस कलाकृति को देखें, मानो दर्शक बन कर हम दो हजार वर्ष पूर्व के किसी नाटक को देख रहे हैं (चित्र 1, सातवाहन, आंध्र)। उदाहरण के रूप में उड़ीसा के रानी गुंफा और हाथी गुंफा की दीवारों पर उत्कीर्ण कलाकृतियों का उल्लेख किया जा सकता है। लगभग एक सौ ईसा पूर्व बनाये गये इन कलाकृतियों में दुष्यंत-शकुंतला, कथा स्त्री अपहरण आदि प्रसंगों के साथ-साथ भारतीय साहित्य के कुछ प्रमुख नाट्यकथाओं का वर्णन है। जहां उदयन, वासवदत्ता, वसन्तक आदि चरित्रों की उपस्थिति को आज भी हम पहचान सकते हैं। चित्र या मूर्तिकला के साथ साहित्य व अन्य कलाओं का एक नायाब रिश्ता भारतीय कला को अपनी पहचान अवश्य देता है। इस संदर्भ में भारतीय कला इतिहास में शायद सबसे महत्वपूर्ण मूर्ति का जिक्र करना उचित होगा, (चित्र 2) सिंधुघाटी सभ्यता के समय की कला के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में हम एक नर्तकी की मूर्ति को पाते हैं। यहां गौर करें कि यह मूर्ति किसी देवी की नहीं है, यह मूर्ति एक नर्तकी की है जो नृत्यकला को प्रस्तुत कर रही है – जहां ताल है, संगीत है, कविता है, यानी साहित्य है। साथ ही इस मूर्ति को गौर से देखें तो यह मूर्ति बहुअलंकृत है। यह अनावृत्त है। नग्न है। पर इसमें नग्नता नहीं है। यह मूर्ति नग्नता के बारे में भारतीय कला की अवधारणा को निश्चय ही एक सुस्पष्ट आधार देती है। पश्चिम के लोगों की अवधारणा या उनसे प्रभावित लोगों की अवधारणा से यह भिन्न है। सिंधुघाटी सभ्यता की यह मूर्ति 2500 साल ईसा पूर्व की है। अर्थात , आज से 4500 वर्ष पहले की कला! 4500 वर्ष पहले की कला की समझ! 4500 साल पहले के कलाकार की अभिव्यक्ति! हमने भारतीय कला परंपरा में धर्म और मिथक के साथ-साथ आम नारियों के चित्रण और नाट्यकथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं के चित्रण का जिक्र किया। मोहनजोदड़ो की नर्तकी किसी राज्याश्रित कला का प्रतिनिधित्व करती है या नहीं, यहां इसकी विवेचना महत्वपूर्ण नहीं है पर भारतीय कला इतिहास में लोककला का भी अपना एक स्वतंत्र इतिहास है। संरक्षण के अभाव से इसके इतिहास की कड़ियां विच्छिन्न अवश्य है पर इसकी रचनाशीलता के बारे में कोई संदेह नहीं है। यहां (चित्र 3) में ऐसे ही कुछ लोक कला के उदाहरण प्रस्तुत हैं जो तक्षशिला, वैशाली और राजघाट से प्राप्त हुए हैं। आश्चर्य की बात ये है कि मोहनजोदड़ो की नर्तकी जैसी ये मूर्तियां भी अनावृत्त हैं। इसके साथ यदि हम लौरिया नंदनगढ़ (चित्र 4) से प्राप्त मूर्ति को देखें जो 1600 से 1300 ईसा पूर्व के बीच बनायी गयी थी वह भी आश्चर्यजनक रूप से मोहनजोदड़ो नर्तकी जैसी ही अनावृत्ता है। तक्षशिला वैशाली राजघाट की मूर्तियां भारतीय लोककला के आरंभिक कृतियों में से हैं, जो नग्नता के बारे में भारतीय कला की अवधारणा को एक व्यापक सामाजिक स्वीकृति के साथ जोड़ते हैं। यक्षी को भारतीय कला इतिहास में विभिन्न काल में विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया गया है। प्राय: सभी यक्षी मूर्तियों के वक्ष जहां अनावृत्त हैं, वहीं विविध वस्त्र के प्रचलन का प्रमाण भी इन्हीं यक्षियों से मिलता है। 300 ईसा पूर्व बनी दीदारगंज की मौर्यकालीन यक्षी (चित्र 5) भारतीय कला ही नहीं विश्वकला के सुंदरतम नमूनों में से एक है। (इस यक्षी के अनावरण की भव्यता हमें सहज ही वीनस-डे-मेलो की याद दिलाती है।) बहरहाल, अपनी बात को और भी स्पष्ट करने की कोशिश में देवी-देवताओं के चित्रण से हटकर, भारतीय कला में अनावरण की अवधारणा को और भी पुष्ट करती हुई गांधार कला के कुछ नमूनों पर यदि हम गौर करें, तो हमें अपनी ओर से कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं रह जाती (चित्र 6)। ये सब 200 से 100 ईसा पूर्व के हैं। शुंग काल की यक्षी और नारी मूर्तियों में ऐसी रचनाशीलता की अद्भुत निरंतरता सहज ही दिखाई देगी। (चित्र 8) इससे यह स्पष्ट है कि जिस रचनाशीलता में नारी, उर्वरता और सृष्टि के मूल सूत्र के रूप में प्रतिबिंबित है, वहीं नारी के प्रति सम्मान भी अभिन्न रूप से जुड़ा रहा है। हजारों वर्षों के अंतराल के बाद भी ऐसी अवधारणा के प्रति भारतीय कलाकारों का विश्वास अटूट एवं प्रवहमान है – ऐसा मान लेना कठिन नहीं है। मानव विकास के इतिहास क्रम में हम पाते हैं कि जिसभ्यात्रा की शुरुआत, मनुष्य ने अपने और अपने परिवेश के बीच के अंतर्संबंधों को जानने से शुरू की थी वह आगे चलकर विवेक और तर्क को न केवल अपने परिवेश को बल्कि अपने अतीत को भी जांचने का जरिया बनाया। जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे आधुनिक समाज, उन्नत समाज व्यवस्था के चलते असंख्य खेमों में विभाजित है। अमीर-गरीब, गोरे-काले, उच्चवर्ण-नि नवर्ण, शिक्षित-अशिक्षित, हिंदू-मुसलमान, स्त्री-पुरुष के अलावा विभाजन के असंख्य रूपों से हम परिचित हैं। किसी समाज में कला भी कई मायने में विभाजित होती है। उसी समाज में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसे लोगों का होता है जिनका कला से या कलाकार के सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं होता। यह तो सच है कि समाज में जीने वाला हर व्यक्ति का कला के प्रति समान रूप से जागरूक होना कतई संभव नहीं है। पर स्थिति कभी-कभी ऐसी बन आती है कि जब खास लोगों का एक समूह अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कला के तमाम पहलुओं पर निर्वाध अपनी राय देने लगते हैं। हालांकि यह अपवाद ही है – नियम कतई नहीं। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक जटिल रूप है। कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कलाकार को है, वहीं कला के बारे में अपनी राय देने का अधिकार दूसरों को भी है। पर कठिनाई ये है कि जिन लोगों का कला से कुछ भी लेना-देना नहीं, वे कला को जानने-समझने की कोशिश करने के बजाए उसका अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए मूर्खतापूर्ण विरोध करते हैं। यह स्थिति किसी भी हालत में किसी समाज में मान्य नहीं हो सकती। जैसा कि हमने तमाम उदाहरणों की जांच-पड़ताल के माध्यम से भारतीय कला में अनावरण या नग्नता की भारतीय अवधारणा को समझने की कोशिश की। उसी को आगे बढ़ाते हुए हम पाते हैं कि इस अवधारणा पर दो बातों का स्पष्ट प्रभाव है। एक , यह कि भूमध्य रेखा के आसपास विकसित हुए इस सभ्यता में वस्त्रों के आविष्कार के बाद भी तन ढंकने का प्राकृतिक कारण किसी ठंडे प्रदेश से निश्चय ही कम था और है। पर क्या यहां यह मान लिया जाए कि सिंधु घाटी की कला से लेकर आधुनिक कला में प्रतिबिंबित नारी जाड़ों के मौसम में भी अनावृत्त रहती थी? स्वभाविक रूप से यह कल्पना असंभव है! पर कलाकार की रचना का एक सार्थक आधार, मानव देह संरचना (Human anatomy) से भारतीय कलाकार का परिचय निश्चय ही सघन था। यहां उदाहरण के तौर पर आधुनिक काल में भी बस्तर (चित्र 11) और अंदमान (चित्र 10) की कई आदिवासी जातियों में नग्नता की अवधारणा वह नहीं है जो हमारे अन्य ग्रामीण या शहरी इलाकों में रहनेवाले लोगों की है। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि भारतीय कला 4500 हजार वर्ष पहले से लेकर अब तक कोरे प्रकृति चित्रण से हटकर एक कल्पनाश्रित कला रही है। और इसीलिए इन समस्त मूर्तियों की तथाकथित नग्नता, नारी शरीर का शुद्ध प्रतिबिंबन नहीं है बल्कि इसका आधार, कुंठारहित, स्वाधीन और रचनाशील कलाकारों की कल्पना है। और ऐसी कल्पनाशीलता भारत में सदियों से कलाकारों के लिए प्राथमिकता रही है। भारतीय कला इतिहास के इन स्वर्णिम पृष्ठों को पलटते हुए हम आज के विषय के दूसरे हिस्से तक आ पहुंचे हैं जहां राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए कलाकार की रचनाशीलता को निशाना बनाया जा रहा है। पिछले दिनों बार-बार मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों को लेकर विवादों का तूफान उठता रहा है। उन पर आरोप रहा है कि उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं का चित्रण नग्न और अश्लील ढंग से किया है। कई दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों के समर्थकों ने उनके स्टूडियो पर हमला किया और प्रदर्शनियों से उनके चित्रों को हटाने के लिए मजबूर किया। हुसैन आजादी के बाद के भारतीय कलाकारों में सबसे महत्वपूर्ण कलाकारों में से एक हैं। उन्होंने आधुनिक भारतीय कला को एक सुस्पष्ट दिशा दी है जो दुर्भाग्य से पिछले चार दशकों से विकसित होते बाजारवाद के अंधेरे में आम जनता के लिए लगभग ओझल ही रही है। कलाप्रेमियों के लिए भी उनके चित्रों को मूलरूप से देख पाना निरंतर अस भव सा होता रहा है। “कल्पनां पत्रिका और असंख्य साहित्यिक कृतियों के आवरणों पर हुसैन कभी-कभार दिखाई देते थे। पर वहां भी अब खामोशी है। एक ऐसी लंबी खामोशी के बाद अचानक हुसैन के चित्र आम लोगों की चर्चा के केंद्र में आ गये हैं। और वे लोग जो युवा कलाप्रेमी हैं, हुसैन के इस विवादग्रस्त चेहरे से ही परिचित हो पा रहे हैं। बहरहाल, पिछले कई दशकों से समाज का बड़ा वर्ग हुसैन को उनके चित्रों की विशिष्टता के लिए नहीं, बल्कि लाख से दस लाख, दस लाख से करोड़ तक की कीमतों के लगभग तिलिस्म-सी लगने वाली व्यावसायिक सफलताओं की कथाओं के लिए जानता रहा है। किसी भी कलाकार के लिए खासकर समकालीन भारतीय कला के एक ऐसे विशिष्ट कलाकार के लिए निश्चय ही यह दुर्भाग्यजनक स्थिति है। यहां उल्लेखनीय है कि भारत में समकालीन चित्रकारों में अपने चित्रों के लिए एक लाख रुपये की मांग करनेवाले हुसैन ही पहले चित्रकार रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की 150वीं वर्षगांठ (1986) पर आयोजित नीलामी में हुसैन का एक चित्र (जो पूंजीवाद के विरोध में समर्पित रंगकर्मी सफदर हाशमी की शहादत पर आधारित था) पहली बार भारतीय समकालीन किसी भी कलाकृति की कीमत के दस लाख की सीमा को छू सका था। इससे लगभग 15 वर्ष बाद ही उनके चित्र एक करोड़ रुपये की सीमा को छू कर अब वे पांच और दस करोड़ के गंतव्य की ओर गतिमान है। ऐसे कला से विच्छिन्न विषय और उनसे जुड़े आंकड़ों से पाठकों का परिचय करना दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि हम यहां हुसैन जैसे महान चित्रकार के पिछले बीस वर्षों की अवधि में बने दस महत्वपूर्ण चित्र भी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हैं। आप मकबूल फिदा हुसैन से उतना ही परिचित हैं जितना आप किसी अन्य भारतीय कलाकार से, या कि अपने आप से। इस सच को मान लेने से हम पाते हैं कि हुसैन साहब की उम्र लगभग छह हजार वर्ष की है। इस लंबी उम्र के विभिन्न पड़ाव के बारे में इस आलेख के पहले हिस्से में जिक्र किया गया है। और इससे “कलाकार” होने के साथ-साथ उनके एक दूसरे रूप से हम परिचित हो सकें हैं कि वे निर्विवाद रूप से ‘भारतीय’ हैं। भारतीय कला, पिछले हजारों वर्षों से विदेश के कला रूपों से प्रभावित रही है। महज गांधार कला ही केवल ग्रीक और रोमन विदेशी प्रभावों को लेकर विकसित हुई, ऐसा नहीं। विदेशी कलाओं से अपने को समृद्ध करने की एक लंबी परंपरा में भारतीय कला ने अपनी मूल विशिष्टता को बनाये रखा। वे ‘समकालीन’ कला प्रवृत्तियां ही थीं जिन्होंने अपूर्व गांधार बुद्ध मूर्ति को पहली बार बनाया औरंपिछली सदी के बीचोंबीच ये वही “समकालीन” विदेशी कला प्रवृत्तियां थीं जिन्होंने व्यापक रूप से आधुनिक भारतीय कला को प्रभावित किया। हुसैन भारतीय धर्मों, गाथाओं और मिथकों के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक परिस्थिति से भलीभांति संबद्ध रहे हैं। हालांकि रामायण-महाभारत जैसे विषयों पर बनाये गये उनकी महत्वपूर्ण और विशाल चित्र श्रृंखला से लेकर राममनोहर लोहिया, फैज, यामिनी राय, मदर टेरेसा, सत्यजित राय और सुनील गावस्कर पर बनाये गये उनके चित्र लोग अब लगभग भूल चुके हैं। इसलिए हुसैन का विवादों से घिरा हुआ चेहरा ही अब हमारे सामने रह गया है। हम यहां समकालीन भारतीय चित्रकला के कुछ ऐसे चित्रकारों के चित्रों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे जो हजारों वर्षों से चली आ रही निर्भीक, कुंठारहित कला का प्रतिनिधित्व करती है और ये याद दिलाती है कि आज भी भारतीय कला का मूल आधार, इसमें निहित कल्पनाशीलता है न कि कोरा प्रतिबिंबन। उसके पहले हुसैन के उन चित्रों को देखें जिनके लिए उन्हें अश्लील और हिंदुओं के आस्था पर आघात करनेवाला बताया गया है। पर इसके पहले एक बार फिर से दोहराना जरूरी है कि हुसैन प्राथमिक और अंतिम रूप से एक भारतीय चित्रकार हैं और उन्हें हिंदू-मुसलमान या किसी अन्य चित्रकार के रूप में देखना, भारतीय कला परंपरा में कलाकारों को समझने की मूल अवधारणा के विरुद्ध है। यह बात बिस्मिल्लाह की शहनाई से अमीर खां और बड़े गुलाम अली के गायन, अल्लारखा और अहमद जान के तबला वादन के साथ उस्ताद अलाउद्दीन के संगीत को जानने और समझने से ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। इन महान संगीतकारों के जरिये भारतीय कला विकसित होती रही है, न कि हिंदू कला या मुस्लिम कला। पार्वती (चित्र 12) यह अद्भुत सुंदर चित्र हुसैन की कला में रेखाओं की निरंतरता की विशेषता को बखूबी दर्शाते हुए चित्र कला में दुर्लभ तिर्यक संरचना (diogonal composition) से हमें परिचित कराता है। इस चित्र पर नग्नता और अश्लीलता का आरोप है। हनुमान और रावण (चित्र 13) रावण के प्रथागत परिकल्पना में कंधे पर रखे एक सर के एक ओर चार और दूसरी ओर