Saturday, November 16, 2013

दोस्त ग़म-ख़वारी में मेरी स`ई फ़रमावेंगे क्या
ज़ख़म के भरने तलक नाख़ुन न बढ़ जावेंगे क्या
बे-नियाज़ी हद से गुज़री बनदह-परवर कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए दिल और आप फ़रमावेंगे क्या
हज़रत-ए नासिह गर आवें दीदह-ओ-दिल फ़र्श-ए राह
कोई मुझ को यह तो समझा दो कि समझावेंगे क्या
आज वां तेग़-ओ-कफ़न बांधे हुए जाता हूं मैं
उज़्र मेरे क़तल करने में वह अब लावेंगे क्या
गर किया नासिह ने हम को क़ैद अचछा यूं सही
यह जुनून-ए `इशक़ के अनदाज़ छुट जावेंगे क्या
ख़ानह-ज़ाद-ए ज़ुलफ़ हैं ज़नजीर से भागेंगे कयूं
हैं गिरिफ़तार-ए वफ़ा ज़िनदां से घबरावेंगे क्या
है अब इस म`मूरे में क़हत-ए ग़म-ए उलफ़त असद
हम ने यह माना कि दिल्ली में रहे खावेंगे क्या.

-मिर्ज़ा ग़ालिब

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