पांच सर हैं जो इसके संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ता है पर बावजूद इसके एक लंबे समय से रावण को ऐसे ही प्रस्तुत किया जाता रहा है। हुसैन ने यहां उन्हीं नौ सिरों को एकदम नये ढंग से संयोजित किया है जो बेहद महत्वपूर्ण है। पर इस चित्र पर भी नग्नता और अश्लीलता का आरोप है। द्रौपदी (चित्र 14) द्रौपदी महाभारत ही नहीं बल्कि भारतीय गाथाओं के इतिहास के सबसे लज्जाजनक घटना के रूप चिन्हित रही है जहां एक नहीं उसके पांच-पांच पति उसके सम्मान की चिंता किये बगैर उसे जूए के दांव पर लगा देते हैं। और इतना ही नहीं, जूए में द्रौपदी को जीतकर दुर्योधन द्रौपदी के वस्त्र-हरण पर उतारू हो जाता है। इस चित्र में उस विपन्न नारी को हम चौपड़ जैसी बिछी देख सकते हैं। गौर करें, द्रौपदी के माथे पर सुहाग का बड़ा सा चिह्न है जो पूरे चित्र को बेहद अर्थपूर्ण बनाता है। महाभारत के महापुरुषों और पांच-पांच पतियों की उपस्थिति में एक नारी को नग्न करने की कहानी का हमने महाभारत की कथा से काटकर संसर नहीं किया है पर इस घटना पर बने एक महान चित्र को नग्न और अश्लील कहने की मूर्खता से कुछ लोग बच नहीं सके। सरस्वती (चित्र 15) हुसैन के अति परिचित रेखाओं से बने इस लयात्मक चित्र में अनूठा संयम दिखता है। महज पांच रेखाओं से मोर के पंख का विस्तार यहां उल्लेखनीय है। सरस्वती के दाहिने हाथ में कमल का फूल पानी की सतह के ऊपर है जहां एक मछली भी है। यह अद्भुत चित्र अपनी संरचना के साथ-साथ रेखाओं की हुसैनी लयात्मकता के लिए निस्संदेह विशिष्ट है। यह अनावृत्त है पर समझ के किसी भी मानदंड पर इसे अश्लील नहीं कहा जा सकता। लक्ष्मी (चित्र 16) यह रेखाचित्र, हुसैन की रेखाओं की खास निरंतरता के चलते हाथी पर आसीन लक्ष्मी को गणेश पर बैठी लक्ष्मी मानते हुए इसे नग्न और अश्लील चित्र के रूप में चिन्हित किया गया है। दुर्गा (चित्र 17) यह चित्र उसी श्रृंखला का है जिस पर नग्न, अश्लील और आपत्तिजनक होने का आरोप है। जिन लोगों ने इस पर ऐसा आरोप लगाया है, उनकी समझदारी की विकृति इस बात से स्पष्ट होती है कि इस चित्र में दुर्गा और शेर यौनक्रिया में लिप्त हैं। हुसैन की कला में रेखाओं की विशिष्टता का यह शायद सबसे बड़ा अपमान है। उपरोक्त सभी चित्रों को अश्लील और आपत्तिजनक कहने वालों को स्पष्टीकरण देने के उद्देश्य से या कला की रचनात्मकता के बचाव में कोई दलील पेश करने के लिए हम अपना वक्तव्य नहीं रख रहे हैं। भारतीय कला के लंबे और गौरवपूर्ण इतिहास के साथ-साथ हम मौजूदा राजनीतिक परिवेश में यकायक बदलते करवटों को समझ रहे हैं। और हम अपनी समझ को आप सब तक पहुंचाना चाहते हैं। यहां कतई आग्रह यह नहीं है कि आप हमसे अवश्य ही सहमत हों, बल्कि हम चाहेंगे आप इस पर सोचें, विचारें और समझें कि हुसैन के चित्रों पर उठायी गयी आपत्तियों का आधार न तो धर्म है और न ही कला। यह शुद्ध रूप से एक स्वार्थप्रेरित राजनैतिक पहल है जिसको समझना आज के माहौल में कला को समझने से ज्यादा जरूरी है। फिर भी हम किसी के राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए अपनी कला परंपरा की महानता को छोटा करने का अधिकार किसी को दे नहीं सकते। कम से कम तब तक, जब तक हमारे सभी संग्रहालयों को बामियान या बाबरी मस्जिद नहीं बना दिया जाता। जब तक पुस्तकालयों में सुरक्षित इन कला इतिहासों की महत्वपूर्ण पुस्तकों को आने वाली पीढ़ी के हाथों से छीन नहीं लिया जाता। जब तक रचनाशीलता को कला का मूलभूत आधार मान सकना स भव रहेगा तब तक कला को कला की तरह देखने का तर्क जिंदा रहेगा। यहां तीन उदाहरण प्रस्तुत हैं। पहले उदाहरण में एक हिस्सा 200 ईसा पूर्व का है और दूसरा – हमारी अपनी सदी का। (देखें चित्र 18 और चित्र 15) दूसरे उदाहरण में मथुरा कुषाण काल (100 ईसवी) की एक मूर्ति का चित्र है और दूसरा अपनी सदी का। (देखें चित्र 19 और चित्र 17) तीसरा उदाहरण – मथुरा कुषाण काल की कुबेर-लक्ष्मी और हराती का चित्र है और साथ में बीसवीं सदी का एक और विवादास्पद चित्र। (देखें चित्र 20 और चित्र 16) इन तीनों उदाहरणों से भारतीय चित्रकला परंपरा की निरंतरता और मकबूल फिदा हुसैन के महत्व को पाठक बेहतर समझ सकेंगे। हुसैन पर हिंदू विरोधी अश्लील होने के आरोप के साथ-साथ उनके द्वारा बनाये गये “भारतमाता” (चित्र 22) के लिए भी ऐसे आरोप लगाकर दक्षिणपंथियों ने जहां हुसैन को न केवल एक मुसलमान चित्रकार के रूप में हिंदू धार्मिक आस्थाओं के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की है, उनके द्वारा बनाये गये “भारतमाता” के विरुद्ध विवाद उठाकर उन्हें भारत विरोधी सिद्ध करने की मुहिम तेज की है। भारतीय कला में रचनाशीलता और प्रयोगधर्मिता के पक्ष में अपने वक्तव्यों में हम ने पहले ही बहुत कुछ कहा है पर अब तक हमारी बातें शायद भारतीय कला के इतिहास तक सीमित रही है। समकालीन भारतीय कला में इस परंपरा के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एक अटूट और महत्वपूर्ण निरंतरता को जिंदा रखे हुए हैं। इस मान्यता को हम कुछ महत्वपूर्ण समकालीन चित्रकारों की कृतियों के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहेंगे। हुसैन के “भारतमाता” के संदर्भ को एक आधार देने के लिए हम केवल सिंहवाहिनी-दुर्गा-भारतमाता की अवधारणा को विश्लेषित करते हुए कुछ चित्र यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। (पृष्ठ 41 पर देखें) भारतमाता का एक कैलेंडर चित्र (चित्र 21) हम सबके लिए एक अति परिचित निरीह-सा लगनेवाला चित्र है। यहां कलाकार की कल्पनाशीलता, निर्विवाद रूप से हिंदू देवी – वैष्णो देवी के सिंहवाहिनी रूप से प्रभावित है। इस चित्र में भारत विभाजन के बाद हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना करने वाले एक राजनीतिक दल की विचारधारा प्रतिबिंबित है, जिस दल का झंडा हाथ में लिए सिंहवाहिनी दुर्गा भारतमाता में तब्दील हो गयी है। भारतमाता (चित्र 23) शिल्पगुरु अवनींद्र नाथ ठाकुर का बनाया हुआ है। ये एक संन्यासिनी रूप है और बंगाल स्कूल की अभूतपूर्व शास्त्रीयता का प्रतिनिधित्व करता है। अष्टभुजा दुर्गा (चित्र 24) मंजीत बावा। दुर्गा (चित्र 25) अतुल डोडिया। दुर्गा (चित्र 26) विकास भट्टाचार्या। दुर्गा (चित्र 27) रामकुमार। दुर्गा/भारतमाता (चित्र 28) अर्पिता सिंह। इन चित्रों को गौर से देखने और समझने के बाद हुसैन के विवादास्पद चित्रों को अश्लील, हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं पर आघात करनेवाले या भारत विरोधी नहीं कहेंगे। यह मेरा महज पाठकों से आग्रह नहीं है बल्कि अपनी समझ और तर्क से हम जो कुछ समझ सके उसे आप तक पहुंचाने की कोशिश मात्र कर रहे हैं। यहां कुछ और बातों पर गौर करने की गुंजाइश अवश्य जान पड़ती है। भारत विभाजन की प्रक्रिया में पाकिस्तान का जन्म जिस आधारंपर हुआ था, भारत में सत्ता के हस्तांतरण का आधार वह नहीं था। यह राष्ट्र पहले दिन से ही हिंदू, मुसलमान, सिख और अन्य सभी धर्मों को माननेवालों के लिए समान रूप से उनका देश था – कम से कम हमारे पहले प्रधानमंत्री की धर्म निरपेक्षता की अवधारणा कुछ ऐसी ही थी। पर भारतीय हिंदू, तिलक द्वारा शुरू किये गये महाराष्ट्र में गणेशपूजा, बंगाल में बंकिम बाबू द्वारा आनन्दमठ की रचना और हमारे राष्ट्रपिता की रघुपति राघव राजा राम की आराधना जैसी अन्य तमाम बातें भारत के नये लाट, नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों से मेल नहीं खाता था। भारतीय संसदीय गणतंत्र के निर्माण और चुनावी राजनीति में आजादी के बाद से ही भाषा के नाम पर, जाति के नाम पर, इलाके के नाम पर, प्रदेश के नाम पर ध्रुवीकरण एक विचारविहीन जनविरोधी व्यवस्था के लिए जरूरी था और राजनीतिक दलों ने इस पहलू को ठोस आधार देते हुए अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण करने में देरी नहीं की। जैसे – हरिजन और मुसलमान, दोनों ही अल्पसंख्यक के रूप में चिन्हित तो हुए पर सद्य: स्वाधीन भारत में मुसलमान एक विशिष्ट वोटबैंक माना गया। जामा मस्जिद के इमाम के इशारे पर मुस्लिम वोट किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में पड़ने लगे। राजनैतिक दलों ने इस अल्पसंख्यक वोटों को हथियाने के लिए मजार पर चादर चढ़ाने और इफ्तार पार्टियों के आयोजन जैसी तमाम सतही हरकतों में लिप्त हुए। इन सब का हिंदुस्तान के आम मुसलमान जनता की सामाजिक, आर्थिक विकास से कोई संबंध नहीं था। चुनाव और वोट को केंद्र में रखकर सभी पार्टियां जनता के शोषण के संसदीय तरीकों में पारंगत होने लगी। समय के साथ-साथ भारत की चुनावी संसदीय राजनीति का चेहरा स्पष्ट से स्पष्टतर होता चला गया। रथयात्रा, बाबरी, गुजरात से लेकर आरक्षण, सिंगुर, नंदीग्राम और तस्लीमा विवाद निर्विवाद रूप से इसी चुनावी संसदीय राजनीति के कुत्सित चेहरे के विभिन्न रूप हैं। हालांकि हिंदू मतों के ध्रुवीकरण के प्रयास में बाबरी कांड अब तक के दक्षिणपंथियों की राजनीतिक समझ के ओछेपन को ही रेखांकित कर पायी, क्योंकि जिस तात्क्षणिक और दूरगामी लाभ के उद्देश्य से रथयात्रा कर बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, उन दक्षिणपंथियों को चुनावी लाभ के रूप में कुछ भी हाथ नहीं लग पाया था। ऐसी स्थिति में उन दलों के लिए हिंदू मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों को अपनी ओर आकर्षित करना और धर्म के नाम पर एकजुट करना, संसद में बड़ी संख्या में लौटने के लिए उन्हें जरूरी लगा। यहां गौरतलब है कि रथयात्रा और बाबरी मस्जिद कांड से व्यापक रूप से हिंदू मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी अप्रभावित रहा था। वर्तमान हुसैन विवाद से दक्षिणपंथियों को इस मायने में बाबरी से बड़ी उपलब्धि मिली है क्योंकि न केवल औसत उदारमना हिंदू ये कहते हुए पाये जा रहे हैं कि “हुसैन को क्या जरूरत थी हिंदू देवियों के नग्न चित्र बनाने की।” साथ ही कई मुस्लिम संगठनों ने भी हुसैन को यह कहकर “बिरादरी बाहर” किया है कि हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के अश्लील चित्र बनाने का कोई अधिकार हुसैन को नहीं है। दोनों ही स्थितियों में दक्षिणपंथियों के उद्देश्य की पूर्ति होती नजर आती है क्योंकि वे कम से कम ये तो जानते ही हैं कि भारतीय कला इतिहास परंपरा की समझ मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों को नगण्य है। और साथ ही समकालीन भारतीय चित्रकला को हमारे समाज का बड़ा हिस्सा एक बाजार की चीज मानते हैं जो केवल धनवानों के लिए ही रची जाती हैं, लिहाजा इससे भी उसका कोई लेना देना नहीं है। मनोरंजन के साधन के रूप में फिल्म, नाटक, साहित्य, संगीत, नृत्य आदि कलाओं का जो स्वरूप आज समाज में दिखता है उसके समानांतर चित्रकला को हम नहीं रख पाते हैं। ऐसी स्थिति में जनता से अलग-थलग पड़ी चित्रकला को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना, उन्हें शायद सबसे आसान लगा हो। यह पहल शुद्ध रूप से उस चुनावी संसदीय व्यवस्था को हथियाने के लिए की गयी एक सोची-समझी साजिश है, जो साठ साल की संसद से आती सड़ांध को भी स्पष्ट कर रही है। पर हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि यह साजिश किसी कला के खिलाफ नहीं है बल्कि यह एक राजनैतिक दांव है जिसका उत्तर कला को नहीं बल्कि आम जनता की चेतना की राजनीति को देना है। हमारा विश्वास है कि इस आलेख से हम भारतीय कला परंपरा के कुछ पहलुओं के बारे में पाठकों से रू-ब-रू हो सकें। साथ ही हुसैन विवाद पर बात करते हुए शायद यह भी सिद्ध कर सकें कि मकबूल फिदा हुसैन भारतीय कला परंपरा के महत्वपूर्ण कड़ी हैं। और उन्हें किसी धर्म के साथ जोड़ना भारतीय कला की उदार अवधारणाओं का विरोध करना है। अंत में इस विवाद के पीछे साजिश की परंपरा पर भी कुछ चर्चाएं जरूरी हैं इस लेख में। हम मानते हैं कि कला पर उठे ऐसे विवादों का विरोध महज एक लेख से नहीं किया जा सकता। पर यहां हम यही कहना चाहेंगे कि हुसैन के चित्रों को लेकर उठा विवाद, कला के विरोध में उठा एक मुद्दा नहीं है। यह एक घिनौनी साजिश है, जिसको ध्वस्त करने के लिए एक सुस्पष्ट राजनीतिक समझ के साथ संगठित जन-प्रतिरोध की जरूरत है। यह लेख शायद उस दिशा में एक छोटे-से प्रयास के रूप में काम आए। (यह लेख नीलाभ, डॉ मधु अग्रवाल और सुशील कांति के सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता था।) ( अशोक भौमिक । वरिष्ठ चित्रकार और कथाकार। पिछले दिनों चित्रकला की दुनिया पर आया उनका नॉवेल मोनालिसा हंस रही है खासी चर्चा में रहा। हाल ही में बादल सरकार पर उनकी एक महत्वपूर्ण किताब छपी है। वे जन संस्कृति मंच से जुड़े हैं। उनके बारे में और उनकी कला के बारे में आप विस्तार से इस लिंक www.pages.cthome.net के जरिये जान सकते हैं।)
एक अपील भरा गिफ्ट
Thursday, June 09, 2011 9:45:25 AM
रोहित
बहुत खास दोस्त मोहन ने कल कुछ रंगों और ब्रश को नीली पन्नी में लपेट कर मुझे बर्थडे गिफ्ट के बतौर दिया.... एक कविता सा पत्र भी साथ में था- लौट आओ रंगों के बीच दुबारा वे अब उदास हो चले हैं वे फिर से छूना चाहते हैं तुम्हारी अँगुलियों को. फिर से होना चाहते हैं जीवित , जीवंत और खेलना चाहते हैं. धमाचोकडी मचाना चाहते हैं. ये बच्चे अब बहुत उदास हो चले हैं. लौट आओ अब इनके बीच. -सोचता हूँ कुछ कैनवास खाली पड़े हैं घर पर. इस दोस्त ने जगाया है मुझे गहरी नींद से. अब अनगढ़ ही सही कुछ चित्र बनाऊ.
कलाकार एक चेतना से परिपूर्ण सत्ता है
Wednesday, April 20, 2011 11:29:41 AM
रोहित
चित्रकार के रूप में एम0 सलीम से मिलना प्रकृति के विविध पहलुओं से मिलना है। भूदृष्य चित्रण के कलाकार एम0 सलीम के चित्रों में प्रकृति के तमाम रंगो-आकार अंगड़ाई लेते दिखते हैं। जो कई बार रंगों में वाश तकनीक के प्रयोग से यथार्थ और स्वप्न के कहीं बीच लहराते नजर आते हैं। उनके कैनवास मूलतः इसलिए ध्यान आकर्षित करते हैं क्योंकि वहां प्रकृति की अनुकृति भी प्रकृति से एक कदम आगे की है। उनसे हुई कुछ बातें....... -रोहित जोशी प्र0ः- सबसे पहले तो कुछ बहुत अपने बारे में बताइए? कला के प्रति आपकी अभिरूचि कहां से जन्मीं? एम सलीमः- यूं तो ये रूझान बचपन से ही रहा हैै। जब छोटी कक्षाओं में पढ़ा करते थे तो स्लेट में पत्थरों के ऊपर चॉख से, या इसी तरह कुछ, कभी जानवरों के चित्र, पेड़-पौंधे मकान आदि ड्रा किया करते थे। इसके बाद ऊॅची कक्षाओं में आए यहां काम कुछ परिष्कृत हुआ इसके अलावा कला अभिरूचियों में विस्तार के लिए एक कारण मैं समझता हूॅं प्रमुख रहा, अब तो यह चलन कम हुआ है, लेकिन पहले लगभग 50से 70 तक के दशक में अल्मोड़ा में बाहर से बहुत कलाकार आया करते थे और साइटस् पर जाकर लैण्डस्केप्स् किया करते थे। उन्हैं कार्य करते देखना अपने आप में प्रेरणाप्रद रहा। रूचि थी ही, कलाकारों को देखकर स्वाभाविक ही बड़ी होगी। प्र0ः-चित्रकला सम्बन्धी शिक्षा-दीक्षा कहां से रही? एम सलीमः- दसवीं पास करने के बाद पिताजी और उनके मित्रों ने मेरी कला में अभिरूचि को देखते हुए मुझे लखनऊ आर्टस् कालेज में दाखिला दिलवा दिया। वहांॅ फाईन आर्टस् का पॉंच वर्षों का कोर्स हुआ करता था। यहीं मेरी कला की समुचित शिक्षा दीक्षा हुई। प्र0ः-आपने किन-किन माध्यमों और विधाओं में काम किया है? एम सलीमः- मैंने जलरंग व तैलरंग दोनों ही माध्यमों में काम किया है। लेकिन मुख्य रूप से जलरंगों में मेरी बचपन से ही रूचि रही है। तैल रंगों से तो परिचय ही आर्टस् कालेज में जाकर हुआ और जहां तक विधाओं का सवाल है, मैंने लैण्डस्केप, पोट्रेट, स्टिल लाइफ, लाइफस्टडी, और एब्स्ट्रैक्ट आदि पर भी काम किया हैै। लेकिन यहॉं मुख्य रूप से लैण्डस्केप पर मेरा काम है। जिसे मैं अधिकतम् जल माध्यम के रंगों से ही करता हूं। जल माध्यम भी कला जगत् में बड़ा विवादास्पद रहा है। जो पुराने मास्टर्स रहे हैं, उनका मानना है कि पानी में घोलकर रंगों को पेपर में लगाया जाना चाहिए। इसमें पारदर्षिता होनी चाहिए। जैसे आपने कोई एक रंग लिया है, और उसके ऊपर दूसरा ले रहे हैं तो सारी परतें एक के बाद एक दिखनी चाहिए। इस तकनीक में अपारदर्शी रंगों का प्रयोग वर्जित माना गया है। लेकिन दौर बदला है और ये मान्यताऐं भी टूट रही हैं। कई नऐ प्रकार के रंग माध्यम आए हैं। ऐक्रेलिक मीडियम है पोस्टर मीडियम है, इनके आने के बाद से आयाम बढ़े हैं। प्र0ः- आपने मुख्य रूप से जल रंगों में जो लैण्डस्कैप को अपनी विधा के रूप में चुना इसके क्या कारण रहे। आपको ये ही पसन्द क्यों आया? एम सलीमः- इसका मुख्य कारण प्रकृति में मेरी रूचि से था। आप देखेंगे हमारे पास तो काम के लिए छोटा सा कैनवास है लेकिन प्रकृति के पास ऐसे अनेक कैनवास हैं। इसी से लैण्डस्कैप में बहुत सारी चीजें हैं, जंगल र्हैं, नदियां हैं, झरने हैं, बादल हैं, मकान हैं, पेड़-पौंधे हैं, और भी कई अन्य चीजें हैं जिनको लेकर ताउम्र काम किया जा सकता है। प्र0ः- कला के दर्शन से उपजता एक सवाल मैं आपसे करना चाहुॅंगा, कि-कला जन्म कहॉं से लेती है? उसका उद्भव कहां है? एम सलीमः- मेरा इस बारे में जो मानना है वह यह है कि कला मूलतः पैदाइशी है। लेकिन इसे उभारने की प्रेेरणा हमारे चारों ओर मौजूद प्रकृति से मिलती है। जो चीज हमें अपील करती है उसके प्रति हमारे भीतर भावनाऐं पैदा होती हैं कि हम इन्हैं अपने मनोभावों के साथ पुनः उतारें, यहीं कला का जन्म होता है। मानव ने अपने प्रारंभिक अवस्था से ही ऐसा किया है। प्र0ः- कला के संदर्भ में दो मान्यताऐं हैं ‘कला कला के लिए’ और ‘कला समाज के लिए’ ऐसे में आप स्वयं को कहॉं पाते हैं? और कला के सामाजिक सरोकार क्या होने चाहिए? एम सलीमः- जो कहा जाता है कि- ‘आर्ट फॉर दि सेक ऑफ आर्ट’ ,‘कला कला के लिए’ ये अपनी जगह बिल्कुल सही चीज है। इसको आप बिल्कुल इप्त़दाई तौर से लें, जब आदमी समाज में नहीं बधा था, तब भी उसने सृजन किया है। प्रकृति की प्रेरणाओं से उसने चित्रांकन किया। लेकिन जब हम समाज में बध गए तो समाज के प्रति स्वाभाविक रूप से उत्तरदायित्व भी बने हैं। समाज के भीतर बहसों की वजहें भी विषय के रूप में सामने आई। कई कलाकारों ने इन विषयों पर काम भी किया। यहां एक बात मैं समझता हूँ कि यह कलाकार की रूचि का विषय है कि वे इन पर कलाकर्म करे, न कि उसका उत्तरादायित्व। प्र0ः- कुमाऊॅं पर बात करें। यहॉं चित्रकला के विकासक्रम को कैसे देखते हैं आप? एम सलीमः- कुमाऊॅं के ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों के अभाव में चित्रकला का विकास मुख्यतः लोककलाओं में ही रहा है। मुख्यधारा की चित्रकला परम्मरा यहॉं देखने को नहीं मिलती है। लोककलाओं में भी ज्यादातर योगदान महिलाओं का रहा है। अपनी अभिव्यक्ति के लिए घर के अलंकरण के जरिए सुलभ उपकरणों, रंगों आदि का प्रयोग कर उन्होंने चित्रण किया है। गेरू, चांवल, रामरज आदि का रंगों के लिए प्रयोग किया है। और इसके अतिरिक्त जो काम कुमाऊॅं में चित्रकला की मुख्यधारा का हुआ वह नगरी क्षेत्रों में हुआ। यह भी लगभग विगत् एक से डेढ़ शताब्दी पुरानी ही बात है। प्र0ः- आप मुख्यतः प्रकृति के चितेरे रहे हैं। अभी यहॉं मुख्यधारा के कला जगत में अवचेतन कला में प्रधानता आई है। इसे ही मान्यता भी मिल रही है। इसे आप कैसे लेते हैं? एम सलीमः- नऐ दौर का यह एक ऐसा क्रेज है जिसके बिना हम नहीं रह सकते। यह चित्रकला का समय के सापेक्ष विकास है। देखिए आज फोटोग्रॉफी, चित्रकला की प्रतिस्पर्धा में है। और साथ ही ये तकनीकी रूप से भी बहुत ऐडवांस हो गई है। इससे चित्रकला की पुरानी मान्यताऐं भी टूट रही हैं। कैमरा सिर्फ एक क्लिक में चित्रकार के तीन चार घण्टे की मेहनत सरीखा परिणाम दे रहा हैै। ऐसे में यदि आप सिर्फ वस्तुओं की अनुकृति मात्र कर देंगे तो वह आकर्षित नहीं कर पाऐगी यदि आप अवचेतन विचारों का अपनी अनुकृति में प्रयोग करेंगे तो यह कलागत् दृश्टि से नवनिर्माण होगा व उसे मान्यता भी मिलेगी। यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि कैमरे के पास मन नहीं होता और न हीं संवेदनाऐं होती है। लेकिन कलाकार एक चेतना से परिपूर्ण सत्ता है जो कि मौलिक सृजन करने की क्षमता रखता हैै। प्र0ः- अवचेतन कला है क्या? एम सलीमः- जिसको अवचेतन कला कहते हैं, ‘एब्स्ट्रैक्ट आर्ट’। तो एब्स्ट्रैक्ट तो वीज्युअल आर्ट में कुछ है ही नहीं। आकार रहित तो कोई कला हो ही नहीं सकती। हां ये जरूर है कि प्रकृति से वह विषय आपके भीतर गया है व रूप बदलकर बाहर आया है। बुनियादी रूप में वह मूर्त था बस जब तक आपके विचारों में रहा अमूर्त रहा लेकिन जब कैनवास में रंगों के माध्यम से उतरा फिर मूर्त हो उठा। हां लेकिन यह मूर्तता उस मूर्तता से अलग है जो वह प्रकृति में है। चित्रकार एम0 सलीम से उनके इस पते पर संपर्क किया जा सकता है- दुगालखोला, अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड
प्रकृति के आयाम बहुत वास्ट हैं....
Thursday, April 14, 2011 10:57:14 AM
रोहित
लखनऊ फाइन आर्ट कॉलेज में आर्किटेक्चर डिपार्टमेण्ट के विभागाध्यक्ष रहे डी0 एल0 साह की चित्रकला में रूचि और दखल समान है। अपने लैण्डस्केप चित्रों में उदासी के रंगों को फिराते चित्रकार साह के पास चित्रकला एक विजन के रूप में भी मौजूद है। चित्रकार डी0 एल0 साह से मेरी पिछले दिनों हुई बातचीत के अंश- प्र0ः-सबसे पहले तो अपने बारे में बताइए कि आप में कला अभिरूचियां कहां से पैदा हुई? और आपके कला कर्म की शुरूआत कहां से रही है? डी0 एल0 साहः जब मैं आठवीं या नवीं कक्षा में पढ़ा करता था तो मेरा आर्ट अच्छा समझा जाता था, फिर जब मैं दसवीं के बाद लखनऊ फाइन आर्टस् कालेज में गया तो मेरी दिली ख़्वाहिश फाइन आर्टस को ही विषय के रूप में लेने की थी लेकिन हमारे प्रोफेसर श्री विशाल लाल साह ने कहा कि तुम फाइन आर्ट नहीं करोगे। तुम्हैं वास्तुकला में एडमिशन लेना है। इस तरह मैंने वास्तुकला में एडमिशन ले लिया। कुछ समय बाद जब में दशहरे की छुट्टियों में पिथौरागढ़ आया तो यहां मैं प्रकृति को देखकर विचलित हो उठा। क्योंकि इससे पहले मैं चित्रकला की गम्भीरता को समझता नहीं था और स्कूल में फूल पत्ती आदि के चित्रण को ही कला मानता था। लेकिन आर्टस् कालेज में फाइन आर्टस् के स्टूडैण्ट्स को कार्य करते हुए देखा था खास कर कि लैण्डस्कैप में। तो पिथौरागढ़ की बेहद खूबसूरत वादियों में मेरा विचलित हो उठना लाज़मी ही था। मेरे भीतर का चित्रकार इन छुट्टियों भर हिलोरे मारता रहा और उसने मुझे चित्रकला की ओर खींचा। नतीजा ये हुआ कि आर्टस् कालेज के, अपने चित्रकला की तकनीकों के ऑब्जर्वेशन्स के चलते मैंने लैण्डस्कैप्स बनाने शुरू कर दिए। मुझे कॉलेज में चित्रकला के अनुरूप माहौल मिला। हम एक दूसरे के काम से सीखा करते थे। जो भी लैण्डस्कैप मैं करके लाता अपने सीनियर्स को दिखाता। वहां एक टीचर थे फ्रैंक रैसली। वे लैण्डस्कैप के बड़े चित्रकार थे उन्हें मैं अपना वर्क जरूर दिखाता था। उनके सुझावों से मेरा काम काफी परिष्कृत हुआ। वहां तमाम कलाकारों के संपर्क मंे आने से मुझे कई चीजंे सीखने को मिली और मेरा एक अपना स्टाइल भी बनने लगा था। एक तरह से ये हो रहा था कि वास्तुकला मे रहते हुए चित्रकला की ओर ज्यादा आकृष्ट था। प्रः- आपने किन किन माध्यमों पर काम किया है? डी0 एल0 साहः- मैंने शुरूवात तो वॉटर कलर्स से ही की और लैण्डस्कैप ही ज्यादा किया था। उसके बाद धीरे धीरे जब वॉटर कलर मेरी पकड़ बनने लगी तो फिर स्टूडियो वर्क मैंने आयल कलर्स से करने शुरू किए। आउटडोर वर्क तो मैं तब भी वॉटर कलर या फिर स्कैचिंग से ही किया करता था। प्रः-तो रचनाकर्म के लिए आपने लैण्डस्कैप के अतिरिक्त कौन सी विधाएं चुनी हैं ? डी0 एल0 साहः- प्रतिनिधि रूप से लैण्डस्कैप में ही मैंने काम किया है इसके अतिरिक्त कम्पोजिषन भी तैयार किए हैं। कम्पोजिषन्स में जो फिगर आए हैं वो भी निभाऐ हैं। लेकिन पोट्रेट मैंने कभी एक्सपर्टाइज के साथ नहीं बनाऐ। प्रः- मुख्य रूप से लैण्डस्कैप की विधा चुनने के क्या कारण रहे? डी0 एल0 साहः- कारण ये रहे कि प्रकृति के आयाम बहुत वास्ट हैं। उसकी कोई लिमिट्स नहीं हैं। इसलिए मैने लैण्डस्कैप को विधा के रूप में चुना। लोग कहते हैं कि प्रकृति को चुन कर आप क्या कर लेंगे? लेकिन मेरा स्पष्ठ मानना रहा है कि नेचर में सब कुछ है। आपने अल्मोड़ा के एक चित्रकार ‘बुस्टर’ का नाम सुना होगा उनका काम देखिए उन्होंने अल्मोड़ा की आत्मा को पकड़ डाला है। उनके फ्रेम लीजिए उनके रंग लीजिए। वो कार्य की पराकाष्ठा है। मैंने बांकी कलाकारों को भी देखा है वो कार्य की उस गहराई तक नहीं जा पाऐ हैं। लेकिन ‘बुस्टर’ के चित्रों में लगता है जैसे अल्मोड़ा की मिट्टी उधर है। प्रः- एक सवाल मेरा है, कला के दर्शन से। कला जन्म कहां लेती है? डी0 एल0 साहः- कला की उत्पत्ति के बारे में मेरा अनुभव है कला ईश्वर की कृपा से जन्म लेती है। इसके लिए कोई जरूरत नहीं कि आप कितना पढ़े लिखे हैं अगर आप पर कृपा है तो आप कलाकार हो जाऐंगे। कबीर का उदाहरण ले लीजिए कबीर अनपढ़ थे लेकिन उनके भीतर रचना कर्म कर सकने की अद्भुत् क्षमताऐं थीं। यदि कोई ये समझे कि मैं बहुत ज्यादा पढ़ लिख कर कलाकार बन जाऊॅंगा तो आर्ट्स कालेज से आज तक न जाने कितने ही लोग प्रशिक्षित हुए लेकिन कलाकार कितने बने ये देखने वाली बात है। प्रः- कला कला के लिए और कला समाज के लिए की दो बहसें हैं इनमें आप अपनी पक्षधरता कहां पाते हैं डी0 एल0 साहः- देखिए मैं समाज को कोई मैसेज नहीं देना चाहता। वस्तुतः मैं कबीर से बहुत प्रभावित रहा हूं। क्योंकि जो उसके स्टेटमैंट्स रहे हैं उसमें समाज की कोई परवाह नहीं है। जो कुछ उसने कहना था कह डाला। और उसी तरह का मैं पेण्टर हूं। मैं स्पोन्टिनियस पेण्टर हूं किसी भी चीज से मैं प्रभावित होता हूं तो उसको मैं अपनी तरह से अभिव्यक्तित करता हूं। दूसरी ओर मैं गौतम बुद्ध को लेता हूं। गौतम बुद्ध अभिजात्य परिवार से संबद्ध रहे हैं वे ऐकेडमिक भी रहे हैं। उन्होंने हर एक बात नपी तुली बोली है। लेकिन कबीर ने ये नहीं देखा। कबीर ने अपने कला बोध से पानी में आग लगते हुए भी देखी गौतम बुद्ध ने तर्क तलाशे। ऐसे ही मछलियों को पेड़ में चड़ते हुए कबीर देख सकते हैं गौतम बुद्ध नहीं। ? ऐसे ही पेंटिंग की दुनिया में आप चित्रकार एम0 सलीम को ले लीजिए वह एक डिसिप्लिंड पेंटर हैं। ऐकेडमिक किस्म के। गौतम बुद्ध की तरह। और मेरे चित्रण में अराजकता है जैसी आप कबीर के भीतर पाएंेगे। अगर समाज मुझसे मैसेज लेना चाहे तो ठीक है लेकिन में कोई मैसेज देना नहीं चाहता। प्रः-तो एक प्रश्न यह उठता है कि ऐसी स्थिति में एक कलाकार को समाज स्वीकारे क्यों? क्योंकि अन्ततः स्वीकार्यता तो समाज की ही है? डी0 एल0 साहः- हां समाज की स्वीकार्यता तो है। लेकिन जिसको समाज ने कभी अस्वीकार किया है तो बाद में स्वीकार भी किया है। जैसे आप 18वीं षताब्दी में विन्सेन्ट वान गॉग को देखिए उन्हें कलाजगत में स्वीकार ही नहीं किया जाता था। लेकिन आज वो कला जगत का बड़ा नाम हैं। प्रः- कला की जो मुख्यधारा है उसमें अभी अवचेतन कला को बड़ी मान्यता है। इसे आप कैसे देखते हैं? डी0 एल0 साहः- देखिए मैं एब्स्ट्रैक्ट आर्ट को लगभग 1956 से देख रहा हूं। लेकिन अवचेतन कला जिसे कहा जाता है कि विचार से जन्मीं कला। कैनवास पर तो वह ज्यामितीय आकारों के भीतर ही है। अवचेतन तो कुछ नहीं है। उसके लिए जो आकार हमने लिए हैं वो भी प्रकृति से इतर नहीं हैं। हां लेकिन एक ट्र्रैण्ड चल पड़ा है। प्रः- एक सवाल अब कुमाऊॅ की लोकचित्रकला के इतिहास पर है कि इसका विकासक्रम क्या रहा है? डी0 एल0 साहः- कुमाऊॅ में चित्रकला की जो परम्परा मुख्यधारा की रही वो तो अंग्रेजों के आने के बाद ही की है। लेकिन इससे पहले ऐपण की और ऐसे ही लोकचित्रण की परम्परा और उससे भी पहले गुहाकालीन मानव की चित्रण अभिव्यक्ति रही है। पिछले 100 सालों और 150 सालों के भीतर जो यथार्थवादी अभिव्यक्ति कला की हुई है वो छिटपुट ही रही है और जितनी भी रही है या तो वो अंग्रेजों ने ही की या फिर अंग्रेजों की प्रेरणा ने ही उसके पीछे काम किया।
‘मूर्तता-अमूर्तता के द्वन्द्व से हर कलाकार गुजरता है’
Monday, April 11, 2011 1:29:53 PM
रोहित
कुमाऊँ विश्वविद्यालय के सोबनसिंह जीना परिसर अल्मोड़ा में अध्यापन कर रहे डॉ. शेखर जोशी स्वयं की विकसित की हुई शैली ‘नेल पेण्टिंग’ में अपने अद्भुत् चित्रांकन के लिए विशेष तौर पर जाने जाते हैं। यूँ तो उन्होंने चित्रकला की अन्य विधाओं पर भी काम किया है, लेकिन नेल पेंटिंग में नाखूनों द्वारा आकृति रचना और रंगों का अद्भुत् प्रयोग विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। एक मुलाकात में डॉ. शेखर जोशी से उनके समग्र कलाकर्म पर बातें करने का मौका मिला, जिसका सारांश प्रस्तुत है:- प्रश्न:- सबसे पहले तो यहीं से शुरूआत करें कि आपकी चित्रकला अभिरुचियाँ कहाँ से जन्मीं ? डॉ.शेखर जोशी:- शुरूआती दौर में मैं विज्ञान का छात्र रहा। चित्रकला में प्रारम्भ में सरसरी रुचि रही। मेरी मुलाकात इम्तियाज़ अली खान से हुई। उनकी एक भांजी अद्भुत् चित्रण किया करती थीं। मेरी चित्रकला की वे प्रेरणास्रोत रही हैं। गुरू जी (इम्तियाज अली खान) ने मुझे चित्रकला में निरन्तर सृजन के सुझाव दिए तो मैं विज्ञान छोड़ चित्रकला की दुनिया में आया। यहीं मेरी चित्रकला की शुरूआत रही है। प्रश्न:- किन-किन विधाओं और विषयों पर आपने काम किया है ? डॉ.शेखर जोशी:- मैंने प्रारम्भ तो कैलेण्डर, किताबों आदि से चित्रों को कॉपी करके ही किया। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि कॉपी करना कोई आर्ट नहीं है। आर्ट्स कालेज में जाने के बाद अन्य सारी विधाओं के बारे में पता चला। जलरंग, तैल रंग आदि पर मैंने चित्रकारी की। टैम्परा रंगों में भी मैंने बहुत काम किया है। आजकल मैं एक्रेलिक रंगों में भी चित्रण करता हूँ। कुल मिला कर लगभग सभी माध्यमों में मैंने काम किया है। प्रश्न:- ‘नेल पेण्टिंग’ आपकी इज़ाद की हुई विधा रही है। इस पर काम करना आपने कब से प्रारम्भ किया ? डॉ.शेखर जोशी:- ‘नेल’ विधा पर जो मैंने काम करना शुरू किया है, ये मुझे मेरे गुरू जी से ही पहले पहल मिली है। एक बार उन्होंने मुझे ब्लॉटिंग पेपर पर नाखूनों से काम करके दिखाया था। जब मैंने कुछ समय तक इस विधा पर काम किया और फिर उन्हें दिखाया तो उन्होंने परामर्श दिया कि ‘तुम इस विधा पर अच्छा काम कर सकते हो।’ तो प्रारम्भिक जानकारी तो उन्होंने ही मुझे दी थी। फिर मैंने इस विधा पर आकारों के स्ट्रोक्स, रंगों के स्ट्रोक्स का गहन अध्ययन किया। इस विधा पर कई चित्र बनाए। आज यह अपने आप में एक चर्चित चित्रकारी का रूप ले चुकी है। प्रश्न:- लोक कला कहाँ से जन्मती है ? इसका उद्भव कहाँ से होता है ? डॉ.शेखर जोशी:- लोक कला को हमारे जनमानस की कला कहा जाता है। यह मानव की सृजनात्मक अभिव्यक्ति से जन्मती है। मानव ने अपने परिवेश को खूबसूरत बनाने के लिए मिट्टी से धरातल को लेपकर उपलब्ध रंगों से चित्रण किया है। यही लोक चित्रकला का उद्भव है। प्रश्न:- कुमाऊँ के परिप्रेक्ष्य में चित्रकला का विकासक्रम रहा है, उसे आप कैसे देखते हैं ? डॉ.शेखर जोशी:- कुमाऊँ के संदर्भ में यदि हम कहें तो यह बड़े सौभाग्य की बात है कि हमारे यहाँ प्रागैतिहासिक काल के चित्र भी दिखाई देते हैं। अल्मोड़ा में ही लखुउडियार इसका एक उदाहरण है। इसके अलावा ‘ऐपण’, ग्रामीण भित्तीय चित्रण, चिन्ह पत्रियों आदि की सजावट के लिए हुआ चित्रण भी यहाँ दिखता है। कुमाऊँ से गढ़वाल की ओर चलें तो वहाँ मौलाराम की चित्र परम्परा देखने को मिलती है, जिसे भारतीय चित्रकला के इतिहास में गढ़वाली कलम के नाम से जाना जाता है। प्रश्न:- गढ़वाल में जो मौलाराम की चित्रकला परम्परा, भारतीय चित्रकला की एक कलम के रूप में विकसित हुई, वैसी कोई कला परम्परा कुमाऊँ में क्यों नहीं दिखाई देती ? इसके पीछे आप क्या कारण मानते हैं? डॉ.शेखर जोशी:- हाँ, इस तरह से कोई कला परम्परा यहाँ नहीं दिखती है। अलबत्ता कुछ चित्र हमारे जी. बी. पन्त म्यूजियम अल्मोड़ा में संग्रहीत हैं, जिनसे हम कुमाऊँ की चित्रकला परम्परा को ढूँढ सकते हैं कि किस रूप में वह यहाँ पर विकसित हुई है। इस पर कार्य किए जाने की अत्यन्त आवश्यकता है। प्रश्न:- कुमाऊँ की लोक चित्रकला परम्परा आज किस रूप में मौजूद है ? डॉ.शेखर जोशी:- देखिए कुमाऊँ की लोकचित्र परम्परा की अपनी एक निश्चित पहचान है और सम्पूर्ण कला जगत में उसकी मान्यता भी है। ‘ऐपण’ प्रमुख रूप से यहाँ की लोक चित्र परम्परा है और अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ पूरे देश में परिचित है। प्रश्न:- ऐपण के बारे में यह कहा जाता है कि यह गुजरात और महाराष्ट्र से यहाँ आई हुई कला है? डॉ.शेखर जोशी:- यह कहा जा सकता है, क्योंकि यहाँ बसी हुई अधिकतम जातियाँ गुजरात और महाराष्ट्र आदि से ही यहाँ पर आइ हैं। तो वहाँ का प्रभाव यहाँ की लोकचित्र कला में भी स्वाभाविक रूप से ही आया होगा। लेकिन ऐपण कला के रूप में यहीं विकसित हुई है। अभी मैं उड़ीसा एक आर्टिस्ट कैंप में गया हुआ था, तो वहाँ पर मुझे ये जानकारी मिली कि वहाँ पर जनजातीय समूहों द्वारा बोली जाने वाली एक भाषा है ‘कुई’। हमारे गाँव का नाम भी ‘कुई’ ही है। संभवतः वहाँ से इसका कोई सम्बन्ध हो। मानव में भ्रमण की प्रवृत्ति बहुत पहले से रही है, जिससे सभ्यताओं व उनकी परम्पराओं का भी मिलाप हुआ है। इससे परस्पर सभ्यताओं, परम्पराओं, मान्यताओं आदि में एक-दूसरे का प्रभाव दिखाई देता है। प्रश्न:- अभी लोककला से कला की समग्र दुनिया की ओर लौटें तो आपका क्या मानना है कि कला जन्म कहाँ से लेती है ? डॉ.शेखर जोशी:- कला तो मानव के जन्म के साथ ही पैदा हो गई। किसी भी कार्य को सुन्दर ढंग से किया जाना ही कला है और मानव में तो ये प्रवृत्ति रही ही है। प्रश्न:- ‘कला कला के लिए’ और ‘कला समाज के लिए’ की जो बहस है उसी से उपजा एक सवाल मेरा है कि कला के सामाजिक उत्तरदायित्व क्या होने चाहिए ? उसके सरोकार क्या होने चाहिए ? डॉ.शेखर जोशी:- देखिए कला के सामाजिक उत्तरदायित्व ये होने चाहिए कि कला दूसरे को प्रसन्न कर सके और दर्शक के आनन्द में कलाकृतियाँ उत्तरोत्तर वृद्धि कर सकें। यही उसका सामाजिक सरोकार है। प्रश्न:- अभी कला जगत में अवचेतन कला का प्राधान्य आया है। इसे आप कैसे देखते हैं ? डॉ.शेखर जोशी:- मानव स्वभाव है कि वह जो अभिव्यक्तियाँ नहीं कर पाता, वे उसके अवचेतन मन में रहती हैं। लेकिन अवचेतन मन भी उन सारी मानसिक स्थितियों को अवसर मिलने पर अभिव्यक्त करता है। इसका जरिया कला होती है। यही अवचेतन कला है। इसमें मूर्तता और अमूर्तता का एक अद्भुत् खेल है। कलाकार या तो मूर्तता से अमूर्तता की ओर जाता है या फिर अमूर्तता से मूर्तता की ओर। यदि कलाकार अमूर्त में पहले आता है तो उसे धीरे-धीरे मूर्त की ओर जाना है और यदि पहले मूर्तता को कलाकार ने पकड़ा है तो वह उसे अमूर्तता की ओर ले चलेगी। मूर्तता और अमूर्तता के बीच के द्वन्द्व से प्रत्येक कलाकार गुजरता है। वह चाहे जहाँ से भी शुरू करे उसके दोनों कोनों को वह पकड़ता है। यही आनन्द की अनुभूति है।
एम.एफ. हुसैन : लगभग शताब्दी भर के कैनवास में पसरा जीवन
Wednesday, February 06, 2013 2:23:24 PM
रोहित
हुसैन की जिन वजहों से आलोचना होनी चाहिए, वह ‘इतर विवादों’ और व्यक्ति पूजक सामंती मूल्यों के आधार पर उन्हें तकरीबन द्वंद्व से परे विलक्षण प्रतिभा मान लेने के कारण छूटी रही है जबकि वहीं उनकी भत्र्सना जिन सांप्रदायिक, रूढि़वादी वजहों से हुई, वे हुसैन के कला कर्म की काबिल-ए-तारीफ जगहें थी। त करीबन एक शताब्दी का सक्रिय जीवन जीने के बाद मकबूल फिदा हुसैन अब नहीं रहे। हुसैन का पूरा जीवन एक फंतासी की तरह रहा है। 95 वर्षों के लम्बे जीवन की शुरुवात में तंगहाली, तरूणाई में ऊर्जा, जवानी में संघर्ष, अधेड़ उम्र में बेहद सफलता, आखिरी वर्षों में उनकी कलाकृतियों पर हुए विवादों के बाद देश से अघोषित निष्कासन, फिर नागरिकता का त्याग और अंत में देश के बाहर ही मौत, इस सब में एक रोचक ट्रैजिक कहानी है। हुसैन की ट्रैजिक कहानी के अंत से शुरुवात करते हैं। प्रगतिशीलता और साम्प्रदायिक सद्भाव के जिन मूल्यों पर वह ताउम्र सृजन करते रहे, जीवन के आखिरी चरण में न सिर्फ दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों की ओर से हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप उन पर लगे बल्कि प्रगतिशील हलकों से भी छिटपुट ही सही पर इस मसले पर उनकी आलोचना ही सुनाई दी। हुसैन पर एक के बाद एक हजार से ज्यादा केस देश भर में अलग-अलग थानों में दर्ज किए गए। हिन्दू कट्टरपंथियों द्वारा उन्हें जान से मारने के फतवे जारी हुए। इस सबसे उकता कर हुसैन देश छोड़कर चले गए। हालांकि कई कलाकार संगठन और प्रगतिशील सामाजिक/राजनीतिक कार्यकर्ता उनके समर्थन में भी आए। लेकिन 2006 से छिड़े इस विवाद और अपने निर्वासन के बाद, कतर के अरबपति कलाप्रेमी शेख (जो कि अनपेक्षित कीमतों में कलाकृतियां और कई बार तो गैलरियों को ही खरीद लेने के लिए प्रसिद्ध है) के आमंत्रण पर उन्होंने अपने जीवन के आखिरी साल में कतर की नागरिकता स्वीकार ली। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर उसके एक कलाकार का खामोश तमाचा था। जिसकी गूंज, अब देश के बाहर ही हुई उसकी मृत्यु ने स्थाई कर दी है। हुसैन का न रहना बेशक भारतीय कला जगत् की एक अपूर्णीय क्षति है। विगत् 7-8 दशकों में हुसैन का रचनाकर्म भारतीय चित्रकला को समृद्ध करता गया है। हुसैन इसे एक नए दौर से परिचित कराते हैं। बंगाल स्कूल की परम्परा से आगे बढ़ने में भारतीय चित्रकला के लिए हुसैन एक महत्वपूर्ण चितेरे थे। यहां के जन-मानस में रची-बसी रामायण और महाभारत की महाकाव्य परम्पराओं पर अपनी कूची फिराने का महत्वपूर्ण काम कर हुसैन ने भारतीय चित्रकला को समृद्ध किया। हुसैन की समकालीन सामाजिक, राजनैतिक, और सांस्कृतिक परिस्थितियों पर भी निरंतर नजर थी। फैज, राममनोहर लोहिया, यामिनी रॉय, मदर टेरेसा, और सत्यजीत राॅय आदि पर उनकी कलाकृतियां महत्वपूर्ण रही हैं। 1948 में प्रगतिशील कलाकार संघ की स्थापना में हुसैन, सूजा और अन्य चित्रकारों के साथ मुख्य भूमिका में थे। 60 के दशक में राममनोहर लोहिया के संपर्क में आने से हुसैन को सृजन की एक नई दृष्टि मिली। लोहिया ने अपने राजनीतिक एक्टिविज़्म के दौरान देशभर में रामलीलाओं के मंचन को भी अपना जरिया बनाया था। हुसैन भी इसी से रामायण और महाभारत पर बनाई अपनी चित्रश्रंखला के लिए प्रेरित हुए। इंद्रागांधी को दुर्गा की तरह चित्रित करने सरीखे कई अन्य उदाहरण भी हंै जिसमें हुसैन की कला में विचलन भी दिखाई देता है। हुसैन की जिन वजहों से आलोचना होनी चाहिए, वह ‘इतर विवादों’ और व्यक्ति पूजक सामंती मूल्यों के आधार पर उन्हें तकरीबन द्वंद्व से परे विलक्षण प्रतिभा मान लेने के कारण छूटी रही है जबकि वहीं उनकी भत्र्सना जिन सांप्रदायिक, रूढि़वादी वजहों से हुई, वे हुसैन के कला कर्म की काबिल-ए-तारीफ जगहें थी। हुसैन की आलोचना के लिए सबसे मुकम्मल बात है कि इस महत्वपूर्ण कलाकार की चित्रकला को तकरीबन पिछले आधे दशक में लोगों ने उसके रंगों, आकारों की महत्ता से इतर केवल लगातार पुतते कैनवासों की उत्तरोत्तर बेतहाशा कीमतों के जरिए जाना है। भारत में हुसैन ही वह पहले चित्रकार रहे हैं जिन्होंने अपनी एक पेंटिंग के लिए एक लाख रूपये की मांग की थी। इसके बाद 1986 में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की 150वीं वर्षगांठ में पहली बार उनकी सफदर पर बनी एक कृति दस लाख की कीमत को छू सकी। इसके बाद हुसैन पेंटिंग बिक सकने की कीमतों के करिश्माई आकड़ों को छूते हुए लगातार सबसे महंगे कलाकार बने रहे और इसी क्रम में हुसैन ने 1 करोड़ का आकड़ा भी छू लिया। ऐसे में मूलतः भारतीय जनमानस में हुसैन एक महत्वपूर्ण चित्रकार होने के बजाय एक करिश्माई कला व्यवसायी अधिक रहे हैं। जिन्हें महान चित्रकार कहा/समझा जाता रहा है। यह बात कहने का आशय यह कतई नहीं है कि हुसैन महत्वपूर्ण चित्रकार नहीं हैं। कोई भी कलाकार अपने परिवेश से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होता। उसका पूरा निर्माण समाज के भीतर के द्वंद्वों और परिस्थितियों से ही होता है। यहीं वह अपने रचनाकर्म की पृष्टभूमि बनाता है और उसके सृजन में भी यही सब परावर्तित होता है। पिछली डेढ़-दो सदी में कलाऐं सीधे ही राजनीतिक आंदोलनों से प्रेरित रही हैं। यहीं कलाओं के जनसरोकारों की बहस भी जन्मीं हैं और कलाकारांे से सामाजिक उत्तरदायित्व की अपेक्षा भी। हुसैन भी इस अपेक्षा से परे नहीं हैं। हुसैन अपने जीवन के शुरुवाती दौर में ही अभावग्रस्तता के चलते इस अपेक्षा से परिचित हो गए थे। प्रगतिशील आर्टिस्ट ग्रुप की स्थापना और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों से उनका जुड़ाव इसी से संभव हो पाया। लेकिन हुसैन के जीवन मे इसके बाद एक अद्भुत् मोड़ है जो जनपक्षधरता के प्रतिभाशाली लोगों को बाजार द्वारा कब्जा कर सिलिब्रिटी बना देने का सबसे बड़ा उदाहरण है। हुसैन की एक और बड़ी आलोचना यह है कि वह उस दौर में देश के महान और सबसे महंगे चित्रकार रहे हैं जिस दौर में देश के कई चित्रकारों के ब्रश, रंगों और कैनवास के अभाव में सूखे और बांझ पड़े हुए हैं। हुसैन और इस तरह के कलाकारों के जीवन और सृजनकर्म के कंट्रास्ट को प्रतिभा नहीं जब्कि बाजार तय कर रहा है। इस बाजार को कुछ सैलिब्रिटीज चाहिए और बाकी बचे लोगों के, आश्चर्य से उसे ताकते और उसके सपनों में जीते चेहरे। बाजार की ताकतें कई बार कलाकारों को इस कदर प्रभावित करती हैं कि वह प्रतिरोध की धाराओं से परिचित होने के बावजूद भी अक्सर मुख्यधाराओं में बहे चले जाते हैं। हुसैन का मसला भी यही है।
चित्रों में, सिंधु घाटी से हुसैन तक, अश्लिीलता नहीं है नग्नता के मायने।
Wednesday, February 06, 2013 2:09:00 PM
रोहित
-अशोक भौमिक (प्रतिनिधि चित्रकार एम0 एफ0 हुसैन के हिन्दू धर्म के देवी देवताओं पर चित्रांकन ने लम्बे समय से एक विवाद को जन्म दिया है। इसी विवाद के चलते हुसैन पर एक हजार से ज्यादा मामले हिन्दू धर्म की आस्थाओं को ठेस पहुचाने के नाम पर दर्ज किए गऐ। तमाम जानलेवा धमकियों के चलते हुसैन अब तक भारत से बाहर रह रहे हैं। पिछले दिनों हुसैन द्वारा कतर की नागरिकता ले लेने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कला की मर्यादाओं और भारतीय लोकतंत्र की असलियत सरीखी तमाम बातों पर बहस छिड़ पड़ी हैं। क्यूंकि भारतीय चित्रकला का साधारण सा विद्यार्थी भी ‘कला में नग्नता’ और ‘अश्लीलता’ के अन्तर को समझ सकता है। इस लिए इस बात के लिए हुसैन के पक्ष में बड़ी दलीलों की जरूरत नहीं है। लेकिन फिर भी कई कला के नासमझ और राजनीति के विद्वान मस्तिस्कों को इस बात को समझाने के लिए वरिष्ठ चित्रकार और कथाकार ‘अशोक भौमिक’ का बया में प्रकाषित यह आलेख, मैं http://mohallalive.com से लेकर साभार प्रकाशित कर रहा हूं। आशा है कि चित्रकला में रूचि रखने वाले अन्य लोगों को भी यह आलेख महत्वपूर्ण लगेगा...... -मॉडरेटर) -अशोक भौमिक चित्र 1, सातवाहन, आंध्र चित्र 2, नर्तकी, सिंधु घाटी (2005 ईपू) चित्र 3, आरंभिक लोक मूर्तिकला के नमूने चित्र 4, लौरिया नंदनगढ़ की देवी मूर्ति (1300 ईपू) चित्र 5, मौर्यकालीन यक्षी, दीदारगंज (300 ईपू) चित्र 6, गांधार कला का नमूना (200-100 ईपू) चित्र 7, यक्षी चित्र 8, शुंगकालीन शालभंजिका (184 से 72 ईपू) चित्र 9, गौतम बुद्ध का जन्म चित्र 10, अंदमान की आदिवासी नारी (21वीं सदी) चित्र 11, बस्तर की आदिवासी नारी (21वीं सदी) चित्र 12, एमएफ हुसैन, पार्वती चित्र 13, एमएफ हुसैन, हनुमान और रावण चित्र 14, एमएफ हुसैन, द्रौपदी चित्र 15, एमएफ हुसैन सरस्वती चित्र 18, नायिका गांधार, 200 ईप चित्र 16, एमएफ हुसैन, लक्ष्मी चित्र 20, कुबेर, लक्ष्मी, हराती। मथुरा-कुषाण 100 ई चित्र 17, एमएफ हुसैन, दुर्गा चित्र 19, नारी मूर्ति। मथुरा-कुषाण 100 ई चित्र 21, भारतमाता कैलेंडर चित्र चित्र 22, एमएफ हुसैन, भारतमाता आ ज हम ऐसे समय में जी रहे हैं कि जहां कई बार वर्तमान को सिद्ध करने के लिए हमें अतीत के संदर्भों को परखने की आवश्यकता होती है। हम जानते हैं कि भारतीय कला के एक बड़े हिस्से का विकास मिथकों, धार्मिक प्रतीकों के आधारंपर निश्चय ही हुआ पर इससे भी महत्वपूर्ण सत्य यह है कि ऐसी महान उत्कृष्ट कला का विकास जिन कलाकारों द्वारा हुआ, उनमें परिवेश, समाज, सौन्दर्य बोध, स्वीकार और निषेध के बीच का संघर्ष आदि का सुस्पष्ट प्रभाव था। और इसीलिए हमें आश्चर्य नहीं होता, जब हम पाते हैं कि सदियों से कलाकार अपनी सृजनशीलता, स्वाधीनता और स्वायत्तता को आधार मानकर कला की ऐसी चुनौतियों को स्वीकार करने में समर्थ रहा है, जहां वह देवी-देवताओं के रूप की परिकल्पना कर, उसे उनकी अवधारणा और मिथकों से जोड़ते हुए और उनकी मूर्ति तक गढ़ने में सफल होता है। कल्पना कीजिए कि ब्रह्मांड के रचयिता की मूर्ति तक की रचना, भारतीय कला में एक कलाकार अनायास ही, बिना किसी जटिलता के कर डालता है। प्रख्यात कला समीक्षक आर्नल्ड हाउजर ने कहा है कि “कला-निर्माण के पहले कलाकार का निर्माण होता है।” और कि एक कलाकार अपने हर कलाकर्म के साथ प्रवीण होता रहता है। कला के विकास क्रम में कला और कलाकार के बीच की यह द्वंद्वात्मकता, निरंतरंप्रवहमान रही है। चूंकि एक कलाकार की रचना में उसके अतीत, वर्तमान के साथ-साथ उसके वैचारिक संघर्ष का और उसके सामाजिक, सांस्कृतिक अवधारणाओं का प्रभाव अवश्य रहता है। लिहाजा यहां यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि कला एक कलाकार की कृति होते हुए भी उसके समाज के विभिन्न लक्षणों औरंप्रवृत्तियों के स्वीकारों और बहिष्कारों का दस्तावेज भी होता है। किसी राजा के सिंहासन पर बैठने या उसके साम्राज्य के पतन से कलाधारा बदल नहीं जाया करती है। बल्कि इसकी निरंतरता, इसकी स्वयत्तता को रेखांकित करती है। जो लोग कला से कला की निरपेक्षता की मांग करते हुए एक अराजनैतिक कला की पक्षधरता की बात करते हैं वे दरअसल सामाजिक परिस्थितियों के परिपेक्ष में ही निर्वाक या तटस्थता की पैरवी करते हैं। और सतही तौरंपर निरीह और कलावादी लगने वाली यह स्थिति कभी भी अराजनैतिक नहीं होती। मैंने यहां इसका उल्लेख इसलिए किया कि प्राय: चित्रकार को हम उसे समाज से विच्छिन्न एक विशिष्ट प्राणी का दर्जा दे देते हैं जो वास्तव में एक असंभव सी परिकल्पना है। हजारों वर्षों की भारतीय कला परंपरा में चित्रकला अपने समाज या अन्य कलाओं से कटकर विकसित नहीं हुई। अन्य सभी कलाओं की तरह यह भी समाज और समय के साक्षी बनकर अतीत की कथाओं, अवधारणाओं और मिथकों का प्रतिनिधित्व करती रही है। इसलिए चित्रकला परंपरा में मिथकों को चिन्हित करना दरअसल हमारे साहित्य एवं अन्य कलाओं पर मिथकों के प्रभाव को तलाशना है। धर्म से लेकर इतिहास की रचना प्रक्रिया में कला का एक स्वतंत्र महत्व है। पृथ्वी का कोई धर्म शुद्ध इतिहास नहीं है या घटनाओं का प्रामाणिक गजट भी नहीं है। ये सभी रचित हैं। कलाकारों की रचनाएं हैं। हालांकि धर्मांध और कठमुल्लों के लिए यह सच आसानी से पचाना संभव नहीं है। वे यही कहेंगे कि ऐसी रचनाओं का आधार सत्य होता है, या फिर ये सब कोरी कल्पनाएं नहीं हैं। अपनी गजब कल्पनाशील दलीलों से वे धार्मिक कथाओं को इतिहासम्मान लेते हैं, पर बावजूद इसके सभी धार्मिक ग्रंथ निर्विवाद रूप से साहित्य कला के उदाहरण हैं। जैसे धर्म पर आधारित कलाएं – भित्तिचित्र और मूर्तियां, चित्र तथा मूर्तिकला के उदाहरण हैं। ठीक वैसे ही मंदिर, मस्जिद, गिर्जा, स्तूप आदि वास्तुकला के निदर्शन हैं। यहां अगर ये स्वीकारा जाए कि समाज निर्माण में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तो इसके साथ यह भी मानना पड़ेगा कि धर्म और समाज निर्माण में कला की एक रचनात्मक भूमिका रही है। चूंकि ऐसी स्थिति में जहां कलाकार का अस्तित्व इतना स्पष्ट हो वहां रचनाशीलता, प्रयोगधर्मिता और गतिमयता की उपस्थिति निश्चय ही होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय कला में निहित है। इन कलाकारों की महत्वपूर्ण उपस्थिति ने ही भारतीय कला में संशय (Confusion) और अज्ञानता (Ignorance) में से संशय को आधार मानकर अपनी अवधारणाओं को निर्विवाद समझकर, उसे प्रश्नों के दायरे के बाहर नहीं रखा। और इसलिए भारतीय कला विकास के कालक्रम में मिथकों में व्यापक परिवर्तन होते हुए देख पाते हैं। हम देवी-देवताओं और नायकों के चित्रण में एक अद्भुत वैविध्य से परिचित होते हैं। यहां उल्लेख करना उचित होगा, जहां एक ओर भारतीय कला निरंतर बाहरी प्रभावों को ग्रहण कर अपनी कला को समृद्ध करती है वहीं अपने समाज के प्रति एक जिम्मेदार भूमिका भी निभायी है। इस जिम्मेदारी को हालांकि कई बार धर्मप्रचार, राजाओं के गुणगान और मिथकों के निर्माण के रूप में देख सकते हैं, पर इसके अलावा भी एक महत्वपूर्ण दर्शन या विचारधारा के लोकहित चेष्टाओं को सफल बनाने में साहित्य से अधिक कारगर होते हुए पाते हैं। पर साहित्य को आधार मानकर मनोरंजन के उद्देश्य लिए विकसित, भारतीय कला की भी एक लंबी परंपरा रही है। इस प्रकार भारतीय कला परंपरा एक उदार, संकीर्णता रहित निर्भीक कलाकर्म की निरंतर विकास के इतिहास की परंपरा रही है। भारतीय कला में धर्म मिथक के बारे में विस्तार से व्याख्या लगभग असंभव-सा जान पड़ता है क्योंकि इसकी व्याप्ति सात-आठ हजार वर्षों और एक विशाल इलाके में फैली सभ्यता की देन है। पर इस विशाल कला परंपरा के कुछ पहलुओं को छूने की कोशिश अवश्य ही की जा सकती है। भारतीय कला को लेकर जो सबसे बड़ी आपत्ति विदेशियों की रही है – वो एक लंबे समय से नग्नता की विभिन्न अवधारणाओं के इर्द-गिर्द ही बनी रही है। इधर के दिनों में एक प्रचलन विदेशों में दिखाई दे रहा है, जहां भारतीय देवी-देवताओं को यानी कि भारतीय कलाकारों की रचनाओं का अद्भुत ढंग से विश्लेषण किया जा रहा है। जैसे गणेश जी को लें। यह भारतीय कला की रचनाशीलता की एक नायाब मिसाल है। स्थूलकाय मानव शरीर और सिर हाथी का! गणेश की एक फ्रॉयडियन व्याख्या अभी सामने आयी है कि गणेश का सूंढ़ उनके लिंग शैथिल्य का प्रतिनिधित्व करता है और मोदक नामक मिष्टान्न के प्रति उनकी अतिशय रुचि उनकी इडिपस ग्रंथि और अन्य अस्वाभाविक यौनप्रवृत्तियों के लक्षण हैं। इन सब व्याख्याओं के बारे में बातचीत हमें गैरजरूरी लगता है, क्योंकि अपने विचारों के वर्चस्व की कोशिश में (छद्म) बुद्धिजीवियों के ऐसे उदगारों को पिछले कई दशकों से हमने नये-नये रूपों में देखा है। इन दिनों अपने इतिहास और परंपरा से अभिन्न रूप से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण अवधारणाओं की (सतही) आलोचना करना, प्रगतिशील विचारक बनने का एक सहज और लगभग स्वीकृत रास्ता बन चुका है। और चौंकानेवाली स्थापनाओं की अनिवार्य उपस्थिति जहां गौरतलब है, वहीं यह भी सच है कि ऐसे विचार प्राय: स्वल्पायु के ही रहे हैं। पर हां, नग्नता के बारे में भारतीय विचार निश्चय ही पश्चिमी अवधारणाओं से भिन्न है। गुलामी के लंबे इतिहास में नग्नता के बारे में हमारे अपने विचारों को पश्चिमी विचारों ने काफी हद तक प्रभावित किया है। और भारतीय चित्रकला की अधूरी समझ और कभी-कभी निहित स्वार्थों के चलते अश्लील चिन्हित कर कटघरे में खड़ा किया जाता रहा है। भारतीय चित्रकला में अनावरण, अनावृत्त और नग्नता के बीच में सुस्पष्ट भेद है। वेदों में काली को महामही के साथ-साथ महानग्नी भी कहा गया है। भारतीय कला में उन्नत वक्ष और योनी को एक लंबे समय से अनावृत्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। मातृ छवि, यक्षी और तमाम देवियों के साथ-साथ आम नारी एवं परिचारिकाओं के चित्रण में इस सत्य की व्यापक उपस्थिति है। जैसा पहले ही कहा गया है, कि भारतीय कलाकारों में एक कुंठारहित स्वायत्तता की तलाश रही है जिसके चलते वे धार्मिक अवधारणाओं पर निरंतर प्रश्न उठाते रहे हैं। नारी चित्रण में उन्होंने नारी को उर्वरता और सृष्टि का आधार माना है और इसीलिए मूर्तियों में स्तन, योनी का प्रदर्शन एक प्रतीक के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है। यहां इसे किसी नारी विशेष की देह संरचना की शुद्ध अनुकृति मान लेने से भारतीय चित्रकला परंपरा के बारे में हमारी समझ न केवल अधूरी रह जाएगी बल्कि इसमें विकृतियों की स भावनाएं भी बढ़ जाएंगी। कला इतिहास में प्रतीकों के उपयोगों को प्राय: जटिल विषय को सरल बनाने के उद्देश्य से किये गये असफल प्रयासों के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय कला इतिहास भी ऐसी जटिलताओं से मुक्त नहीं है। अत्यंत सरल लगनेवाले शिवलिंग एक जटिल अवधारणा को सरल रूप से प्रस्तुत करने का असफल प्रयास सा लगता है। अत्यंत निरीह-सा लगने वाला स्वास्तिक हिटलर के राष्ट्रवाद की जटिल संकीर्णताओं को समझने के लिए पर्याप्त नहीं। शालभंजिका के बारे में एक मिथक यह है कि गौतम बुद्ध की मां माया जब गर्भवती थीं तब उन्होंने शालवन में जाने की इच्छा प्रकट की थी। शाल वृक्ष की टहनी को स्पर्श करते ही उन्हें प्रसव पीड़ा का आभास हुआ। बुद्ध-जन्म के साथ जुड़ी इस घटना का व्यापक चित्रण भारतीय कला के विभिन्न कालों में देखा जा सकता है। दूसरे रूप में शालभंजिका की अवधारणा यह है कि बिना फल फूलों वाले वृक्ष को यदि कोई नारी स्पर्श या आलिंगन करे तो वह वृक्ष फलवती हो उठता है। दोनों अवधारणाओं पर आधारित असंख्य मूर्तियां भारतीय कला के हजारों साल के लंबे इतिहास क्रम में उपस्थित हैं। देवी-देवताओं के रूप और उनके बारे में अवधारणाएं भी समय के साथ-साथ बदली हैं। सुरों और असुरों द्वारा पूजित देवी-देवताओं के बीच के अंतर का लुप्त होने के प्रभाव को भी भारतीय चित्रकला परंपरा में देखा जा सकता है। यह धर्म या मिथक को जड़ न मान लेने से ही संभव हो सका है। लक्ष्मी जहां सुंदरता की देवी थी बाद में धन और सौभाग्य की देवी के रूप में उसकी रचना की गयी। बौद्ध धर्म के प्रचार में कला की न केवल एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है, साथ ही कला विकास में बौद्ध जातक कथाओं, साहित्यिक कृतियों और अवधारणाओं का अपना महत्व रहा है। भारतीय कला का लंबा इतिहास महज धर्म और मिथकों के सहारे ही आगे नहीं बढ़ा है। इसने कला, कहानी, नाट्यकथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं का चित्रण करते हुए अशिक्षित जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकारा भी है। सातवाहन काल के अमरावती स्तूप में अंकित इस कलाकृति को देखें, मानो दर्शक बन कर हम दो हजार वर्ष पूर्व के किसी नाटक को देख रहे हैं (चित्र 1, सातवाहन, आंध्र)। उदाहरण के रूप में उड़ीसा के रानी गुंफा और हाथी गुंफा की दीवारों पर उत्कीर्ण कलाकृतियों का उल्लेख किया जा सकता है। लगभग एक सौ ईसा पूर्व बनाये गये इन कलाकृतियों में दुष्यंत-शकुंतला, कथा स्त्री अपहरण आदि प्रसंगों के साथ-साथ भारतीय साहित्य के कुछ प्रमुख नाट्यकथाओं का वर्णन है। जहां उदयन, वासवदत्ता, वसन्तक आदि चरित्रों की उपस्थिति को आज भी हम पहचान सकते हैं। चित्र या मूर्तिकला के साथ साहित्य व अन्य कलाओं का एक नायाब रिश्ता भारतीय कला को अपनी पहचान अवश्य देता है। इस संदर्भ में भारतीय कला इतिहास में शायद सबसे महत्वपूर्ण मूर्ति का जिक्र करना उचित होगा, (चित्र 2) सिंधुघाटी सभ्यता के समय की कला के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में हम एक नर्तकी की मूर्ति को पाते हैं। यहां गौर करें कि यह मूर्ति किसी देवी की नहीं है, यह मूर्ति एक नर्तकी की है जो नृत्यकला को प्रस्तुत कर रही है – जहां ताल है, संगीत है, कविता है, यानी साहित्य है। साथ ही इस मूर्ति को गौर से देखें तो यह मूर्ति बहुअलंकृत है। यह अनावृत्त है। नग्न है। पर इसमें नग्नता नहीं है। यह मूर्ति नग्नता के बारे में भारतीय कला की अवधारणा को निश्चय ही एक सुस्पष्ट आधार देती है। पश्चिम के लोगों की अवधारणा या उनसे प्रभावित लोगों की अवधारणा से यह भिन्न है। सिंधुघाटी सभ्यता की यह मूर्ति 2500 साल ईसा पूर्व की है। अर्थात , आज से 4500 वर्ष पहले की कला! 4500 वर्ष पहले की कला की समझ! 4500 साल पहले के कलाकार की अभिव्यक्ति! हमने भारतीय कला परंपरा में धर्म और मिथक के साथ-साथ आम नारियों के चित्रण और नाट्यकथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं के चित्रण का जिक्र किया। मोहनजोदड़ो की नर्तकी किसी राज्याश्रित कला का प्रतिनिधित्व करती है या नहीं, यहां इसकी विवेचना महत्वपूर्ण नहीं है पर भारतीय कला इतिहास में लोककला का भी अपना एक स्वतंत्र इतिहास है। संरक्षण के अभाव से इसके इतिहास की कड़ियां विच्छिन्न अवश्य है पर इसकी रचनाशीलता के बारे में कोई संदेह नहीं है। यहां (चित्र 3) में ऐसे ही कुछ लोक कला के उदाहरण प्रस्तुत हैं जो तक्षशिला, वैशाली और राजघाट से प्राप्त हुए हैं। आश्चर्य की बात ये है कि मोहनजोदड़ो की नर्तकी जैसी ये मूर्तियां भी अनावृत्त हैं। इसके साथ यदि हम लौरिया नंदनगढ़ (चित्र 4) से प्राप्त मूर्ति को देखें जो 1600 से 1300 ईसा पूर्व के बीच बनायी गयी थी वह भी आश्चर्यजनक रूप से मोहनजोदड़ो नर्तकी जैसी ही अनावृत्ता है। तक्षशिला वैशाली राजघाट की मूर्तियां भारतीय लोककला के आरंभिक कृतियों में से हैं, जो नग्नता के बारे में भारतीय कला की अवधारणा को एक व्यापक सामाजिक स्वीकृति के साथ जोड़ते हैं। यक्षी को भारतीय कला इतिहास में विभिन्न काल में विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया गया है। प्राय: सभी यक्षी मूर्तियों के वक्ष जहां अनावृत्त हैं, वहीं विविध वस्त्र के प्रचलन का प्रमाण भी इन्हीं यक्षियों से मिलता है। 300 ईसा पूर्व बनी दीदारगंज की मौर्यकालीन यक्षी (चित्र 5) भारतीय कला ही नहीं विश्वकला के सुंदरतम नमूनों में से एक है। (इस यक्षी के अनावरण की भव्यता हमें सहज ही वीनस-डे-मेलो की याद दिलाती है।) बहरहाल, अपनी बात को और भी स्पष्ट करने की कोशिश में देवी-देवताओं के चित्रण से हटकर, भारतीय कला में अनावरण की अवधारणा को और भी पुष्ट करती हुई गांधार कला के कुछ नमूनों पर यदि हम गौर करें, तो हमें अपनी ओर से कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं रह जाती (चित्र 6)। ये सब 200 से 100 ईसा पूर्व के हैं। शुंग काल की यक्षी और नारी मूर्तियों में ऐसी रचनाशीलता की अद्भुत निरंतरता सहज ही दिखाई देगी। (चित्र 8) इससे यह स्पष्ट है कि जिस रचनाशीलता में नारी, उर्वरता और सृष्टि के मूल सूत्र के रूप में प्रतिबिंबित है, वहीं नारी के प्रति सम्मान भी अभिन्न रूप से जुड़ा रहा है। हजारों वर्षों के अंतराल के बाद भी ऐसी अवधारणा के प्रति भारतीय कलाकारों का विश्वास अटूट एवं प्रवहमान है – ऐसा मान लेना कठिन नहीं है। मानव विकास के इतिहास क्रम में हम पाते हैं कि जिसभ्यात्रा की शुरुआत, मनुष्य ने अपने और अपने परिवेश के बीच के अंतर्संबंधों को जानने से शुरू की थी वह आगे चलकर विवेक और तर्क को न केवल अपने परिवेश को बल्कि अपने अतीत को भी जांचने का जरिया बनाया। जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे आधुनिक समाज, उन्नत समाज व्यवस्था के चलते असंख्य खेमों में विभाजित है। अमीर-गरीब, गोरे-काले, उच्चवर्ण-नि नवर्ण, शिक्षित-अशिक्षित, हिंदू-मुसलमान, स्त्री-पुरुष के अलावा विभाजन के असंख्य रूपों से हम परिचित हैं। किसी समाज में कला भी कई मायने में विभाजित होती है। उसी समाज में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसे लोगों का होता है जिनका कला से या कलाकार के सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं होता। यह तो सच है कि समाज में जीने वाला हर व्यक्ति का कला के प्रति समान रूप से जागरूक होना कतई संभव नहीं है। पर स्थिति कभी-कभी ऐसी बन आती है कि जब खास लोगों का एक समूह अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कला के तमाम पहलुओं पर निर्वाध अपनी राय देने लगते हैं। हालांकि यह अपवाद ही है – नियम कतई नहीं। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक जटिल रूप है। कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कलाकार को है, वहीं कला के बारे में अपनी राय देने का अधिकार दूसरों को भी है। पर कठिनाई ये है कि जिन लोगों का कला से कुछ भी लेना-देना नहीं, वे कला को जानने-समझने की कोशिश करने के बजाए उसका अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए मूर्खतापूर्ण विरोध करते हैं। यह स्थिति किसी भी हालत में किसी समाज में मान्य नहीं हो सकती। जैसा कि हमने तमाम उदाहरणों की जांच-पड़ताल के माध्यम से भारतीय कला में अनावरण या नग्नता की भारतीय अवधारणा को समझने की कोशिश की। उसी को आगे बढ़ाते हुए हम पाते हैं कि इस अवधारणा पर दो बातों का स्पष्ट प्रभाव है। एक , यह कि भूमध्य रेखा के आसपास विकसित हुए इस सभ्यता में वस्त्रों के आविष्कार के बाद भी तन ढंकने का प्राकृतिक कारण किसी ठंडे प्रदेश से निश्चय ही कम था और है। पर क्या यहां यह मान लिया जाए कि सिंधु घाटी की कला से लेकर आधुनिक कला में प्रतिबिंबित नारी जाड़ों के मौसम में भी अनावृत्त रहती थी? स्वभाविक रूप से यह कल्पना असंभव है! पर कलाकार की रचना का एक सार्थक आधार, मानव देह संरचना (Human anatomy) से भारतीय कलाकार का परिचय निश्चय ही सघन था। यहां उदाहरण के तौर पर आधुनिक काल में भी बस्तर (चित्र 11) और अंदमान (चित्र 10) की कई आदिवासी जातियों में नग्नता की अवधारणा वह नहीं है जो हमारे अन्य ग्रामीण या शहरी इलाकों में रहनेवाले लोगों की है। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि भारतीय कला 4500 हजार वर्ष पहले से लेकर अब तक कोरे प्रकृति चित्रण से हटकर एक कल्पनाश्रित कला रही है। और इसीलिए इन समस्त मूर्तियों की तथाकथित नग्नता, नारी शरीर का शुद्ध प्रतिबिंबन नहीं है बल्कि इसका आधार, कुंठारहित, स्वाधीन और रचनाशील कलाकारों की कल्पना है। और ऐसी कल्पनाशीलता भारत में सदियों से कलाकारों के लिए प्राथमिकता रही है। भारतीय कला इतिहास के इन स्वर्णिम पृष्ठों को पलटते हुए हम आज के विषय के दूसरे हिस्से तक आ पहुंचे हैं जहां राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए कलाकार की रचनाशीलता को निशाना बनाया जा रहा है। पिछले दिनों बार-बार मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों को लेकर विवादों का तूफान उठता रहा है। उन पर आरोप रहा है कि उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं का चित्रण नग्न और अश्लील ढंग से किया है। कई दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों के समर्थकों ने उनके स्टूडियो पर हमला किया और प्रदर्शनियों से उनके चित्रों को हटाने के लिए मजबूर किया। हुसैन आजादी के बाद के भारतीय कलाकारों में सबसे महत्वपूर्ण कलाकारों में से एक हैं। उन्होंने आधुनिक भारतीय कला को एक सुस्पष्ट दिशा दी है जो दुर्भाग्य से पिछले चार दशकों से विकसित होते बाजारवाद के अंधेरे में आम जनता के लिए लगभग ओझल ही रही है। कलाप्रेमियों के लिए भी उनके चित्रों को मूलरूप से देख पाना निरंतर अस भव सा होता रहा है। “कल्पनां पत्रिका और असंख्य साहित्यिक कृतियों के आवरणों पर हुसैन कभी-कभार दिखाई देते थे। पर वहां भी अब खामोशी है। एक ऐसी लंबी खामोशी के बाद अचानक हुसैन के चित्र आम लोगों की चर्चा के केंद्र में आ गये हैं। और वे लोग जो युवा कलाप्रेमी हैं, हुसैन के इस विवादग्रस्त चेहरे से ही परिचित हो पा रहे हैं। बहरहाल, पिछले कई दशकों से समाज का बड़ा वर्ग हुसैन को उनके चित्रों की विशिष्टता के लिए नहीं, बल्कि लाख से दस लाख, दस लाख से करोड़ तक की कीमतों के लगभग तिलिस्म-सी लगने वाली व्यावसायिक सफलताओं की कथाओं के लिए जानता रहा है। किसी भी कलाकार के लिए खासकर समकालीन भारतीय कला के एक ऐसे विशिष्ट कलाकार के लिए निश्चय ही यह दुर्भाग्यजनक स्थिति है। यहां उल्लेखनीय है कि भारत में समकालीन चित्रकारों में अपने चित्रों के लिए एक लाख रुपये की मांग करनेवाले हुसैन ही पहले चित्रकार रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की 150वीं वर्षगांठ (1986) पर आयोजित नीलामी में हुसैन का एक चित्र (जो पूंजीवाद के विरोध में समर्पित रंगकर्मी सफदर हाशमी की शहादत पर आधारित था) पहली बार भारतीय समकालीन किसी भी कलाकृति की कीमत के दस लाख की सीमा को छू सका था। इससे लगभग 15 वर्ष बाद ही उनके चित्र एक करोड़ रुपये की सीमा को छू कर अब वे पांच और दस करोड़ के गंतव्य की ओर गतिमान है। ऐसे कला से विच्छिन्न विषय और उनसे जुड़े आंकड़ों से पाठकों का परिचय करना दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि हम यहां हुसैन जैसे महान चित्रकार के पिछले बीस वर्षों की अवधि में बने दस महत्वपूर्ण चित्र भी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हैं। आप मकबूल फिदा हुसैन से उतना ही परिचित हैं जितना आप किसी अन्य भारतीय कलाकार से, या कि अपने आप से। इस सच को मान लेने से हम पाते हैं कि हुसैन साहब की उम्र लगभग छह हजार वर्ष की है। इस लंबी उम्र के विभिन्न पड़ाव के बारे में इस आलेख के पहले हिस्से में जिक्र किया गया है। और इससे “कलाकार” होने के साथ-साथ उनके एक दूसरे रूप से हम परिचित हो सकें हैं कि वे निर्विवाद रूप से ‘भारतीय’ हैं। भारतीय कला, पिछले हजारों वर्षों से विदेश के कला रूपों से प्रभावित रही है। महज गांधार कला ही केवल ग्रीक और रोमन विदेशी प्रभावों को लेकर विकसित हुई, ऐसा नहीं। विदेशी कलाओं से अपने को समृद्ध करने की एक लंबी परंपरा में भारतीय कला ने अपनी मूल विशिष्टता को बनाये रखा। वे ‘समकालीन’ कला प्रवृत्तियां ही थीं जिन्होंने अपूर्व गांधार बुद्ध मूर्ति को पहली बार बनाया औरंपिछली सदी के बीचोंबीच ये वही “समकालीन” विदेशी कला प्रवृत्तियां थीं जिन्होंने व्यापक रूप से आधुनिक भारतीय कला को प्रभावित किया। हुसैन भारतीय धर्मों, गाथाओं और मिथकों के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक परिस्थिति से भलीभांति संबद्ध रहे हैं। हालांकि रामायण-महाभारत जैसे विषयों पर बनाये गये उनकी महत्वपूर्ण और विशाल चित्र श्रृंखला से लेकर राममनोहर लोहिया, फैज, यामिनी राय, मदर टेरेसा, सत्यजित राय और सुनील गावस्कर पर बनाये गये उनके चित्र लोग अब लगभग भूल चुके हैं। इसलिए हुसैन का विवादों से घिरा हुआ चेहरा ही अब हमारे सामने रह गया है। हम यहां समकालीन भारतीय चित्रकला के कुछ ऐसे चित्रकारों के चित्रों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे जो हजारों वर्षों से चली आ रही निर्भीक, कुंठारहित कला का प्रतिनिधित्व करती है और ये याद दिलाती है कि आज भी भारतीय कला का मूल आधार, इसमें निहित कल्पनाशीलता है न कि कोरा प्रतिबिंबन। उसके पहले हुसैन के उन चित्रों को देखें जिनके लिए उन्हें अश्लील और हिंदुओं के आस्था पर आघात करनेवाला बताया गया है। पर इसके पहले एक बार फिर से दोहराना जरूरी है कि हुसैन प्राथमिक और अंतिम रूप से एक भारतीय चित्रकार हैं और उन्हें हिंदू-मुसलमान या किसी अन्य चित्रकार के रूप में देखना, भारतीय कला परंपरा में कलाकारों को समझने की मूल अवधारणा के विरुद्ध है। यह बात बिस्मिल्लाह की शहनाई से अमीर खां और बड़े गुलाम अली के गायन, अल्लारखा और अहमद जान के तबला वादन के साथ उस्ताद अलाउद्दीन के संगीत को जानने और समझने से ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। इन महान संगीतकारों के जरिये भारतीय कला विकसित होती रही है, न कि हिंदू कला या मुस्लिम कला। पार्वती (चित्र 12) यह अद्भुत सुंदर चित्र हुसैन की कला में रेखाओं की निरंतरता की विशेषता को बखूबी दर्शाते हुए चित्र कला में दुर्लभ तिर्यक संरचना (diogonal composition) से हमें परिचित कराता है। इस चित्र पर नग्नता और अश्लीलता का आरोप है। हनुमान और रावण (चित्र 13) रावण के प्रथागत परिकल्पना में कंधे पर रखे एक सर के एक ओर चार और दूसरी ओर पांच सर हैं जो इसके संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ता है पर बावजूद इसके एक लंबे समय से रावण को ऐसे ही प्रस्तुत किया जाता रहा है। हुसैन ने यहां उन्हीं नौ सिरों को एकदम नये ढंग से संयोजित किया है जो बेहद महत्वपूर्ण है। पर इस चित्र पर भी नग्नता और अश्लीलता का आरोप है। द्रौपदी (चित्र 14) द्रौपदी महाभारत ही नहीं बल्कि भारतीय गाथाओं के इतिहास के सबसे लज्जाजनक घटना के रूप चिन्हित रही है जहां एक नहीं उसके पांच-पांच पति उसके सम्मान की चिंता किये बगैर उसे जूए के दांव पर लगा देते हैं। और इतना ही नहीं, जूए में द्रौपदी को जीतकर दुर्योधन द्रौपदी के वस्त्र-हरण पर उतारू हो जाता है। इस चित्र में उस विपन्न नारी को हम चौपड़ जैसी बिछी देख सकते हैं। गौर करें, द्रौपदी के माथे पर सुहाग का बड़ा सा चिह्न है जो पूरे चित्र को बेहद अर्थपूर्ण बनाता है। महाभारत के महापुरुषों और पांच-पांच पतियों की उपस्थिति में एक नारी को नग्न करने की कहानी का हमने महाभारत की कथा से काटकर संसर नहीं किया है पर इस घटना पर बने एक महान चित्र को नग्न और अश्लील कहने की मूर्खता से कुछ लोग बच नहीं सके। सरस्वती (चित्र 15) हुसैन के अति परिचित रेखाओं से बने इस लयात्मक चित्र में अनूठा संयम दिखता है। महज पांच रेखाओं से मोर के पंख का विस्तार यहां उल्लेखनीय है। सरस्वती के दाहिने हाथ में कमल का फूल पानी की सतह के ऊपर है जहां एक मछली भी है। यह अद्भुत चित्र अपनी संरचना के साथ-साथ रेखाओं की हुसैनी लयात्मकता के लिए निस्संदेह विशिष्ट है। यह अनावृत्त है पर समझ के किसी भी मानदंड पर इसे अश्लील नहीं कहा जा सकता। लक्ष्मी (चित्र 16) यह रेखाचित्र, हुसैन की रेखाओं की खास निरंतरता के चलते हाथी पर आसीन लक्ष्मी को गणेश पर बैठी लक्ष्मी मानते हुए इसे नग्न और अश्लील चित्र के रूप में चिन्हित किया गया है। दुर्गा (चित्र 17) यह चित्र उसी श्रृंखला का है जिस पर नग्न, अश्लील और आपत्तिजनक होने का आरोप है। जिन लोगों ने इस पर ऐसा आरोप लगाया है, उनकी समझदारी की विकृति इस बात से स्पष्ट होती है कि इस चित्र में दुर्गा और शेर यौनक्रिया में लिप्त हैं। हुसैन की कला में रेखाओं की विशिष्टता का यह शायद सबसे बड़ा अपमान है। उपरोक्त सभी चित्रों को अश्लील और आपत्तिजनक कहने वालों को स्पष्टीकरण देने के उद्देश्य से या कला की रचनात्मकता के बचाव में कोई दलील पेश करने के लिए हम अपना वक्तव्य नहीं रख रहे हैं। भारतीय कला के लंबे और गौरवपूर्ण इतिहास के साथ-साथ हम मौजूदा राजनीतिक परिवेश में यकायक बदलते करवटों को समझ रहे हैं। और हम अपनी समझ को आप सब तक पहुंचाना चाहते हैं। यहां कतई आग्रह यह नहीं है कि आप हमसे अवश्य ही सहमत हों, बल्कि हम चाहेंगे आप इस पर सोचें, विचारें और समझें कि हुसैन के चित्रों पर उठायी गयी आपत्तियों का आधार न तो धर्म है और न ही कला। यह शुद्ध रूप से एक स्वार्थप्रेरित राजनैतिक पहल है जिसको समझना आज के माहौल में कला को समझने से ज्यादा जरूरी है। फिर भी हम किसी के राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए अपनी कला परंपरा की महानता को छोटा करने का अधिकार किसी को दे नहीं सकते। कम से कम तब तक, जब तक हमारे सभी संग्रहालयों को बामियान या बाबरी मस्जिद नहीं बना दिया जाता। जब तक पुस्तकालयों में सुरक्षित इन कला इतिहासों की महत्वपूर्ण पुस्तकों को आने वाली पीढ़ी के हाथों से छीन नहीं लिया जाता। जब तक रचनाशीलता को कला का मूलभूत आधार मान सकना स भव रहेगा तब तक कला को कला की तरह देखने का तर्क जिंदा रहेगा। यहां तीन उदाहरण प्रस्तुत हैं। पहले उदाहरण में एक हिस्सा 200 ईसा पूर्व का है और दूसरा – हमारी अपनी सदी का। (देखें चित्र 18 और चित्र 15) दूसरे उदाहरण में मथुरा कुषाण काल (100 ईसवी) की एक मूर्ति का चित्र है और दूसरा अपनी सदी का। (देखें चित्र 19 और चित्र 17) तीसरा उदाहरण – मथुरा कुषाण काल की कुबेर-लक्ष्मी और हराती का चित्र है और साथ में बीसवीं सदी का एक और विवादास्पद चित्र। (देखें चित्र 20 और चित्र 16) इन तीनों उदाहरणों से भारतीय चित्रकला परंपरा की निरंतरता और मकबूल फिदा हुसैन के महत्व को पाठक बेहतर समझ सकेंगे। हुसैन पर हिंदू विरोधी अश्लील होने के आरोप के साथ-साथ उनके द्वारा बनाये गये “भारतमाता” (चित्र 22) के लिए भी ऐसे आरोप लगाकर दक्षिणपंथियों ने जहां हुसैन को न केवल एक मुसलमान चित्रकार के रूप में हिंदू धार्मिक आस्थाओं के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की है, उनके द्वारा बनाये गये “भारतमाता” के विरुद्ध विवाद उठाकर उन्हें भारत विरोधी सिद्ध करने की मुहिम तेज की है। भारतीय कला में रचनाशीलता और प्रयोगधर्मिता के पक्ष में अपने वक्तव्यों में हम ने पहले ही बहुत कुछ कहा है पर अब तक हमारी बातें शायद भारतीय कला के इतिहास तक सीमित रही है। समकालीन भारतीय कला में इस परंपरा के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एक अटूट और महत्वपूर्ण निरंतरता को जिंदा रखे हुए हैं। इस मान्यता को हम कुछ महत्वपूर्ण समकालीन चित्रकारों की कृतियों के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहेंगे। हुसैन के “भारतमाता” के संदर्भ को एक आधार देने के लिए हम केवल सिंहवाहिनी-दुर्गा-भारतमाता की अवधारणा को विश्लेषित करते हुए कुछ चित्र यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। (पृष्ठ 41 पर देखें) भारतमाता का एक कैलेंडर चित्र (चित्र 21) हम सबके लिए एक अति परिचित निरीह-सा लगनेवाला चित्र है। यहां कलाकार की कल्पनाशीलता, निर्विवाद रूप से हिंदू देवी – वैष्णो देवी के सिंहवाहिनी रूप से प्रभावित है। इस चित्र में भारत विभाजन के बाद हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना करने वाले एक राजनीतिक दल की विचारधारा प्रतिबिंबित है, जिस दल का झंडा हाथ में लिए सिंहवाहिनी दुर्गा भारतमाता में तब्दील हो गयी है। भारतमाता (चित्र 23) शिल्पगुरु अवनींद्र नाथ ठाकुर का बनाया हुआ है। ये एक संन्यासिनी रूप है और बंगाल स्कूल की अभूतपूर्व शास्त्रीयता का प्रतिनिधित्व करता है। अष्टभुजा दुर्गा (चित्र 24) मंजीत बावा। दुर्गा (चित्र 25) अतुल डोडिया। दुर्गा (चित्र 26) विकास भट्टाचार्या। दुर्गा (चित्र 27) रामकुमार। दुर्गा/भारतमाता (चित्र 28) अर्पिता सिंह। इन चित्रों को गौर से देखने और समझने के बाद हुसैन के विवादास्पद चित्रों को अश्लील, हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं पर आघात करनेवाले या भारत विरोधी नहीं कहेंगे। यह मेरा महज पाठकों से आग्रह नहीं है बल्कि अपनी समझ और तर्क से हम जो कुछ समझ सके उसे आप तक पहुंचाने की कोशिश मात्र कर रहे हैं। यहां कुछ और बातों पर गौर करने की गुंजाइश अवश्य जान पड़ती है। भारत विभाजन की प्रक्रिया में पाकिस्तान का जन्म जिस आधारंपर हुआ था, भारत में सत्ता के हस्तांतरण का आधार वह नहीं था। यह राष्ट्र पहले दिन से ही हिंदू, मुसलमान, सिख और अन्य सभी धर्मों को माननेवालों के लिए समान रूप से उनका देश था – कम से कम हमारे पहले प्रधानमंत्री की धर्म निरपेक्षता की अवधारणा कुछ ऐसी ही थी। पर भारतीय हिंदू, तिलक द्वारा शुरू किये गये महाराष्ट्र में गणेशपूजा, बंगाल में बंकिम बाबू द्वारा आनन्दमठ की रचना और हमारे राष्ट्रपिता की रघुपति राघव राजा राम की आराधना जैसी अन्य तमाम बातें भारत के नये लाट, नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों से मेल नहीं खाता था। भारतीय संसदीय गणतंत्र के निर्माण और चुनावी राजनीति में आजादी के बाद से ही भाषा के नाम पर, जाति के नाम पर, इलाके के नाम पर, प्रदेश के नाम पर ध्रुवीकरण एक विचारविहीन जनविरोधी व्यवस्था के लिए जरूरी था और राजनीतिक दलों ने इस पहलू को ठोस आधार देते हुए अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण करने में देरी नहीं की। जैसे – हरिजन और मुसलमान, दोनों ही अल्पसंख्यक के रूप में चिन्हित तो हुए पर सद्य: स्वाधीन भारत में मुसलमान एक विशिष्ट वोटबैंक माना गया। जामा मस्जिद के इमाम के इशारे पर मुस्लिम वोट किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में पड़ने लगे। राजनैतिक दलों ने इस अल्पसंख्यक वोटों को हथियाने के लिए मजार पर चादर चढ़ाने और इफ्तार पार्टियों के आयोजन जैसी तमाम सतही हरकतों में लिप्त हुए। इन सब का हिंदुस्तान के आम मुसलमान जनता की सामाजिक, आर्थिक विकास से कोई संबंध नहीं था। चुनाव और वोट को केंद्र में रखकर सभी पार्टियां जनता के शोषण के संसदीय तरीकों में पारंगत होने लगी। समय के साथ-साथ भारत की चुनावी संसदीय राजनीति का चेहरा स्पष्ट से स्पष्टतर होता चला गया। रथयात्रा, बाबरी, गुजरात से लेकर आरक्षण, सिंगुर, नंदीग्राम और तस्लीमा विवाद निर्विवाद रूप से इसी चुनावी संसदीय राजनीति के कुत्सित चेहरे के विभिन्न रूप हैं। हालांकि हिंदू मतों के ध्रुवीकरण के प्रयास में बाबरी कांड अब तक के दक्षिणपंथियों की राजनीतिक समझ के ओछेपन को ही रेखांकित कर पायी, क्योंकि जिस तात्क्षणिक और दूरगामी लाभ के उद्देश्य से रथयात्रा कर बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, उन दक्षिणपंथियों को चुनावी लाभ के रूप में कुछ भी हाथ नहीं लग पाया था। ऐसी स्थिति में उन दलों के लिए हिंदू मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों को अपनी ओर आकर्षित करना और धर्म के नाम पर एकजुट करना, संसद में बड़ी संख्या में लौटने के लिए उन्हें जरूरी लगा। यहां गौरतलब है कि रथयात्रा और बाबरी मस्जिद कांड से व्यापक रूप से हिंदू मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी अप्रभावित रहा था। वर्तमान हुसैन विवाद से दक्षिणपंथियों को इस मायने में बाबरी से बड़ी उपलब्धि मिली है क्योंकि न केवल औसत उदारमना हिंदू ये कहते हुए पाये जा रहे हैं कि “हुसैन को क्या जरूरत थी हिंदू देवियों के नग्न चित्र बनाने की।” साथ ही कई मुस्लिम संगठनों ने भी हुसैन को यह कहकर “बिरादरी बाहर” किया है कि हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के अश्लील चित्र बनाने का कोई अधिकार हुसैन को नहीं है। दोनों ही स्थितियों में दक्षिणपंथियों के उद्देश्य की पूर्ति होती नजर आती है क्योंकि वे कम से कम ये तो जानते ही हैं कि भारतीय कला इतिहास परंपरा की समझ मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों को नगण्य है। और साथ ही समकालीन भारतीय चित्रकला को हमारे समाज का बड़ा हिस्सा एक बाजार की चीज मानते हैं जो केवल धनवानों के लिए ही रची जाती हैं, लिहाजा इससे भी उसका कोई लेना देना नहीं है। मनोरंजन के साधन के रूप में फिल्म, नाटक, साहित्य, संगीत, नृत्य आदि कलाओं का जो स्वरूप आज समाज में दिखता है उसके समानांतर चित्रकला को हम नहीं रख पाते हैं। ऐसी स्थिति में जनता से अलग-थलग पड़ी चित्रकला को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना, उन्हें शायद सबसे आसान लगा हो। यह पहल शुद्ध रूप से उस चुनावी संसदीय व्यवस्था को हथियाने के लिए की गयी एक सोची-समझी साजिश है, जो साठ साल की संसद से आती सड़ांध को भी स्पष्ट कर रही है। पर हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि यह साजिश किसी कला के खिलाफ नहीं है बल्कि यह एक राजनैतिक दांव है जिसका उत्तर कला को नहीं बल्कि आम जनता की चेतना की राजनीति को देना है। हमारा विश्वास है कि इस आलेख से हम भारतीय कला परंपरा के कुछ पहलुओं के बारे में पाठकों से रू-ब-रू हो सकें। साथ ही हुसैन विवाद पर बात करते हुए शायद यह भी सिद्ध कर सकें कि मकबूल फिदा हुसैन भारतीय कला परंपरा के महत्वपूर्ण कड़ी हैं। और उन्हें किसी धर्म के साथ जोड़ना भारतीय कला की उदार अवधारणाओं का विरोध करना है। अंत में इस विवाद के पीछे साजिश की परंपरा पर भी कुछ चर्चाएं जरूरी हैं इस लेख में। हम मानते हैं कि कला पर उठे ऐसे विवादों का विरोध महज एक लेख से नहीं किया जा सकता। पर यहां हम यही कहना चाहेंगे कि हुसैन के चित्रों को लेकर उठा विवाद, कला के विरोध में उठा एक मुद्दा नहीं है। यह एक घिनौनी साजिश है, जिसको ध्वस्त करने के लिए एक सुस्पष्ट राजनीतिक समझ के साथ संगठित जन-प्रतिरोध की जरूरत है। यह लेख शायद उस दिशा में एक छोटे-से प्रयास के रूप में काम आए। (यह लेख नीलाभ, डॉ मधु अग्रवाल और सुशील कांति के सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता था।) ( अशोक भौमिक । वरिष्ठ चित्रकार और कथाकार। पिछले दिनों चित्रकला की दुनिया पर आया उनका नॉवेल मोनालिसा हंस रही है खासी चर्चा में रहा। हाल ही में बादल सरकार पर उनकी एक महत्वपूर्ण किताब छपी है। वे जन संस्कृति मंच से जुड़े हैं। उनके बारे में और उनकी कला के बारे में आप विस्तार से इस लिंक www.pages.cthome.net के जरिये जान सकते हैं।)
एक अपील भरा गिफ्ट
Thursday, June 09, 2011 9:45:25 AM
रोहित
बहुत खास दोस्त मोहन ने कल कुछ रंगों और ब्रश को नीली पन्नी में लपेट कर मुझे बर्थडे गिफ्ट के बतौर दिया.... एक कविता सा पत्र भी साथ में था- लौट आओ रंगों के बीच दुबारा वे अब उदास हो चले हैं वे फिर से छूना चाहते हैं तुम्हारी अँगुलियों को. फिर से होना चाहते हैं जीवित , जीवंत और खेलना चाहते हैं. धमाचोकडी मचाना चाहते हैं. ये बच्चे अब बहुत उदास हो चले हैं. लौट आओ अब इनके बीच. -सोचता हूँ कुछ कैनवास खाली पड़े हैं घर पर. इस दोस्त ने जगाया है मुझे गहरी नींद से. अब अनगढ़ ही सही कुछ चित्र बनाऊ.
कलाकार एक चेतना से परिपूर्ण सत्ता है
Wednesday, April 20, 2011 11:29:41 AM
रोहित
चित्रकार के रूप में एम0 सलीम से मिलना प्रकृति के विविध पहलुओं से मिलना है। भूदृष्य चित्रण के कलाकार एम0 सलीम के चित्रों में प्रकृति के तमाम रंगो-आकार अंगड़ाई लेते दिखते हैं। जो कई बार रंगों में वाश तकनीक के प्रयोग से यथार्थ और स्वप्न के कहीं बीच लहराते नजर आते हैं। उनके कैनवास मूलतः इसलिए ध्यान आकर्षित करते हैं क्योंकि वहां प्रकृति की अनुकृति भी प्रकृति से एक कदम आगे की है। उनसे हुई कुछ बातें....... -रोहित जोशी प्र0ः- सबसे पहले तो कुछ बहुत अपने बारे में बताइए? कला के प्रति आपकी अभिरूचि कहां से जन्मीं? एम सलीमः- यूं तो ये रूझान बचपन से ही रहा हैै। जब छोटी कक्षाओं में पढ़ा करते थे तो स्लेट में पत्थरों के ऊपर चॉख से, या इसी तरह कुछ, कभी जानवरों के चित्र, पेड़-पौंधे मकान आदि ड्रा किया करते थे। इसके बाद ऊॅची कक्षाओं में आए यहां काम कुछ परिष्कृत हुआ इसके अलावा कला अभिरूचियों में विस्तार के लिए एक कारण मैं समझता हूॅं प्रमुख रहा, अब तो यह चलन कम हुआ है, लेकिन पहले लगभग 50से 70 तक के दशक में अल्मोड़ा में बाहर से बहुत कलाकार आया करते थे और साइटस् पर जाकर लैण्डस्केप्स् किया करते थे। उन्हैं कार्य करते देखना अपने आप में प्रेरणाप्रद रहा। रूचि थी ही, कलाकारों को देखकर स्वाभाविक ही बड़ी होगी। प्र0ः-चित्रकला सम्बन्धी शिक्षा-दीक्षा कहां से रही? एम सलीमः- दसवीं पास करने के बाद पिताजी और उनके मित्रों ने मेरी कला में अभिरूचि को देखते हुए मुझे लखनऊ आर्टस् कालेज में दाखिला दिलवा दिया। वहांॅ फाईन आर्टस् का पॉंच वर्षों का कोर्स हुआ करता था। यहीं मेरी कला की समुचित शिक्षा दीक्षा हुई। प्र0ः-आपने किन-किन माध्यमों और विधाओं में काम किया है? एम सलीमः- मैंने जलरंग व तैलरंग दोनों ही माध्यमों में काम किया है। लेकिन मुख्य रूप से जलरंगों में मेरी बचपन से ही रूचि रही है। तैल रंगों से तो परिचय ही आर्टस् कालेज में जाकर हुआ और जहां तक विधाओं का सवाल है, मैंने लैण्डस्केप, पोट्रेट, स्टिल लाइफ, लाइफस्टडी, और एब्स्ट्रैक्ट आदि पर भी काम किया हैै। लेकिन यहॉं मुख्य रूप से लैण्डस्केप पर मेरा काम है। जिसे मैं अधिकतम् जल माध्यम के रंगों से ही करता हूं। जल माध्यम भी कला जगत् में बड़ा विवादास्पद रहा है। जो पुराने मास्टर्स रहे हैं, उनका मानना है कि पानी में घोलकर रंगों को पेपर में लगाया जाना चाहिए। इसमें पारदर्षिता होनी चाहिए। जैसे आपने कोई एक रंग लिया है, और उसके ऊपर दूसरा ले रहे हैं तो सारी परतें एक के बाद एक दिखनी चाहिए। इस तकनीक में अपारदर्शी रंगों का प्रयोग वर्जित माना गया है। लेकिन दौर बदला है और ये मान्यताऐं भी टूट रही हैं। कई नऐ प्रकार के रंग माध्यम आए हैं। ऐक्रेलिक मीडियम है पोस्टर मीडियम है, इनके आने के बाद से आयाम बढ़े हैं। प्र0ः- आपने मुख्य रूप से जल रंगों में जो लैण्डस्कैप को अपनी विधा के रूप में चुना इसके क्या कारण रहे। आपको ये ही पसन्द क्यों आया? एम सलीमः- इसका मुख्य कारण प्रकृति में मेरी रूचि से था। आप देखेंगे हमारे पास तो काम के लिए छोटा सा कैनवास है लेकिन प्रकृति के पास ऐसे अनेक कैनवास हैं। इसी से लैण्डस्कैप में बहुत सारी चीजें हैं, जंगल र्हैं, नदियां हैं, झरने हैं, बादल हैं, मकान हैं, पेड़-पौंधे हैं, और भी कई अन्य चीजें हैं जिनको लेकर ताउम्र काम किया जा सकता है। प्र0ः- कला के दर्शन से उपजता एक सवाल मैं आपसे करना चाहुॅंगा, कि-कला जन्म कहॉं से लेती है? उसका उद्भव कहां है? एम सलीमः- मेरा इस बारे में जो मानना है वह यह है कि कला मूलतः पैदाइशी है। लेकिन इसे उभारने की प्रेेरणा हमारे चारों ओर मौजूद प्रकृति से मिलती है। जो चीज हमें अपील करती है उसके प्रति हमारे भीतर भावनाऐं पैदा होती हैं कि हम इन्हैं अपने मनोभावों के साथ पुनः उतारें, यहीं कला का जन्म होता है। मानव ने अपने प्रारंभिक अवस्था से ही ऐसा किया है। प्र0ः- कला के संदर्भ में दो मान्यताऐं हैं ‘कला कला के लिए’ और ‘कला समाज के लिए’ ऐसे में आप स्वयं को कहॉं पाते हैं? और कला के सामाजिक सरोकार क्या होने चाहिए? एम सलीमः- जो कहा जाता है कि- ‘आर्ट फॉर दि सेक ऑफ आर्ट’ ,‘कला कला के लिए’ ये अपनी जगह बिल्कुल सही चीज है। इसको आप बिल्कुल इप्त़दाई तौर से लें, जब आदमी समाज में नहीं बधा था, तब भी उसने सृजन किया है। प्रकृति की प्रेरणाओं से उसने चित्रांकन किया। लेकिन जब हम समाज में बध गए तो समाज के प्रति स्वाभाविक रूप से उत्तरदायित्व भी बने हैं। समाज के भीतर बहसों की वजहें भी विषय के रूप में सामने आई। कई कलाकारों ने इन विषयों पर काम भी किया। यहां एक बात मैं समझता हूँ कि यह कलाकार की रूचि का विषय है कि वे इन पर कलाकर्म करे, न कि उसका उत्तरादायित्व। प्र0ः- कुमाऊॅं पर बात करें। यहॉं चित्रकला के विकासक्रम को कैसे देखते हैं आप? एम सलीमः- कुमाऊॅं के ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों के अभाव में चित्रकला का विकास मुख्यतः लोककलाओं में ही रहा है। मुख्यधारा की चित्रकला परम्मरा यहॉं देखने को नहीं मिलती है। लोककलाओं में भी ज्यादातर योगदान महिलाओं का रहा है। अपनी अभिव्यक्ति के लिए घर के अलंकरण के जरिए सुलभ उपकरणों, रंगों आदि का प्रयोग कर उन्होंने चित्रण किया है। गेरू, चांवल, रामरज आदि का रंगों के लिए प्रयोग किया है। और इसके अतिरिक्त जो काम कुमाऊॅं में चित्रकला की मुख्यधारा का हुआ वह नगरी क्षेत्रों में हुआ। यह भी लगभग विगत् एक से डेढ़ शताब्दी पुरानी ही बात है। प्र0ः- आप मुख्यतः प्रकृति के चितेरे रहे हैं। अभी यहॉं मुख्यधारा के कला जगत में अवचेतन कला में प्रधानता आई है। इसे ही मान्यता भी मिल रही है। इसे आप कैसे लेते हैं? एम सलीमः- नऐ दौर का यह एक ऐसा क्रेज है जिसके बिना हम नहीं रह सकते। यह चित्रकला का समय के सापेक्ष विकास है। देखिए आज फोटोग्रॉफी, चित्रकला की प्रतिस्पर्धा में है। और साथ ही ये तकनीकी रूप से भी बहुत ऐडवांस हो गई है। इससे चित्रकला की पुरानी मान्यताऐं भी टूट रही हैं। कैमरा सिर्फ एक क्लिक में चित्रकार के तीन चार घण्टे की मेहनत सरीखा परिणाम दे रहा हैै। ऐसे में यदि आप सिर्फ वस्तुओं की अनुकृति मात्र कर देंगे तो वह आकर्षित नहीं कर पाऐगी यदि आप अवचेतन विचारों का अपनी अनुकृति में प्रयोग करेंगे तो यह कलागत् दृश्टि से नवनिर्माण होगा व उसे मान्यता भी मिलेगी। यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि कैमरे के पास मन नहीं होता और न हीं संवेदनाऐं होती है। लेकिन कलाकार एक चेतना से परिपूर्ण सत्ता है जो कि मौलिक सृजन करने की क्षमता रखता हैै। प्र0ः- अवचेतन कला है क्या? एम सलीमः- जिसको अवचेतन कला कहते हैं, ‘एब्स्ट्रैक्ट आर्ट’। तो एब्स्ट्रैक्ट तो वीज्युअल आर्ट में कुछ है ही नहीं। आकार रहित तो कोई कला हो ही नहीं सकती। हां ये जरूर है कि प्रकृति से वह विषय आपके भीतर गया है व रूप बदलकर बाहर आया है। बुनियादी रूप में वह मूर्त था बस जब तक आपके विचारों में रहा अमूर्त रहा लेकिन जब कैनवास में रंगों के माध्यम से उतरा फिर मूर्त हो उठा। हां लेकिन यह मूर्तता उस मूर्तता से अलग है जो वह प्रकृति में है। चित्रकार एम0 सलीम से उनके इस पते पर संपर्क किया जा सकता है- दुगालखोला, अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड
प्रकृति के आयाम बहुत वास्ट हैं....
Thursday, April 14, 2011 10:57:14 AM
रोहित
लखनऊ फाइन आर्ट कॉलेज में आर्किटेक्चर डिपार्टमेण्ट के विभागाध्यक्ष रहे डी0 एल0 साह की चित्रकला में रूचि और दखल समान है। अपने लैण्डस्केप चित्रों में उदासी के रंगों को फिराते चित्रकार साह के पास चित्रकला एक विजन के रूप में भी मौजूद है। चित्रकार डी0 एल0 साह से मेरी पिछले दिनों हुई बातचीत के अंश- प्र0ः-सबसे पहले तो अपने बारे में बताइए कि आप में कला अभिरूचियां कहां से पैदा हुई? और आपके कला कर्म की शुरूआत कहां से रही है? डी0 एल0 साहः जब मैं आठवीं या नवीं कक्षा में पढ़ा करता था तो मेरा आर्ट अच्छा समझा जाता था, फिर जब मैं दसवीं के बाद लखनऊ फाइन आर्टस् कालेज में गया तो मेरी दिली ख़्वाहिश फाइन आर्टस को ही विषय के रूप में लेने की थी लेकिन हमारे प्रोफेसर श्री विशाल लाल साह ने कहा कि तुम फाइन आर्ट नहीं करोगे। तुम्हैं वास्तुकला में एडमिशन लेना है। इस तरह मैंने वास्तुकला में एडमिशन ले लिया। कुछ समय बाद जब में दशहरे की छुट्टियों में पिथौरागढ़ आया तो यहां मैं प्रकृति को देखकर विचलित हो उठा। क्योंकि इससे पहले मैं चित्रकला की गम्भीरता को समझता नहीं था और स्कूल में फूल पत्ती आदि के चित्रण को ही कला मानता था। लेकिन आर्टस् कालेज में फाइन आर्टस् के स्टूडैण्ट्स को कार्य करते हुए देखा था खास कर कि लैण्डस्कैप में। तो पिथौरागढ़ की बेहद खूबसूरत वादियों में मेरा विचलित हो उठना लाज़मी ही था। मेरे भीतर का चित्रकार इन छुट्टियों भर हिलोरे मारता रहा और उसने मुझे चित्रकला की ओर खींचा। नतीजा ये हुआ कि आर्टस् कालेज के, अपने चित्रकला की तकनीकों के ऑब्जर्वेशन्स के चलते मैंने लैण्डस्कैप्स बनाने शुरू कर दिए। मुझे कॉलेज में चित्रकला के अनुरूप माहौल मिला। हम एक दूसरे के काम से सीखा करते थे। जो भी लैण्डस्कैप मैं करके लाता अपने सीनियर्स को दिखाता। वहां एक टीचर थे फ्रैंक रैसली। वे लैण्डस्कैप के बड़े चित्रकार थे उन्हें मैं अपना वर्क जरूर दिखाता था। उनके सुझावों से मेरा काम काफी परिष्कृत हुआ। वहां तमाम कलाकारों के संपर्क मंे आने से मुझे कई चीजंे सीखने को मिली और मेरा एक अपना स्टाइल भी बनने लगा था। एक तरह से ये हो रहा था कि वास्तुकला मे रहते हुए चित्रकला की ओर ज्यादा आकृष्ट था। प्रः- आपने किन किन माध्यमों पर काम किया है? डी0 एल0 साहः- मैंने शुरूवात तो वॉटर कलर्स से ही की और लैण्डस्कैप ही ज्यादा किया था। उसके बाद धीरे धीरे जब वॉटर कलर मेरी पकड़ बनने लगी तो फिर स्टूडियो वर्क मैंने आयल कलर्स से करने शुरू किए। आउटडोर वर्क तो मैं तब भी वॉटर कलर या फिर स्कैचिंग से ही किया करता था। प्रः-तो रचनाकर्म के लिए आपने लैण्डस्कैप के अतिरिक्त कौन सी विधाएं चुनी हैं ? डी0 एल0 साहः- प्रतिनिधि रूप से लैण्डस्कैप में ही मैंने काम किया है इसके अतिरिक्त कम्पोजिषन भी तैयार किए हैं। कम्पोजिषन्स में जो फिगर आए हैं वो भी निभाऐ हैं। लेकिन पोट्रेट मैंने कभी एक्सपर्टाइज के साथ नहीं बनाऐ। प्रः- मुख्य रूप से लैण्डस्कैप की विधा चुनने के क्या कारण रहे? डी0 एल0 साहः- कारण ये रहे कि प्रकृति के आयाम बहुत वास्ट हैं। उसकी कोई लिमिट्स नहीं हैं। इसलिए मैने लैण्डस्कैप को विधा के रूप में चुना। लोग कहते हैं कि प्रकृति को चुन कर आप क्या कर लेंगे? लेकिन मेरा स्पष्ठ मानना रहा है कि नेचर में सब कुछ है। आपने अल्मोड़ा के एक चित्रकार ‘बुस्टर’ का नाम सुना होगा उनका काम देखिए उन्होंने अल्मोड़ा की आत्मा को पकड़ डाला है। उनके फ्रेम लीजिए उनके रंग लीजिए। वो कार्य की पराकाष्ठा है। मैंने बांकी कलाकारों को भी देखा है वो कार्य की उस गहराई तक नहीं जा पाऐ हैं। लेकिन ‘बुस्टर’ के चित्रों में लगता है जैसे अल्मोड़ा की मिट्टी उधर है। प्रः- एक सवाल मेरा है, कला के दर्शन से। कला जन्म कहां लेती है? डी0 एल0 साहः- कला की उत्पत्ति के बारे में मेरा अनुभव है कला ईश्वर की कृपा से जन्म लेती है। इसके लिए कोई जरूरत नहीं कि आप कितना पढ़े लिखे हैं अगर आप पर कृपा है तो आप कलाकार हो जाऐंगे। कबीर का उदाहरण ले लीजिए कबीर अनपढ़ थे लेकिन उनके भीतर रचना कर्म कर सकने की अद्भुत् क्षमताऐं थीं। यदि कोई ये समझे कि मैं बहुत ज्यादा पढ़ लिख कर कलाकार बन जाऊॅंगा तो आर्ट्स कालेज से आज तक न जाने कितने ही लोग प्रशिक्षित हुए लेकिन कलाकार कितने बने ये देखने वाली बात है। प्रः- कला कला के लिए और कला समाज के लिए की दो बहसें हैं इनमें आप अपनी पक्षधरता कहां पाते हैं डी0 एल0 साहः- देखिए मैं समाज को कोई मैसेज नहीं देना चाहता। वस्तुतः मैं कबीर से बहुत प्रभावित रहा हूं। क्योंकि जो उसके स्टेटमैंट्स रहे हैं उसमें समाज की कोई परवाह नहीं है। जो कुछ उसने कहना था कह डाला। और उसी तरह का मैं पेण्टर हूं। मैं स्पोन्टिनियस पेण्टर हूं किसी भी चीज से मैं प्रभावित होता हूं तो उसको मैं अपनी तरह से अभिव्यक्तित करता हूं। दूसरी ओर मैं गौतम बुद्ध को लेता हूं। गौतम बुद्ध अभिजात्य परिवार से संबद्ध रहे हैं वे ऐकेडमिक भी रहे हैं। उन्होंने हर एक बात नपी तुली बोली है। लेकिन कबीर ने ये नहीं देखा। कबीर ने अपने कला बोध से पानी में आग लगते हुए भी देखी गौतम बुद्ध ने तर्क तलाशे। ऐसे ही मछलियों को पेड़ में चड़ते हुए कबीर देख सकते हैं गौतम बुद्ध नहीं। ? ऐसे ही पेंटिंग की दुनिया में आप चित्रकार एम0 सलीम को ले लीजिए वह एक डिसिप्लिंड पेंटर हैं। ऐकेडमिक किस्म के। गौतम बुद्ध की तरह। और मेरे चित्रण में अराजकता है जैसी आप कबीर के भीतर पाएंेगे। अगर समाज मुझसे मैसेज लेना चाहे तो ठीक है लेकिन में कोई मैसेज देना नहीं चाहता। प्रः-तो एक प्रश्न यह उठता है कि ऐसी स्थिति में एक कलाकार को समाज स्वीकारे क्यों? क्योंकि अन्ततः स्वीकार्यता तो समाज की ही है? डी0 एल0 साहः- हां समाज की स्वीकार्यता तो है। लेकिन जिसको समाज ने कभी अस्वीकार किया है तो बाद में स्वीकार भी किया है। जैसे आप 18वीं षताब्दी में विन्सेन्ट वान गॉग को देखिए उन्हें कलाजगत में स्वीकार ही नहीं किया जाता था। लेकिन आज वो कला जगत का बड़ा नाम हैं। प्रः- कला की जो मुख्यधारा है उसमें अभी अवचेतन कला को बड़ी मान्यता है। इसे आप कैसे देखते हैं? डी0 एल0 साहः- देखिए मैं एब्स्ट्रैक्ट आर्ट को लगभग 1956 से देख रहा हूं। लेकिन अवचेतन कला जिसे कहा जाता है कि विचार से जन्मीं कला। कैनवास पर तो वह ज्यामितीय आकारों के भीतर ही है। अवचेतन तो कुछ नहीं है। उसके लिए जो आकार हमने लिए हैं वो भी प्रकृति से इतर नहीं हैं। हां लेकिन एक ट्र्रैण्ड चल पड़ा है। प्रः- एक सवाल अब कुमाऊॅ की लोकचित्रकला के इतिहास पर है कि इसका विकासक्रम क्या रहा है? डी0 एल0 साहः- कुमाऊॅ में चित्रकला की जो परम्परा मुख्यधारा की रही वो तो अंग्रेजों के आने के बाद ही की है। लेकिन इससे पहले ऐपण की और ऐसे ही लोकचित्रण की परम्परा और उससे भी पहले गुहाकालीन मानव की चित्रण अभिव्यक्ति रही है। पिछले 100 सालों और 150 सालों के भीतर जो यथार्थवादी अभिव्यक्ति कला की हुई है वो छिटपुट ही रही है और जितनी भी रही है या तो वो अंग्रेजों ने ही की या फिर अंग्रेजों की प्रेरणा ने ही उसके पीछे काम किया।
‘मूर्तता-अमूर्तता के द्वन्द्व से हर कलाकार गुजरता है’
Monday, April 11, 2011 1:29:53 PM
रोहित
कुमाऊँ विश्वविद्यालय के सोबनसिंह जीना परिसर अल्मोड़ा में अध्यापन कर रहे डॉ. शेखर जोशी स्वयं की विकसित की हुई शैली ‘नेल पेण्टिंग’ में अपने अद्भुत् चित्रांकन के लिए विशेष तौर पर जाने जाते हैं। यूँ तो उन्होंने चित्रकला की अन्य विधाओं पर भी काम किया है, लेकिन नेल पेंटिंग में नाखूनों द्वारा आकृति रचना और रंगों का अद्भुत् प्रयोग विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। एक मुलाकात में डॉ. शेखर जोशी से उनके समग्र कलाकर्म पर बातें करने का मौका मिला, जिसका सारांश प्रस्तुत है:- प्रश्न:- सबसे पहले तो यहीं से शुरूआत करें कि आपकी चित्रकला अभिरुचियाँ कहाँ से जन्मीं ? डॉ.शेखर जोशी:- शुरूआती दौर में मैं विज्ञान का छात्र रहा। चित्रकला में प्रारम्भ में सरसरी रुचि रही। मेरी मुलाकात इम्तियाज़ अली खान से हुई। उनकी एक भांजी अद्भुत् चित्रण किया करती थीं। मेरी चित्रकला की वे प्रेरणास्रोत रही हैं। गुरू जी (इम्तियाज अली खान) ने मुझे चित्रकला में निरन्तर सृजन के सुझाव दिए तो मैं विज्ञान छोड़ चित्रकला की दुनिया में आया। यहीं मेरी चित्रकला की शुरूआत रही है। प्रश्न:- किन-किन विधाओं और विषयों पर आपने काम किया है ? डॉ.शेखर जोशी:- मैंने प्रारम्भ तो कैलेण्डर, किताबों आदि से चित्रों को कॉपी करके ही किया। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि कॉपी करना कोई आर्ट नहीं है। आर्ट्स कालेज में जाने के बाद अन्य सारी विधाओं के बारे में पता चला। जलरंग, तैल रंग आदि पर मैंने चित्रकारी की। टैम्परा रंगों में भी मैंने बहुत काम किया है। आजकल मैं एक्रेलिक रंगों में भी चित्रण करता हूँ। कुल मिला कर लगभग सभी माध्यमों में मैंने काम किया है। प्रश्न:- ‘नेल पेण्टिंग’ आपकी इज़ाद की हुई विधा रही है। इस पर काम करना आपने कब से प्रारम्भ किया ? डॉ.शेखर जोशी:- ‘नेल’ विधा पर जो मैंने काम करना शुरू किया है, ये मुझे मेरे गुरू जी से ही पहले पहल मिली है। एक बार उन्होंने मुझे ब्लॉटिंग पेपर पर नाखूनों से काम करके दिखाया था। जब मैंने कुछ समय तक इस विधा पर काम किया और फिर उन्हें दिखाया तो उन्होंने परामर्श दिया कि ‘तुम इस विधा पर अच्छा काम कर सकते हो।’ तो प्रारम्भिक जानकारी तो उन्होंने ही मुझे दी थी। फिर मैंने इस विधा पर आकारों के स्ट्रोक्स, रंगों के स्ट्रोक्स का गहन अध्ययन किया। इस विधा पर कई चित्र बनाए। आज यह अपने आप में एक चर्चित चित्रकारी का रूप ले चुकी है। प्रश्न:- लोक कला कहाँ से जन्मती है ? इसका उद्भव कहाँ से होता है ? डॉ.शेखर जोशी:- लोक कला को हमारे जनमानस की कला कहा जाता है। यह मानव की सृजनात्मक अभिव्यक्ति से जन्मती है। मानव ने अपने परिवेश को खूबसूरत बनाने के लिए मिट्टी से धरातल को लेपकर उपलब्ध रंगों से चित्रण किया है। यही लोक चित्रकला का उद्भव है। प्रश्न:- कुमाऊँ के परिप्रेक्ष्य में चित्रकला का विकासक्रम रहा है, उसे आप कैसे देखते हैं ? डॉ.शेखर जोशी:- कुमाऊँ के संदर्भ में यदि हम कहें तो यह बड़े सौभाग्य की बात है कि हमारे यहाँ प्रागैतिहासिक काल के चित्र भी दिखाई देते हैं। अल्मोड़ा में ही लखुउडियार इसका एक उदाहरण है। इसके अलावा ‘ऐपण’, ग्रामीण भित्तीय चित्रण, चिन्ह पत्रियों आदि की सजावट के लिए हुआ चित्रण भी यहाँ दिखता है। कुमाऊँ से गढ़वाल की ओर चलें तो वहाँ मौलाराम की चित्र परम्परा देखने को मिलती है, जिसे भारतीय चित्रकला के इतिहास में गढ़वाली कलम के नाम से जाना जाता है। प्रश्न:- गढ़वाल में जो मौलाराम की चित्रकला परम्परा, भारतीय चित्रकला की एक कलम के रूप में विकसित हुई, वैसी कोई कला परम्परा कुमाऊँ में क्यों नहीं दिखाई देती ? इसके पीछे आप क्या कारण मानते हैं? डॉ.शेखर जोशी:- हाँ, इस तरह से कोई कला परम्परा यहाँ नहीं दिखती है। अलबत्ता कुछ चित्र हमारे जी. बी. पन्त म्यूजियम अल्मोड़ा में संग्रहीत हैं, जिनसे हम कुमाऊँ की चित्रकला परम्परा को ढूँढ सकते हैं कि किस रूप में वह यहाँ पर विकसित हुई है। इस पर कार्य किए जाने की अत्यन्त आवश्यकता है। प्रश्न:- कुमाऊँ की लोक चित्रकला परम्परा आज किस रूप में मौजूद है ? डॉ.शेखर जोशी:- देखिए कुमाऊँ की लोकचित्र परम्परा की अपनी एक निश्चित पहचान है और सम्पूर्ण कला जगत में उसकी मान्यता भी है। ‘ऐपण’ प्रमुख रूप से यहाँ की लोक चित्र परम्परा है और अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ पूरे देश में परिचित है। प्रश्न:- ऐपण के बारे में यह कहा जाता है कि यह गुजरात और महाराष्ट्र से यहाँ आई हुई कला है? डॉ.शेखर जोशी:- यह कहा जा सकता है, क्योंकि यहाँ बसी हुई अधिकतम जातियाँ गुजरात और महाराष्ट्र आदि से ही यहाँ पर आइ हैं। तो वहाँ का प्रभाव यहाँ की लोकचित्र कला में भी स्वाभाविक रूप से ही आया होगा। लेकिन ऐपण कला के रूप में यहीं विकसित हुई है। अभी मैं उड़ीसा एक आर्टिस्ट कैंप में गया हुआ था, तो वहाँ पर मुझे ये जानकारी मिली कि वहाँ पर जनजातीय समूहों द्वारा बोली जाने वाली एक भाषा है ‘कुई’। हमारे गाँव का नाम भी ‘कुई’ ही है। संभवतः वहाँ से इसका कोई सम्बन्ध हो। मानव में भ्रमण की प्रवृत्ति बहुत पहले से रही है, जिससे सभ्यताओं व उनकी परम्पराओं का भी मिलाप हुआ है। इससे परस्पर सभ्यताओं, परम्पराओं, मान्यताओं आदि में एक-दूसरे का प्रभाव दिखाई देता है। प्रश्न:- अभी लोककला से कला की समग्र दुनिया की ओर लौटें तो आपका क्या मानना है कि कला जन्म कहाँ से लेती है ? डॉ.शेखर जोशी:- कला तो मानव के जन्म के साथ ही पैदा हो गई। किसी भी कार्य को सुन्दर ढंग से किया जाना ही कला है और मानव में तो ये प्रवृत्ति रही ही है। प्रश्न:- ‘कला कला के लिए’ और ‘कला समाज के लिए’ की जो बहस है उसी से उपजा एक सवाल मेरा है कि कला के सामाजिक उत्तरदायित्व क्या होने चाहिए ? उसके सरोकार क्या होने चाहिए ? डॉ.शेखर जोशी:- देखिए कला के सामाजिक उत्तरदायित्व ये होने चाहिए कि कला दूसरे को प्रसन्न कर सके और दर्शक के आनन्द में कलाकृतियाँ उत्तरोत्तर वृद्धि कर सकें। यही उसका सामाजिक सरोकार है। प्रश्न:- अभी कला जगत में अवचेतन कला का प्राधान्य आया है। इसे आप कैसे देखते हैं ? डॉ.शेखर जोशी:- मानव स्वभाव है कि वह जो अभिव्यक्तियाँ नहीं कर पाता, वे उसके अवचेतन मन में रहती हैं। लेकिन अवचेतन मन भी उन सारी मानसिक स्थितियों को अवसर मिलने पर अभिव्यक्त करता है। इसका जरिया कला होती है। यही अवचेतन कला है। इसमें मूर्तता और अमूर्तता का एक अद्भुत् खेल है। कलाकार या तो मूर्तता से अमूर्तता की ओर जाता है या फिर अमूर्तता से मूर्तता की ओर। यदि कलाकार अमूर्त में पहले आता है तो उसे धीरे-धीरे मूर्त की ओर जाना है और यदि पहले मूर्तता को कलाकार ने पकड़ा है तो वह उसे अमूर्तता की ओर ले चलेगी। मूर्तता और अमूर्तता के बीच के द्वन्द्व से प्रत्येक कलाकार गुजरता है। वह चाहे जहाँ से भी शुरू करे उसके दोनों कोनों को वह पकड़ता है। यही आनन्द की अनुभूति है।
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